भूकंप: दिल्ली में कई भवन असुरक्षित ,नियमों का उल्लंघन कतई न हो

New Delhi: नेपाल में आए 7.8 तीव्रता वाले भूकंप से बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में जान-माल का नुक़सान हुआ जबकि राजधानी दिल्ली तक झटके महसूस किए गए थे. अब बहस इस पर छिड़ी है कि अगर सिस्मिक ज़ोन-4 के अंतर्गत आने वाली दिल्ली में नेपाल सी तीव्रता वाला ज़लज़ला आया तब क्या होगा?

दिल्ली खतरे में !

red-fort-new-delhiजानकार सिस्मिक ज़ोन-4 में आने वाले भारत के सभी बड़े शहरों की तुलना में दिल्ली में भूकंप की आशंका ज़्यादा बताते हैं.मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे शहर सिस्मिक ज़ोन-3 की श्रेणी में आते हैं.भूगर्भशास्त्री कहते हैं कि दिल्ली की दुविधा यह भी है कि वह हिमालय के निकट है जो भारत और यूरेशिया जैसी टेक्टॉनिक प्लेटों के मिलने से बना था और इसे धरती के भीतर की प्लेटों में होने वाली हलचल का खामियाज़ा भुगतना पड़ सकता है.इंडियन एसोसिएशन ऑफ स्ट्रक्चरल इंजीनियर्स’ के अध्यक्ष प्रोफ़ेसर महेश टंडन को लगता है कि दिल्ली में भूकंप के साथ-साथ कमज़ोर इमारतों से भी ख़तरा है.उन्होंने कहा, “हमारे अनुमान के मुताबिक़ दिल्ली की 70-80% इमारतें भूकंप का औसत से बड़ा झटका झेलने के लिहाज़ से डिज़ाइन ही नहीं की गई हैं. पिछले कई दशकों के दौरान यमुना नदी के पूर्वी और पश्चिमी तट पर बढ़ती गईं इमारतें ख़ास तौर पर बहुत ज़्यादा चिंता की बात है क्योंकि अधिकांश के बनने के पहले मिट्टी की पकड़ की जांच नहीं हुई है”.भारत के सुप्रीम कोर्ट ने कुछ समय पहले आदेश दिया था कि ऐसी सभी इमारतें जिनमें 100 या उससे अधिक लोग रहते हैं, उनके ऊपर भूकंप रहित होने वाली किसी एक श्रेणी का साफ़ उल्लेख होना चाहिए. फ़िलहाल तो ऐसा कुछ देखने को नहीं मिलता.
 प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए कितनी तैयार है दिल्ली

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दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र की एक बड़ी समस्या आबादी का घनत्व भी है. लगभग डेढ़ करोड़ वाली राजधानी दिल्ली में लाखों इमारतें दशकों पुरानी हैं और तमाम मोहल्ले एक दूसरे से सटे हुए बने हैं.भूगर्भशास्त्रियों के अनुसार दिल्ली और उत्तर भारत में छोटे-मोटे झटके या आफ्टरशॉक्स तो आते ही रहेंगे लेकिन जो बड़ा भूकंप होता है उसकी वापसी पांच सौ वर्ष में ज़रूर होती है और इसीलिए ये चिंता का विषय भी है.वैसे भी दिल्ली से थोड़ी दूर स्थित पानीपत इलाके के पास भूगर्भ में फॉल्ट लाइन मौजूद है जिसके चलते भूकंप की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.सवाल यह भी है कि दिल्ली भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए कितनी तैयार है.सार्क डिज़ास्टर मैनेजमेंट सेंटर के निदेशक प्रोफ़ेसर संतोष कुमार को लगता है कि पहले की तुलना में अब भारत ऐसी किसी आपदा से बेहतर निपट सकता है.उन्होंने बताया, “देखिए आशंकाएं सिर्फ़ अनुमान पर आधारित होती हैं. अगर हम लातूर में आ चुके भूकंप को ध्यान में रखें तो निश्चित तौर पर दिल्ली में कई भवन असुरक्षित हैं. लेकिन बहुत सी जगह सुरक्षित भी हैं. सबसे अहम है कि हर नागरिक ऐसे ख़तरे को लेकर सजग रहे और सरकारें प्रयास करें कि नियमों का उल्लंघन कतई न हो.”‘सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट’ की अनुमिता रॉय चौधरी का भी मानना है कि दिल्ली में हज़ारों ऐसी इमारतें हैं जिनमें रेट्रोफिटिंग यानी भूकंप निरोधी मरम्मत की सख़्त ज़रूरत है.नेपाल में अंतरराष्ट्रीय मदद पहुंच रही है लेकिन अब भी वहां चिकित्सा उपकरणों, खाद्य सामग्री और शवों को उठाने के लिए बॉडी बैग्स की ज़रूरत है.इस बीच नेपाल सरकार ने मंगलवार को बताया कि शनिवार को आए इस भूकंप में मरने वालों की संख्या 4,310 हो गई है जबकि आठ हज़ार लोग घायल हैं.भूकंप से भारत में भी 76 लोग मारे गए हैं.

             V.N.S.

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