भूमि अधिग्रहण बिल : अध्यादेश, कानून का विकल्प नहीं !

तात्कालिक समस्या नहीं है अधिग्रहण ; अप्रत्याशित हालात में सरकार लाती है अध्यादेश

Bhoomi adhigrahn   New Delhi: गत सप्ताहांत केंद्रीय मंत्रिमंडल ने वर्ष 2013 के भूमि अधिग्रहण अधिनियम में संशोधनों से संबद्ध अध्यादेश को तीसरी बार जारी करने का फैसला किया। ये संशोधन राजनीतिक खींचतान में उलझ गए हैं। इस मसले पर अधिकांश विपक्षी राजनीतिक दल एकजुट नजर आ रहे हैं। ऐसे में राज्य सभा में इसे पारित कर पाना मुश्किल साबित होगा। बहरहाल, अगर सरकार 2013 के कानून में बेहतरी के लिए सुधार करना चाहती है तो अधिग्रहण उसकी बड़ी तात्कालिक समस्या नहीं है। सिंचाई परियोजनाओं की स्थापना और फैक्टरियों के मामले में ऐसे बदलाव की आवश्यकता की बात करें तो यह सभी भारतीयों के हित में है, केवल निजी क्षेत्र के नहीं। उस लिहाज से देखा जाए तो अध्यादेश की आवश्यकता तब होती है जब अप्रत्याशित हालात हों और संसद का सत्र नहीं चल रहा हो।

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अध्यादेश कानून का विकल्प नहंी हैं। उनका इस तरह इस्तेमाल करना शक्तियों के बंटवारे का उल्लंघन है। जबकि शक्तियों का विभाजन देश के संविधान का आधार है। लेकिन कम से कम इस मामले में तो ऐसा ही प्रतीत हो रहा है कि सरकार अध्यादेश का इस्तेमाल संसदीय सहमति बनाने की कड़ी मशक्कत से बचने के विकल्प के रूप में कर रही है। यह गलत नजीर है । केंद्र ने शायद ही ऐसा कभी किया हो। प्रस्तावित संशोधनों को संयुक्त संसदीय समिति के समक्ष भेजा गया है जिसकी बीते शुक्रवार को पहली बार बैठक हुई।

An Indian farmer walks over wheat crop that was damaged in unseasonal rainfall and hailstorm at village Hathoj, outskirts of Jaipur, Rajasthan state, India, Tuesday, March 17, 2015. The recent rainfall over large parts of northwest and central India has massively damaged standing crops. (AP Photo/Deepak Sharma)

चूंकि संसदीय प्रक्रिया चल रही है इसलिए अध्यादेश को जारी करने का मंत्रिमंडल का फैसला समझदारी भरा नहीं । कहना न होगा कि वर्ष 2013 के कानून में बदलाव नहीं किया जाना चाहिए। पूरी प्रक्रिया बहुत जटिल साबित हो सकती है । इसमें बहुत अधिक समय और प्रयास लग सकते हैं । वर्ष 2013 के कानून के बारीक प्रावधानों के तहत बड़ी परियोजनाएं शुरू होने से पहले ही विफल हो सकती हैं। यह भी सच है कि फिलहाल है। कम से कम वित्त मंत्रालय का तो यही मानना है। मंत्रालय ने सूचना के अधिकार के तहत दी गई जानकारी में सेंटर फॉर मॉनिटरिंग द इंडियन इकनॉमी के कैपेक्स डाटाबेस के हवाले से यह बात कही है।

                                                                           संवैधानिक प्रावधान के साथ धोखा!

land bill acquistionइतिहास को खंगालें तो ज्यादा से ज्यादा यही पता चला है कि कुछ राज्य सरकारों ने अतीत में अध्यादेश का इस्तेमाल किया है। खासतौर पर सन 1970 के दशक और 1980 के दशक के आरंभ में बिहार में ऐसे कई दुरुपयोग देखने को मिले। बिहार के व्यवहार पर टिप्पणी करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने सन 1986 में कहा था, ‘कोई संवैधानिक संस्था अप्रत्यक्ष तौर पर वह काम नहीं कर सकती जिसे सीधे तौर पर करने की इजाजत उसे नहीं है। अगर कोई ऐसा संवैधानिक प्रावधान है जो किसी संवैधानिक संस्था को ऐसा काम करने से रोकता हो तो कोई अन्य उपाय अपनाकर या वैकल्पिक राह लेकर उस प्रावधान की भावना का हनन नहीं होने देना चाहिए। ऐसा होता है तो वह संवैधानिक प्रावधान के साथ धोखा है।’
संवैधानिक रूप से सही फैसला लेने के लिए थोड़ी प्रतीक्षा क्यों नहीं  ?

land billइससे बचने के लिए सरकार को संविधान की भावना के अनुरूप ही कुछ महीनों की प्रतीक्षा कर लेनी चाहिए और संसद का संयुक्त सत्र आहूत करना चाहिए । प्रधानमंत्री खुद भी कह चुके हैं कि वह संशोधन को ‘जीवन और मरण’ के मसले के रूप में नहीं देखते । ऐसे में यह बात पर्याप्त अजीब है कि वह संवैधानिक रूप से सही फैसला लेने के लिए थोड़ी प्रतीक्षा क्यों नहीं कर लेते ? अगर वर्ष 2013 का कानून कुछ और महीनों तक बदला नहीं जाता और अपने पुराने स्वरूप में बरकरार रहता है तो कोई आसमान नहीं फट पड़ेगा। चाहे जो भी हो अध्यादेश की मदद से शासन करना किसी भी तरह नियंत्रण बनाए रखने की ब्रिटिश परंपरा है। यह सही कदम नहीं है।( B.S.)

 

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