भारतीयता के सम्मान में छोड़ी प्रोफेसर की नौकरी

विपक्ष कमजोर करना चाहते हैं! आप जब तक उधर हैं, तब तक हमें इधर बैठने दें, तभी सरकार ईमानदारी से काम कर सकेगी:-प्रो.शिब्बन लाल

गुलाम भारत में सामाजिक आन्दोलन व स्वतंत्रता के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने का जज्बा रखने वालो ने आजाद भारत में भी इसके लिए उसी जज्बे के साथ लड़ाई लड़ना जारी रखा। आजीवन गरीबो के दर्द को अपना समझकर निरन्तर उन्हे मुख्यधारा में शामिल करने के लिए जमीनी संघर्ष करने वाले नेताओं को वर्तमान समय में याद करना भी जरूरी नहीं समझा जाता, जबकि राजनीति के गलियारों में जिन्हें वंशवाद की सौगात इत्तेफाक से मिल गयी है वे अपने पूर्वजों के नाम रोशन करने में अपनी सारी क्षमता लगाये हुए हैं। हमारा सवाल उन महापुरूषों की ओर से है जिन्होंने आजीवन देश व समाज के उत्थान के लिए समर्पित कर दिये।
हम आज भारत के संविधान सभा के एक प्रमुख सदस्य प्रोफेसर शिब्बन लाल सक्सेना की बात कर रहे हैं। बरेली जनपद के रहने वाले सक्सेना जी का जन्म उनके ननिहाल में आगरा के बलिया गांव में हुआ था। गोरखपुर से उनका रिश्ता 1930 में बना। वह यहां सेण्ट्रएण्डयूज कालेज में गणित के प्रोफेसर बनकर आये। एक वर्ष अध्यापन के दौरान ही उन्होंने दर्शन शास्त्र में परास्नातक भी करना प्रारम्भ कर दिया। तीन वर्ष के सेवाकाल के बाद उन्हें देशप्रेम का दण्ड भोगना पड़ गया। चूंकि प्रबंधन चाहता था कि प्रोफेसर यूरोपियन पोशाक पहनकर ही महाविद्यालय में आयें। इसका अनुपालन नहीं करने पर तीन प्रवक्ताओं जगरनाथ सिन्हा, कुंवर बहादुर श्रीवास्तव व शिब्बन लाल सक्सेना को सेवा से हटा दिया गया। सेवा से मुक्त शिब्बन लाल के पास मौका था कि वह मैनेजमेण्ट से क्षमा प्रार्थना कर नौकरी में पुनः वापस हो जाए लेकिन उन्होंने इसे दमनकारी व व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता पर कुठाराघात बताते हुए त्याग दिया। तत्कालीन राजनीति में भारत की स्वतंत्रता का मामला गरम था। सभी विद्वजन प्रमुख शहरों की ओर भागमभाग लगाकर स्वयं को प्रसिद्ध दिलाने में लगे हुए थे। ऐसे में राष्ट्रीय जागरण आन्दोलन को सामाजिक बल देने के लिए प्रोफेसर सक्सेना ने पूर्वांचल के सभी पिछड़े क्षेत्र महराजगंज को चुना। उन्होंने यहां से स्वतंत्रता संघर्ष आरम्भ किया। गणेश शंकर विद्यार्थी को आदर्श मनाने वाले सक्सेना जीवनभर सभी धर्म व जातियों को एकजुट होकर गरीब की आवाज बनने के लिए प्रेरित करते रहे। स्वतंत्रता संघर्ष में उन्हें छद्म नेता कहा जाता था कारण था कि वह नरम व गरम दोनों दलों का बराबर सम्मान करते थे। वर्तमान में गोरखपुर शहर में शामिल हो चुका धर्मपुर गांव में प्रोफेसर क्रान्तिकारियों को प्रश्रय देने के लिए एक घर किराये पर ले रखे थे। जनजागरण आन्दोलन के नेतृत्व में उन्हे कई बार जेल जाना पड़ा। ब्रिटिश सरकार के अपराधिक रिकार्ड गोरखपुर षडयंत्र काण्ड में भी मुख्य अभियुक्त बनाया गया। तत्कालीन डीआईजी मिस्टर लक ने अपनी पत्नी को लिखे पत्र में प्रोफेसर को बहुत भला-बुरा कहा है, जो सार्वजनिक हो गया। वयोवृद्ध पत्रकार श्यामानन्द के मुताबिक गोरखपुर षडयंत्र काण्ड में जिन्दा-मुर्दा पकड़ने पर ईनाम रखा गया था। महराजगंज के गबडुआ गांव में एक शुभचिन्तक के ठहरे होने पर पैसे के लालच में शुभचिन्तक द्वारा पुलिस से गिरफ्तार करवा दिया गया जिसमें उन्हें सरेआम गोली से उड़ाने का आदेश हुआ। निशानची गोली चलाने के लिए तैयार, छायाकार फोटो बनाने में जुटे थे इसी बीच शुभचिन्तक अपनी ख्याति जताने की इच्छा प्रबल हुयी। वह शिब्बनलाल के पास पहुंच गया इसी बीच गोली चली और वह शुभचिन्तक ढेर हो गया। चूंकि घटना सार्वजनिक थी, भगवान का चमत्कार जान पब्लिक भड़क गयी और आक्रोशित जनता का सामना करने की कुबूत अंग्रेज सिपाहियों में नहीं रह गयी वे भाग खड़े हुए। जनजागरण अभियान जारी रखने के लिए प्रोफेसर शिब्बनलाल एक क्षेत्रीय अखबार ‘बवंडर’ निकालते थे। देश आजाद हुआ तो इन्हे संविधान सभा का सदस्य बनाया गया। प्रथम लोकसभा चुनाव में यह हार गये और इन्हे न्यायालय का सहारा लेना पड़ा और अपने अडि़यल सिद्धान्तवादी स्वभाव के कारण इन्हांेने अपना पक्ष प्रस्तुत कर चुनाव रद्द घोषित करवाया। 1954 में महराजगंज लोकसभा का पुनः चुनाव हुआ जिसमें प्रो.शिब्बन लाल ने मदन मोहन मालवीय के सुपुत्र गोविन्द मालवीय को भारी मतो से हराया। सिद्धान्त व सामाजिक मूल्यों के विपरीत समझौता नहीं करने वाली प्रो.सक्सेना रफी अहमद किदवई के नेतृत्व में किसान मजदूर प्रजा पार्टी की स्थापना किये, बाद में किदवई के पुनः कांग्रेस में वापस जाने से पार्टी का सारा दायित्व इन्हीं के कंधो पर आ गया। केएमपीपी का राष्ट्रीय कार्यालय गोरखपुर के घोषकम्पनी चैराहे पर बनाया और अपनी राजनीतिक समर्थता सिद्ध करने के लिए पांच पाण्डवो की टीम खडी की। सिसवा विधानसभा से मदन पाण्डेय, फरेन्दा पश्चिमी से नरसिंह पाण्डेय, महराजगंज सदर से दुर्योधन प्रसाद, नौतनवां से अब्दुल रऊफ लारी, श्यामदेउरवा से अमरनाथ मिश्र को कांग्रेस के विरूद्ध विधानसभा जिताकर राजनीतिक क्षमता का लोहा देश भर के नेताओं को मानने के लिए विवश कर दिया। उन्होंने शिक्षा को पिछड़े क्षेत्रों में ले जाने का सर्वथा वकालत करते रहे। महराजगंज में गणेशशंकर विद्यार्थी के नाम पर विद्यालय की स्थापना, फरेन्दा में लाल बहादुर शास्त्री कालेज की स्थापना इसका जीता जागता उदाहरण है।
पूरे जीवनकाल में उन्होंने अपना स्थायी आवास नहीं बनाया। क्षेत्र भ्रमण के लिए एक लैण्डरोवर जीप तथा उसका चालक धर्मराज यादव यही उनके सहायक रहे। आजीवन समाजसेवा के लिए अपनी शादी नही किये। प्रापर्टी बनाने का कभी लोभ भी मन में नहीं आया। गोरखपुर या अन्य जगहों पर जहां भी जाते रेलवे स्टेशन का प्रतीक्षालय ही इनका आजीवन वासस्थान रहा। 1952 में जब प्रदेश सरकार का गठन हो रहा था इस समय प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविन्द बल्लभ पंत ने प्रो. सक्सेना को मंत्रिमण्डल में शामिल होने का आमंत्रण दिया। प्रोफेसर सक्सेना ने बड़े साफ शब्दो में दो टूक में जवाब दिया -‘ विपक्ष कमजोर करना चाहते हैं! आप जब तक उधर हैं, तब तक हमें इधर बैठने दें, तभी सरकार ईमानदारी से काम कर सकेगी ।’ महराजगंज के प्रसिद्ध पत्रकार दीपकशरण बताते हैं कि चैधरी चरण सिंह राजस्व मंत्री थे और महराजगंज में भीषण बाढ़ आयी हुयी थी। बतौर सांसद प्रो.सक्सेना ने सरकार पर इतना दबाव बना दिया कि प्रदेश सरकार ने चैधरी चरण सिंह को क्षेत्र दौरा करने के लिए भेजा। तत्कालीन जिलाधिकारी गोरखपुर ने अपने मिजाज के मुताबिक जगह तय कर चैधरी जी को बाढ़ क्षेत्र का दौरा कराया। आज के सांसदो की तरह मंत्री के पीछे चलने वाले नेता नहीं थे प्रो. सक्सेना। जब राजस्व मंत्री दौरा कर रहे थे तब प्रो.सक्सेना सिसवा क्षेत्र में बाढ़ पीडि़तो की मदद कर रहे थे। शाम को जब प्रो.सक्सेना गोरखपुर डाकबंग्ले पर चैधरी चरण सिंह से मिलने पहुंचे तो दोनों के बीच इतना गरम बहस हुयी कि चैधरी तमतमाकर उसी समय शिब्बन लाल के साथ चलने को तैयार हो गये फिर क्या था, कभी न थकने वाले प्रो.सक्सेना अपनी जीप में सवार हो राजस्व मंत्री के साथ वास्तविक तस्वीर दिखाने निकल पड़े, नतीजा कलेक्टर को माफी मांगनी पड़ी और उसे लापरवाही में निलंबित भी होना पड़ा। वर्ष 1954, 1957, 1971, 1977 में महराजगंज से सांसद चुनकर जाने वाले प्रोफेसर शिब्बन लाल का निधन वर्ष 1988 में ट्रेन में बीमार हालत में गोरखपुर से लखनऊ का सफर करते हुए रास्ते में हो गयी।
संविधान सभा के उन सदस्यो को जिनकी पीढ़ी राजनीति में है, उनके नाम पर योजनाएं, सड़क, संस्थान आदि झूमकर संचालित हो रहे हैं। उन्हीं की कड़ी में सामाजिक योद्धा प्रोफेसर शिब्बन लाल सक्सेना की पहचान के लिए एक स्टेचू तक नहीं लगाया जा सका! ऐसे तमाम महापुरूष जिन्होंने हमारे व आप के लिए जीवन का सर्वस्व न्यौछावर कर दिया उन्हे हम क्या थोडा सा सम्मान देने लायक भी नहीं हैं!

धनंजय

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