भारत में मध्यवर्ग का दायरा !

हमारा यह बड़ा बाजार खरीदेगा क्या ?

 New Delhi : बहुत बड़ा बाजार है भारत ! यह भ्रम समूचे विश्व को सहना पड़ रहा है क्योंकि हमारी सरकार इसकी मार्केटिंग कर रही है। लोग जादा होने से बाजार को बड़ा या समृद्ध कहना बेमानी कही जायेगी ! भारत का मध्य वर्ग अपनी जीवीका जरुरतों से संघर्ष कर रहा है! उच्च व योग्य डिग्री धारक युवाओं की फौज ,जिन्हें दो जून की रोटी की तलाश है।comon man देश का समृद्ध किसान जिसके घर में पिछले एक साल से अनाज नहीं है। प्रोफेशनल डिग्री देने वाले कालेज; कभी जितनी तेजी से विकसित हुए उतने ही तेजी से बंद हो रहे हैं। स्वास्थ्य सेवाओं का एक्सपोर्ट करने की वकालत करने वाले देश के प्रधान को समझना होगा कि देश का स्वस्थ्य बहुत तेजी से गिर रहा है। जिसे दुनिया में चीख-चीख कर बाजार बताया जा रहा है ,उसकी जरुरतें कितनी हैं ? आम आदमी को पब व डिस्को एक दिन ले जा सकते हो उसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा पर वही यदि उस ब्यसन का आदी हो गया तो खुद कंगाल हो जायेगा .फिर इस बड़े बाजार में भूखोद्धार कार्यक्रम चलाना पड़ेगा । हमारा यह बड़ा बाजार खरीदेगा क्या ? commanmanयहाॅ का किसान सूखे की मार से लाचार है। मृगमरीचिका बनीं सरकारी नौकरी के पीछे दिवानों की तरह भागते हुए पढ़े-लिखे उच्च डिग्री धारक लोग हाथ पैर तुड़वा रहे हैं । महिलाओं को बच्चा पैदा करने की नशीहत है। आज देश का वास्तविक हाल ये है कि 70 प्रतिशत घरों में रहने वाला आम आदमी पूरे भोजन नहीं करता क्या इसी बाजार में अपना उत्पाद बेचेगी मेक इन इण्डिया ! चलिये मान लिया कि यह क्रंतिकारी कदम है पर देश की जनता का हाल जाने बिना भविष्य के फैसले लेना कितनी बड़ी बुद्धिमानी है। यहाॅ का आम आदमी बाजार के लायक नहीं रह गया ! बेकारी ,भूखमरी, अनुत्पादकता , गिरता स्वास्थ्य व शिक्षा का स्तर रुपये के आधार पर भारी अंतर से बॅटता समाज आने वाले समय में क्या दिन दिखायेगा कहना कठिन है! ऐसे झंझावतों , सवालों के बीच राहुल जैकब की रिर्पोट पर एक नजर–

लक्जरी रिटेलर संघर्षरत हैं क्योंकि शेयर बाजार में मंदी है

‘विकास और खपत को लेकर अत्यधिक आशावादी अनुमानों ने विदेशी निवेशकों को भ्रमित किया। अधिकांश नागरिकों को अभी भी मध्य वर्ग में शामिल होने के पहले लंबी दूरी तय करनी है।’mallअमेरिकी थिंक टैंक डिमांड इंस्टीट्यूट द्वारा हाल में जारी की गई यह रिपोर्ट चीन के बारे में है लेकिन इसके निष्कर्ष भारत पर एकदम सटीक ढंग से लागू होते हैं। डिमांड इंस्टीट्यूट ने पाया कि चीन की प्रति व्यक्ति खपत वर्ष 2025 तक बढ़कर महज 4,400 डॉलर हो सकेगी जो अमेरिका के 32,000 डॉलर के मौजूदा स्तर से बहुत कम है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह वृद्घि बहुत अच्छी है, यह अपेक्षाकृत कमजोर प्रति व्यक्ति आधार से आ रही है और यह 2025 तक भी अधिकांश परिपक्व बाजारों की तुलना में कमजोर बनी रहेगी। डिमांड इंस्टीट्यूट की यह रिपोर्ट उस दिन प्रकाशित हुई जिस दिन लुई वितां ने कहा कि वह चीन में अपने तीन स्टोर बंद कर रही है। अब पूरे चीन में उसके करीब 50 स्टोर रह गए हैं। लक्जरी रिटेलर संघर्षरत हैं क्योंकि शेयर बाजार में मंदी है, भ्रष्टïाचार पर सरकार सख्त है और मध्य वर्ग का आकार अपेक्षाकृत छोटा है।

भारत का मध्यवर्ग बहुत छोटा है!

माना जा रहा था कि चीन और भारत जैसे देशों में मौजूद व्यापक नया मध्य वर्ग विश्व अर्थव्यवस्था में मांग को बढ़ावा देगा लेकिन अब यह विचार सही नहीं प्रतीत हो रहा है।middle_class_  उपरोक्त रिपोर्ट के सामने आने के कुछ सप्ताह पहले ही क्रेडिट सुइस ने अपनी वैश्विक संपदा रिपोर्ट जारी की थी। इस रिपोर्ट में कहा गया कि मध्य वर्ग वह है जहां चीन और ब्राजील में किसी वयस्क के पास 28,000 डॉलर की संपदा हो। मलेशिया, रूस और थाईलैंड में इसके लिए 18,000 डॉलर का स्तर तय किया गया जबकि भारत में केवल 13,700 डॉलर। यह अंतर इसलिए क्योंकि कम प्रतिव्यक्ति संपत्ति वाले देशों में वस्तुओं एवं सेवाओं की लागत भी कम होने की उम्मीद है। ऐसे में भारतीय मध्य वर्ग को देश की कुल आबादी का करीब 3 फीसदी माना जा सकता है जबकि चीन और लैटिन अमेरिका में यह यह स्तर 11 फीसदी है। रिपोर्ट के मुताबिक मध्य वर्ग का आंकड़ा उत्तरी अमेरिका में 51 फीसदी से अधिक है जबकि चीन, लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और भारत में ये आंकड़े मायने ही नहीं रखते। कुपोषण की घटनाओं और गरीबी के आंकड़ों को देखा जाए तो भारत वैश्विक स्तर पर एकदम निचले तल पर है। उसके मध्य वर्ग की स्थिति अफ्रीका से बहुत बेहतर नहीं है।

भारत में मध्यवर्गीय परिवार

हमारी व्यय शक्ति की सीमा का संकेत अलीबाबा के एक दिवसीय प्रमोशन से भी सामने आती है।kamkaji mahila इस ई-कॉमर्स वेबसाइट की सालाना एकदिवसीय मेगा सेल ने 11 नवंबर को अकेले एक दिन में 14.3 अरब डॉलर का कारोबार कर डाला। एसोचैम और डेलॉयट के हालिया अध्ययन मे यह अनुमान लगाया गया था कि भारत का कुल ई-कॉमर्स कारोबार वर्ष 2015 में 16 अरब डॉलर का रहने की उम्मीद है। चीन के मध्य वर्ग की कुल संपत्ति 73 खरब डॉलर की है। यह भारत के मध्य वर्ग से 10 गुना ज्यादा है। भारत के छोटे मध्य वर्ग की समस्या इस तथ्य से और बढ़ जाती है कि राष्टï्रीय खपत में इसका योगदान अत्यंत विसंगत है। भारत में एक मध्यवर्गीय परिवार की औसत संपत्ति शेष आबादी की संपत्ति के 10 गुना है। क्रेडिट सुइस का अध्ययन बताता है कि ऐसे देशों में मध्य वर्ग के सदस्य दरअसल मध्यवर्गीय नहीं हैं। बल्कि वे वितरण में शीर्ष पर हैं और उनसे ऊपर केवल गिने चुने लोग ही हैं।

बाजार का खरीददार सूखे के चपेट से बेहाल

वर्ष 2007-08 के वित्तीय संकट के बाद से धीमी वृद्घि दर के कारण मध्य वर्ग की संपत्ति और उनकी संख्या में कमी आई। mahngaiतब से अब तक उनकी वृद्घि कोई खास नहीं रही है। वर्ष 2008 से 2015 के बीच देश के मध्य वर्ग में केवल 66 लाख लोग ही जुड़े। जबकि वर्ष 2000 से 2015 के बीच यह इजाफा 4.36 करोड़ का था। इस धीमी वृद्घि का असर उपभोक्ता वस्तु निर्माता कंपनियों के परिणामों पर दिख रहा है। उन्होंने कीमतें कम करके जिंस कीमतों में कमी का लाभ उपभोक्ताओं को दिया है लेकिन इसके बावजूद खरीदारों में स्पष्टï कमी देखी जा रही है। हिंदुस्तान यूनिलीवर के मुताबिक उसके उपभोक्ता शैंपू की बॉटल के बजाय सैशे खरीद रहे हैं। वे डिटर्जेंट के भी छोटे पैकेट खरीद रहे हैं। ग्रामीण बाजारों की मांग कमजोर बनी हुई है क्योंकि तमाम राज्य सूखे की चपेट में हैं। शुरुआती वर्षों में ग्रामीण मांग में बढ़ोतरी शायद जिंस कीमतों के अनुकूल होने तथा मनमोहन सरकार द्वारा शुरू की गई ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की वजह से थी। अब उम्मीद की जा रही है कि सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद खपत और खर्च में इजाफा होगा। बहरहाल, भारतीय जनता पार्टी अक्सर देश की तेज जीडीपी वृद्घि की बात करती है। अगर आर्थिक प्रगति की बात करना आर्थिक गतिविधि का परिचायक है तो भारत को वास्तव में पूर्वी एशियाई टाइगर माना जा सकता है। ठीक चीन या सन 1990 के दशक के थाइलैंड के तर्ज पर।

अर्थब्यवस्था खो रही है अपनी गति!

गत माह जारी आंकड़े बताते हैं कि अक्टूबर में आर्थिक वृद्घि दर्ज की गई है लेकिन यह गलत हो सकता है। narendra_modi_dhaka_ऐंबिट सिक्युरिटीज के सौरभ मुखर्जी बताते हैं, ‘कई आशावादी लोग इन संकेतकों में साल दर साल आधार पर आए बदलाव को सुधार का संकेत बता रहे हैं। लेकिन यह बात ध्यान देने लायक है कि इन आंकड़ों में से कई का आधार प्रभाव बहुत कम है और इनके आधार पर किए गए साल दर साल आकलन पर कोई राय नहीं बनाई जा सकती।’  वह कहते हैं कि आंकड़ों का अधिक व्यापक विश्लेषण बताता है कि कोयला उत्पादन, दोपहिया वाहन बिक्री, गैर तेल बैंकिंग ऋण, ग्रामीण मेहनताने में सुधार के आंकड़ों से इतर अर्थव्यवस्था गति खोती नजर आ रही है। हकीकत में सुधार के बजाय आंकड़े निराश करने वाले हैं। देश का मध्य वर्ग बहुत छोटा है और कृषि अथवा विनिर्माण में उत्पादन में कोई बड़ी उछाल नहीं दिख रही।(B.S.)

Vaidambh Media

Previous Post
Next Post

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

hogan outlet online scarpe hogan outlet nike tn pas cher tn pas cher nike tn 2017 nike tn pas cher air max pas cher air max pas cher air max pas cher air max pas cher air max pas cher scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher