भरतीय सिनेमा की पहली संगीतकार जोड़ी हुस्नलाल-भगतराम !

सुनो सुनो ऐ दुनिया वालो बापू की अमर कहानी…

Mumbai:  भारतीय फिल्म संगीत जगत में अपनी धुनों के जादू से श्रोताओं को मदहोश करने वाले संगीतकार तो कई हुए थे और उनका जादू भी श्रोताओं के सर चढ़कर बोला लेकिन उनमें कुछ ऐसे भी थे, जो बाद में गुमनामी के अंधेरे में खो गए और आज उन्हें कोई याद भी नहीं करता।bhagatram फिल्म इंडस्ट्री की पहली संगीतकार जोड़ी हुस्नलाल-भगतराम भी ऐसी ही एक प्रतिभा थे। आवाज की दुनिया के बेताज बादशाह मोहम्मद रफी को प्रारंभिक सफलता और पहचान दिलाने में हुस्नलाल-भगतराम का अहम योगदान रहा था। चालीस के दशक के अंतिम वर्षों में जब मोहम्मद रफी फिल्म इंडस्ट्री में बतौर पाश्र्वगायक अपनी पहचान बनाने में लगे थे तो उन्हें काम ही नहीं मिलता था। तब हुस्नलाल-भगतराम की जोड़ी ने उन्हें एक गैर फिल्मी गीत गाने का अवसर दिया था। वर्ष 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद इस जोड़ी ने मोहम्मद रफी को राजेन्द्र कृष्ण रचित गीत … सुनो सुनो ऐ दुनिया वालो बापू की अमर कहानी… गाने का अवसर दिया।

संगीतकार शंकर- जयकिशन ने हुस्नलाल-भगतराम से ही संगीत  शिक्षा हासिल की !
देशभक्ति के जज्बे से परिपूर्ण यह गीत श्रोताओं में काफी लोकप्रिय हुआ। husnbhagatइसके बाद अन्य संगीतकार भी मोहम्मद रफी की प्रतिभा को पहचानकर उनकी तरफ आकर्षित हुए और अपनी फिल्मों में उन्हें गाने का मौका देने लगे। मोहम्मद रफी हुस्नलाल-भगतराम के संगीत बनाने के अंदाज से काफी प्रभावित थे और उन्होंने कई मौकों पर इस बात का जिक्र भी किया है। मोहम्मद रफी सुबह चार बजे ही इस संगीतकार जोड़ी के घर तानपुरा लेकर चले जाते थे जहां वह संगीत का रियाज किया करते थे। हुस्नलाल भगतराम ने मोहम्मद रफी के अलावा कई अन्य संगीतकारों को पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी। सुप्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी शंकर जयकिशन ने हुस्नलाल-भगतराम से ही संगीत की शिक्षा हासिल की थी। मशहूर संगीतकार लक्ष्मीकांत भी उन्हीं से वायलिन बजाना सीखा करते थे। छोटे भाई हुस्नलाल का जन्म 1920 में पंजाब में जालंधर जिले के कहमां गांव में हुआ था जबकि बड़े भाई भगतराम का जन्म भी इसी गांव में वर्ष 1914 में हुआ था। बचपन से ही दोनों का रुझान संगीत की ओर था। हुस्नलाल वायलिन और भगतराम हारमोनियम बजाने में रुचि रखते थे। हुस्नलाल और भगतराम ने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा अपने बड़े भाई और संगीतकार पंडित अमरनाथ से हासिल की। इसके अलावा उन्होंने पंडित दिलीप चंद बेदी से से भी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली थी। वर्ष 1930 ..1940 के दौरान संगीत निर्देशक शास्त्रीय संगीत की राग-रागिनी पर आधारित संगीत दिया करते थे लेकिन हुस्नलाल-भगतराम इसके पक्ष में नहीं थे।

सिने कैरियर की शुरूआत वर्ष 1944 में प्रदर्शित फिल्म चांद से की !
उन्होंने शास्त्रीय संगीत में पंजाबी धुनों का मिश्रण करके अलग तरह का संगीत देने का प्रयास दिया और उनका यह प्रयास काफी सफल भी रहा। phpThumb_generated_thumbnail हुस्नलाल-भगतराम ने अपने सिने कैरियर की शुरूआत वर्ष 1944 में प्रदर्शित फिल्म चांद से की। इस फिल्म में उनके संगीतबद्ध गीत..दो दिलों की ये दुनिया..श्रोताओं में काफी लोकप्रिय हुए लेकिन फिल्म की असफलता के कारण संगीतकार के रूप में वे अपनी खास पहचान नही बना सके। वर्ष 1948 में प्रदर्शित फिल्म प्यार की जीत में अपने संगीतबद्ध गीत ! ‘एक दिल के टुकड़े हजार हुए की सफलता के बाद हुस्नलाल-भगतराम फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो गए। मोहम्मद रफी की आवाज में कमर जलालाबादी रचित यह गीत आज भी रफी के दर्द भरे गीतों में विशिष्ट स्थान रखता है लेकिन दिलचस्प बात यह है कि हुस्नलाल-भगतराम ने यह गीत फिल्म प्यार की जीत के लिए नहीं बल्कि फिल्म सिंदूर के लिए संगीतबद्ध किया था।

चुप चुप खड़े हो जरूर कोई. ..से चोटी के संगीतकारों में शुमार हो गए हुस्न-भगत !
सिंदूर के निर्माण के समय जब हुस्नलाल-भगतराम ने फिल्म निर्माता शशिधर मुखर्जी को यह गीत सुनाया तो उन्होंने इसे अनुपयोगी बताकर फिल्म में शामिल करने से मना कर दिया। बाद में निर्माता ओ.पी.दत्ता ने इस गीत को अपनी फिल्म ! bairi bhan‘प्यार की जीत में इस्तेमाल किया । वर्ष 1950 में प्रदर्शित फिल्म बड़ी बहन में अपने संगीतबद्ध गीत..चुप- चुप खड़े हो जरूर कोई बात है..की सफलता के बाद हुस्नलाल-भगतराम फिल्म इंडस्ट्री में चोटी के संगीतकारों में शुमार हो गए। इस गीत से जुड़ा एक रोचक तथ्य है कि उस जमाने में गांवों में रामलीला के मंचन से पहले दर्शकों की मांग पर इसे अवश्य बजाया जाता था। लता मंगेशकर और प्रेमलता द्वारा गाए इस गीत की तासीर आज भी बरकरार है। hb
साठ के दशक मे पाश्चात्य गीत-संगीत की चमक से निर्माता-निर्देशक अपने आप को नहीं बचा सके और धीरे धीरे निर्देशकों ने हुस्नलाल-भगतराम की ओर से अपना मुख मोड़ लिया। इसके बाद हुस्नलाल दिल्ली चले गए और आकाशवाणी में काम करने लगे, जबकि भगतराम मुंबई में ही रहकर छोटे-मोटे स्टेज कार्यक्रम हिस्सा में लेने लगे। भगतराम 26 नवंबर 1973 को बड़ी ही खामोशी के साथ इस दुनिया को अलविदा कह गए । हुस्नलाल इससे पहले 28 दिसंबर 1968 को चल बसे थे।

Vaidambh Media

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