बेवफा होती मोदी सरकार की बौद्धिक संपदा ?

 देश के संचालकों की बौद्धिक दिब्यांगता !

New Delhi :  चार वर्षों में देश की वर्तमान सरकार दम्भ तो भरती रही पर  ‘अहंब्रम्हस्मि‘  का अभिनय करनें में भी अपना उत्कृष्ट नहीं कर पाई। आज उसके चुनावी भषणों की क्लिप दिखाकर जब लोग सवाल दाग रहें हैं तो सरकार के मंत्री सवाल पूछनेवालों पर ही भड़क जा रहे। एक वर्ष पहले एकदम सुनिश्चित नजर आ रहा मोदी सरकार का बाकी का कार्यकाल दूर की कौड़ी ही  रहा । इसकी वजह भी है। नजर डालिये सरकार के कार्यकाल के प्रथम वर्ष से उपजेें तीन सवालों पर। पहला, क्या नरेंद्र मोदी सरकार प्रतिभा के खिलाफ है ? दूसरा, अगर हां तो क्या यह बीते सात दशकों की सबसे अधिक प्रतिभा विरोधी सरकार है ? और तीसरा, क्या मोदी, भाजपा और मतदाताओं को वाकई इस बात से कोई फर्क पड़ता है ? पहला और दूसरा प्रश्न का उत्तर तो सरकार की कृयाविधि से हां ही होता है। तीसरे सवाल पर अवश्य बहस हो सकती है, बशर्ते कि आधारभूत बातें स्थापित हो जाएं। आइयेे विधिद्वारा स्थापित इस सरकार की प्रथम कैबिनेट की बात करें, यकीनन यह मोटे तौर पर अनुभवहीन लोगों से भरी भीड़ जमा की गई।  भाजपा 10 वर्ष तक सत्ता से बाहर रही और वाजपेयी की कैबिनेट के अधिकांश सहयोगी बुजुर्ग होकर मार्गदर्शक मंडल में पहुंच चुके थे। राजनाथ सिंह, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज और अनंत कुमार जैसे अपेक्षाकृत युवा चेहरों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया। नितिन गडकरी के पास अपने राज्य में बुनियादी विकास की दिशा में काम करने का अनुभव है।

किसान समर्पित है पर सरकार कभी साथ खड़ी ही नहीं हुई ! चेहराविहीन मंत्रालय है कृषि । 

पीयूष गोयल कड़ी मेहनत करने वाले मंत्री हैं और प्रायः चार या पांच विभाग उनके पास रहे हैं। इनके अलावां मोदी सरकार के 10 मंत्रियों के नाम आमजन बता पाये ये मुस्किल है। पत्रकारिता के छात्रों से लेकर कई कंपनियों के सीईओ तक अक्सर उनसे पूछनें पर जवाब नहीं दे सके। आज कृषिमंत्री राधमोहन सिंह हैं ये आप जिन्हे पता है वो बतायेगा तब लोग हाॅ -हाॅ  कर देंगे । निःसंदेह संप्रग के कृषि मंत्री शरद पवार के कार्यकाल की तुलना में  इनका कार्य कृषिक्षेत्र में आधा अधूरा  है। याद कीजिये प्रधानमंत्री ने 2017 में वादा किया था कि 2022 तक किसानों की आय दो गुना कर दिया जाएगा। मन की बात भी हुई। किसान के लिये इस मुहीम में अभी तक तो सब गुण गोबर ही रहा है।  वादों का तुॅफान सा ला देने वाले मोदी के पास या उनके कृषिमंत्री के पास कोई फुलप्रुॅफ प्लान नहीं था तो थोड़ा विशेषज्ञों से परामर्श लेकर कोई हरित क्राॅति के लिये अथक प्रयाास करते कैसे नहीं होती आय दुगंुनी। किसान समर्पित है पर सरकार कभी साथ खड़ी ही नहीं हुई। हालत तो यहाॅ तक पहुॅच गई है कि हमारे देश में कृषि शोध समेत विज्ञान को ही नकारने की कोशिश हो रही है। जब तक इन चीजों को ठीक नहीं किया जाता है तब तक देश को कृषि प्रयोगशालाओं से नई तरह के प्रतिभा पलायन का सामना करना होगा। जाहिर है गाय के गोबर, गोमूत्र और वैदिक जैविक खेती के क्षेत्र में शोध करने में कोई खास भविष्य तो नहीं दिखती।  देश में पूर्व के घटनाक्रम सबक लेने के लिये नजरी के रुप में हैं । पर वो सरकार की बाट जोहते रह गये। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी हरित क्रांति चाहती थीं , उन्होंने सी सुब्रमण्यम जैसे काबिल और आधुनिक सोच वाले व्यक्ति को कृषि मंत्री बनाया। इस सरकार में ऐसा कौन है जो दूसरी हरित क्रांति की दिशा में ले जा सके ? गौर करनो चाहिये था। कृषि मंत्रालय अन्य क्षेत्रों की स्थिति को स्पष्ट करने का  बहुत सुन्दर माध्यम है।  ऐसे ही लोगों से सवाल जवाब के दौरान स्वास्थ्य, रसायन एवं उर्वरक, भारी उद्योग, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, सामाजिक न्याय और लघु उद्योग मंत्रियों के बारे में पूछा तो लगभग  एक ही जैसे जवाब कि  नहीं मालुम की प्रतिक्रिया मिली।  हम कहें कि मौजूदा मंत्रिमंडल अब तक के इतिहास का सबसे अधिक नाम और चेहराविहीन मंत्रालय है तो कोई भेद नहीं होगा।

प्रधानमंत्री के पास है नाम मात्र सलाहकार !

 

यदि देश के प्रधान के साथ आज एक शोधपरक ,मेहनती कैबिनेट टीम होती और प्रधानमंत्री उसके साथ काम करते तो परिणाम ख्ुाद ब खुद उनके मुताबिक होते ! सभी तरह के संचालन, विचार और क्रियान्वयन कैबिनेट से ही तो आते हैं  उनके पास यकीनन कुशल और समर्पित नौकरशाह हैं लेकिन रचनात्मकता का क्या? निश्चित रूप से प्रधानमंत्री एक श्रेष्ठ व्यक्ति हैं। जैसा कि वह कहते हैं, वह देश के तमाम जिलों की यात्रा कर चुके हैं। परंतु एक महानतम नेता भी महाद्वीप के आकार के देश के बारे में सबकुछ नहीं सोच सकता। इसे आप मात्र संयोग नहीं कह सकते कि आजकल प्रधानमंत्री के इर्द-गिर्द मौजूद तमाम सलाहकार या चर्चा समूह समाप्त कर दिए गए हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड (एनएसएबी) में केवल पांच सदस्य हैं। जिसे आप अतीत की छाया , नाम दे सकतें हैं। अतीत में प्रत्येक प्रधानमंत्री ने प्रमुख रणनीतिक संगठन बनाये रखा था जो राष्ट्रीय नीतियां बनानें के साथ-साथ क्रियान्वयन से पूर्व देशहित, जनहित का भी ख्याल रखते थे। इन्हीं में से एक है, मसौदा परमाणु सिद्धांत । इसमें सार्वजनिक बौद्धिकों से लेकर रणनीतिक विचारक तक सदस्य रहे। अब इन सदस्यों का चयन मनमाने ढंग से होने के कारण ब्यक्तिगत हित, देशहित को गांैण बनाता प्रतीत हो रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और सलाहकार ब्रजेश मिश्रा की बहस और संबद्धता, विचारों की उर्वरता की परंपरा  अब समाप्ति की ओर है। नया और लघु एनएसएबी केवल राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को रिपोर्ट करता है।

  अंदरूनी लोगों की सरकार (अवसर गये न उबरे )। 

प्रधानमंत्री और कैबिनेट की दो वैज्ञानिक सलाहकार परिषद रुक-रुक कर काम कर रही हैं। मोदी सरकार ने अपना प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार शासन के पांचवें वर्ष के करीब आने पर नियुक्त किया। इस पद पर बैठाया तो गया एक प्रमुख वैज्ञानिक को लेकिन उनको दर्जा राज्य मंत्री से घटाकर सचिव का कर दिया गया। हलांकि ये पहली बार नहीं है। इससे पहले जब प्रसिद्ध वैज्ञानिक आर चिदंबरम ने एपीजे अब्दुल कलाम का स्थान लिया था तब भी उनका दर्जा कैबिनेट मंत्री से घटाकर राज्य मंत्री किया गया था। प्रधानमंत्री की वैज्ञानिक सलाहकार परिषद की अध्यक्षता पहले भारत रत्न सीएनआर राव के पास थी। अब यह निष्क्रिय पड़ी है। एनडीए सरकार ने चार साल में चार अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा वाले अर्थशास्त्रियों में से तीन गंवा दिए। रघुराम राजन, अरविंद पनगड़िया और अरविंद सुब्रमण्यम। चैथे, आरबीआई के मौजूदा गवर्नर ऊर्जित पटेल नोटबंदी जैसी शर्मिंदगी के बाद सरकारी अनुपालन छोडकर, किसी तरह पेशेवर प्रतिष्ठा और संगठनात्मक स्वायत्तता के लिए जूझ रहे हैं। नोटबंदी के बाद संघर्षरत अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिये सरकार ने जोरशोर से प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद को पुनः सींचना शुरू किया। सूत्र बताते हैं कि हाल ये है कि प्रधानमंत्री इस परिषद से अब मिलते तक नहीं। वह केवल सरकार में शामिल दो प्रमुखों विवेक देवरॉय और पूर्व आईएएस तथा व्यय सचिव रतन वाटल से मिलते हैं। प्रधानमंत्री के लिए अधिकांश रिपोर्ट यही दोनांे तैयार करते हैं । कहा जा सकता है कि यह पूरी तरह अंदरूनी लोगों की सरकार है।

हार्डवर्क (कड़ी मेहनत) से हार्वर्ड को पीछे छोड़ा जा सकता है – पी एम मोदी 

काबिलियत की कितनी कद्र है इस सरकार में उसे समझने के लिये 2014 के कुछ चुनावी भषण पर गौर करें तो आज के प्रधानमंत्री,  कल उत्तर प्रदेश के चुनाव प्रचार में कहते थे कि,-‘हार्डवर्क (कड़ी मेहनत) से हार्वर्ड को पीछे छोड़ा जा सकता है।‘  हकीकत यह है कि हार्वर्ड में दाखिला लेने के लिए कड़ी मेहनत लगती है और अगर सरकार खुले विचारों की है तो वह हार्वर्ड, एमआईटी, येल और यहां तक कि जेएनयू से बेहतरीन लोगों को अपने साथ जोड़ सकती है। आश्चर्य नहीं हुआ जब सरकार ने मुख्य आर्थिक सलाहकार सुब्रमण्यन के पद छोडने के बाद इस पद की न्यूनतम अर्हता ही घटा दी। अब इस पद को संभालने के लिए आर्थिक विषयों में डॉक्टरेट जरूरी नहीं रही। मोदी और शाह दोनों को ऐसा लगता है कि अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली पिछली कैबिनेट पूरी तरह उनकी पार्टी की नहीं थी। अब उनके पास बहुमत है वे किसी बाहरी को जगह देना नहीं चाहते, भले ही वह कितना भी प्रतिभाशाली हो।अब एक सवाल और पैदा होता है कि क्या मतदाता को इन बातों से फर्क पड़ता है ? अच्छे नेताओं के पास सुन्दर दिमाग के साथ उनका दिल भी बड़ा होता है। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी अपनी सरकार अपने कार्यालय से चलाती थीं लेकिन उनके आस-पास प्रतिभाशाली लोगों का जमांवड़ा था। अमेरिकी राष्ट्रपति ‘रोनाल्ड रीगन‘ आकर्षक व्यक्तित्व और शानदार वक्ता थे । पर उनमे बौद्धिकता की कमी रही इसलिये उन्होंने भी बेहद प्रतिभाशाली आर्थिक और रणनीतिक टीम बनाई और शीतयुद्ध में जीत हासिल की।

सभी बौद्धिक भजपा में ही मौजूद है ?

प्रधानमंत्री मोदी और भजपा अध्यक्ष अमित शाह को शायद लगता है कि सभी बौद्धिक भजपा में ही मौजूद है। मोदी सरकार की बौद्धिक संपदा तीसरे वर्ष तक समाप्त हो गई। सरकार ने सुधार के जो कदम वापस लिए हैं, वे इस बारे में काफी कुछ बताते हैं। उनमें पहला है चिकित्सा शिक्षा सुधार विधेयक। नीति आयोग ने मसौदा तैयार करनें में चार वर्ष का समय लिया। दूसरा मामला है निजी कंपनियों को कोयला खदान बेचने का। इन बातों से पता चलता है कि मोदी सरकार किन परिस्थितियों से दो चार हो रही है। प्रमुख क्षेत्रों में ठहराव सा आ गया है। सरकार अपनी गति खो रही है।  उठनेवाले सवालों पर बात-बात पर कैबिनेट के लोगों का चिढ़ जाना यह सबित कर रहा है कि सरकार ग्रेस पाकर भी पास होती नहीं दिख रही है।रक्षा मंत्री जायज सवाल पूछने पर भी जिस तरह पत्रकारों को झिडक रही हैं। यही वजह है कि मोदी सरकार का दूसरा कार्यकाल जो साल भर पहले तय नजर आ रहा था वह अब दूर की कौड़ी नजर आ रहा है।

Vaidambh Media

 

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