मनुष्य के श्रमराग में भोजपुरी

लोकनर्तक व लोकगीत क्षेत्रीय ,सामाजिक वातावरण के प्राणवायु हैं।दूसरे शब्दों में कहें तो ये मनुष्य की श्रमराग यात्रा के संसाधन हैं; प्रत्येक से हमारा वाक परिचय कराती है भोजपुरी। भोजपुरीलोक में सभी को स्थान प्राप्त है , अर्थात सृषिट के चर -अचर सभी समिमलित हैं। इन सबको लेकर चलना लोक संग्रह है और इनके बीच रहकर जीवन ब्यतीत करना लोयात्रा।
भोजपुरी मे मैं नही;सदैव हम का प्रयोग होता है। चरवाहे के पास भरपेट खाने को नहीं है फिर भी वह संसार के समस्त दु:खों को तुच्छ समझ रहा है,जिसे वह विरहा के माध्यम से ब्यक्त कर रहा है-
मन तोर अदहन, तन तोरा चाउर,
नयना मूग के दाल।
अपने बलम के जेवना जेवइतीं,
बिनु लकड़ी बिनु आग।
खेत मे काम कर रही सित्रयां ,फटे पुराने कपड़े पहने अपनी पारिवारिक समस्याओं ,घरेलू हिंसा से दो-चार होती ,फिर भी अपने परिवार को जोड़ने के प्रयास मे हैं-
संवरिया रे काहे मारे नजरिया ।
मारे नजरिया,जगावे पिरितिया
जइसे दुध मे पानी मिलत हए
वइसे मिलौं तेरे साथ
जइसे अकसवा में चिरर्इ उड़त हए
वइसे उड़ौं तेरे साथ।
लोकगीत व लोकनृत्य की लम्बी श्रृखला है इनमे एक से बढ़कर एक नगीने जड़े है। लोकनृत्यों की इसी श्रृखला में एक है फरुआही! जोश स्मृति का यह खेल, जिसे देख कर दर्शकों की सांसें थम जांए;करतब ऐसे कि कुछ देर के लिए ही सही, नृत्य के बड़े-बड़े दिग्गज बगले झाकनें लगें, सफार्इ ऐसी कि जादुगर खुद -बखुद खिांचे चले आयें। गवर्इ कलाकार इसे गाव -जवार मे खेलते हैं,रोजगार नहीं केवल मनोरंजन के लिएं।
फरुआही दो शब्दों के मेल से बना है। फरी(कलैया) तथा वाही (वाहक)।यह नृत्य पुरुष करते हैं। इसमे नृत्य की कुशलता के साथ युद्ध का कौशल भी देखा जा सकता है। एक तरह से इसे पौरुष का प्रदर्शन माना जाता है। यह आदि परम्परा से जुड़ा नृत्यखेल है जो अब लुप्तप्राय होने के कगार पर है। वर्ष 2007 में क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र द्वारा लोकोत्सव प्रतियोगिता के माध्यम से लोकनृत्य की अनोखी प्रस्तुति की गयी। जनपद के ब्रहम्पुर ब्लाक के बेलवां निवासी छेदीलाल यादव और साथियों ने फरुआही लोकनृत्य पेश किया,जिसकी चर्चा पूर्वांचल के अलावां अन्य प्रदेशों मे भी रही। कुछ जनपद जैसे- देवरिया,बस्ती ,पड़रौना,मउं, आजमगढ़,बनारस,जौनपुर,बलिया,गाजीपुर बिहार के गोपालगंज ,सीवान,छपरा,बक्सर,आरा जिलों मे इसकी धूम रही है।
भोजपुरी जोशीली भाषा है। इस जोश को प्रदर्शित करने का काम बिरहा से बढि़यां कौन कर सकता हैघ् कहानी हो या उपदेश, नैतिकता हो या समाज को संदेश अथवा कोर्इ घटना, सबकोे लयबद्ध कर आम लोगो तक पहुचाने का सशक्त माध्यम है बिरहां । आजकल इसके स्रोता ट्रक ड्रार्इवर व पान की गुमटी तक सीमित हैं। लोकगायकों की नर्इ पौध इस ओर नहीं आकर्षित हो रही।इसका कारण शयद भोजपुरी की आत्मा पर चोट करने वाले फूहड़ गीत हैं जो धीरे -धीरे स्रोताओं को फोक के नाम पर भटकाने का कुतिसत प्रयास कर रहें हंै।
बिरहा हमारी पुरबिया संस्कृति की पहचान है। अमर गायक बलेसर के बिरहा की वह लाइन-
मंगल पांण्डे बलिबेदी पर कटवलें गरदनवा हो।
सन सत्तावन र्इसवी में होगइलें बलिदनवा हो ।।
देशभकित की ऐसी मिठास कौन दे सकता है, राष्ट्र वंदना के साथ-साथ अपने पड़ोसी को भी उसकी उपलबिध की बधार्इ बिरहा में ही मिलती है-
विजय पताका गड़ गया ढ़ाका, नाच रहा बंगाल बांवरा हो गया है।
विजयश्री का लगा के टीका, नाच रहा बंगाल बांवरा हो गया है ।।
लाख संकटों के बाद भी बिरहा का जलवा आज भी कायम है ।महराजगंज जिले ंके लोक गायक ओम प्रकाश यादव पूर्वांचल की पहचान बिरहा की ज्योति सुदूर क्षेत्रों के स्रोताओं तक पहुचा रहें हैं। इन सब के बावजूद पुरबियों मे मिठास घोलने वाले संगीत, जोश भरने वाले फोक को बल देने के लिए सरकार तथा समाज के अगुआ लोगों को आगे आकर मार्गदर्शन करना होगा।

धनंजय  बृज
गोरखपुर

Previous Post
Next Post

hogan outlet online scarpe hogan outlet nike tn pas cher tn pas cher nike tn 2017 nike tn pas cher air max pas cher air max pas cher air max pas cher air max pas cher air max pas cher scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher