मत छीनों हमारा बचपन

किसी भी समाज की पहचान उसके बच्चो से की जानी चाहिए क्योंकि बच्चे ही समाज की भावी पीढी के प्रतिनिधि हैं। भविष्य की प्रगति, सुख व सम्पन्नता बच्चो के स्वास्थ्य व सर्वांगीण विकास पर निर्भर है। यानी बच्चो के विकास से ही समाज का विकास जुडा हुआ है। राष्ट्र को अपनी क्षमताओं का ज्ञान बच्चो के माध्यम से ही होता है।
हमारे देश की जनसंख्या का लगभग 40 प्रतिशत बच्चे हैं, जिसमें 1 करोड़ 60 लाख से अधिक बच्चे श्रमिक हैं और श्रमिक बल का 5 प्रतिशत है। भारतीय जनगणना की परिभाषा के अनुसार- एक बाल श्रमिक वह है जो दिन का बड़ा हिस्सा काम करने में लगाता है और 14 वर्ष से कम आयु का होता है। हमारे देश में बाल मजदूरी एक विकट समस्या है जिसका समाधान अभी तक नहीं हो सका है। गरीबी में पल रहे बच्चों की आंखों में सपने पलने से पहले कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ आ जाता है। उत्तर प्रदेश दूसरा ऐसा राज्य है जहां सर्वाधिक बाल श्रमिक है। परिवार के साथ जुडे बाल श्रमिक औसतन 7 घण्टे कार्य करते है जबकि किराये के बाल श्रमिक औसतन 8-9 घण्टे प्रतिदिन कार्य करते है। वर्तमान की अपेक्षा अगर हम अतीत में देखे तो पायेगें कि पहले बच्चे आज की तुलना में कहीं अधिक स्वतंत्र थेे, क्योंकि उनपर आधुनिकता का, विज्ञान का और प्रतिस्पद्र्वा का दवाब काफी कम था। उनके जीवन में विषमताएं कम थीं और रचनात्मकता का खुला आकाश ज्यादा।
निरन्तर बढ़ती प्रतिद्वंदिता का मुकाबला करने की जिम्मेदारी भी उनके कोमल कंधों पर डाल दी गई है। अपनी पीठ पर लदे बस्तों में बच्चे अपने अभिभावकों, शिक्षकों और समाज की महत्वकाक्षांओं का भार ढोते फिरने के लिए मजबूर हैं।
समाज मंे बडी संख्या ऐसे बच्चो की है जिन्हें भरपेट भोजन और मामूली शिक्षा भी नसीब नहीं है। देश में करीब दस करोड़ बच्चे स्कूल नहीं जा पाते। इनमें से छह करोड़ बच्चे मजदूरी करने पर विवश हैं।
दुर्गंध से भरे कूड़े पर फटे-चिथड़े पहनकर कुत्ते और कौओं से संघर्ष करते बच्चे जिनके तन पर न ढ़ग के कपड़े हैं और न रात गुजारनेे का ठिकाना।
देश की इस भयावह तस्वीर को बदलने की जिम्मेदारी सरकार के साथ-साथ हमारी भी होनी चाहिए । देश का भविष्य सुरक्षित रहे बेघर व बेसहारा न होने पाये इसके लिए हम सब इन बच्चो को प्यार व अपनापन दें पढने-लिखने में इनका सहयोग करें जिससे ये देश के योग्य नागरिक बन सकें।
हमारा सहयोग इनके साथ होना चाहिए जिससे इन्हें फुटपाथ पर न सोना पडे कल तक भले ही ये बेघर थे लेकिन अब इन्हें अनाथ होने से बचाना है। और हमें सभ्य नागरिक होने का कर्तव्य भी निभाना है।

डाॅ0 ऋचा शुक्ला

Previous Post
Next Post

hogan outlet online scarpe hogan outlet nike tn pas cher tn pas cher nike tn 2017 nike tn pas cher air max pas cher air max pas cher air max pas cher air max pas cher air max pas cher scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher