मरणान्तं हि जीवनम् : परिवर्तन व मृत्यु के अधीन है जगत

       मधुर शांति प्रदान करने वाला बुद्घ Lord_Gautam_Buddha

बुद्घ वह है, जिसका नाम सत्य है। जिसके पास देखने के लिए आंख और समझने के लिए बुद्घि है, उसके लिए यह दुनिया, जिसमें हम रहते हैं, जन्म और मरण की, विकास और ह्रास की दुनिया है, जिसमें कोई भी वस्तु स्थिर नहीं रहती और न किसी चीज की कभी आवृत्ति ही होती है। इस दुनिया में भी कुछ भी स्थायी नहीं है। मरणान्तं हि जीवनम्। घूमते हुए चक्र को इस परिवर्तनशील संसार या सत्ता का प्रतीक माना गया है।

  शताब्दियों तक विश्व के मानचित्र पर चमकते रहे बुद्घ

बुद्घ कई शताब्दियों तक विश्व के मानचित्र पर चमकते रहे हैं। बौद्घ धर्म, दर्शन साहित्य और कला ने मानव जाति की एक बहुत बड़ी आबादी को सभ्य बनाया। बुद्घ का संदेश चीन, जापान, कोरिया, थाईलैंड, कम्बोडिया, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, तिब्बत और इंडोनेशिया तक फैला। BuddhistTemple2

गुप्तकाल में तो यह धर्म यूनान, अफगानिस्तान और अरब के कई हिस्सों में फैल गया था। ईसाई और इस्लाम के बाद दुनिया का आज भी यह तीसरा सबसे बड़ा धर्म है। यह कम अचरज की बात नहीं है कि नैतिकता का यह स्रोत, जो कि आज से लगभग 2600 वर्ष पहले प्रकट हुआ, आज भी अपनी पवित्रता और ताजगी को पूर्ववत रखे हुए है। आदमी की कमजोरी  है कि जरा, रोग और मृत्यु के अधीन होते हुए भी अज्ञान व अभिमान के कारण रोगी, वृद्घ व मृतक का उपहास करता है। यदि कोई अपने रोगी, वृद्घ या मृतक भाई को घृणा की दृष्टि से देखता है, तो वह स्वयं अपने साथ अन्याय करता है। आज भी बुद्घ को सबसे अच्छा उपदेशक और सदा से त्रस्त मानव जाति को मधुर शांति प्रदान करने वाला माना जाता है। Sri_lanka_aukana_buddha_statue

सम्राट अशोक के समय तो पूरे भारत और लंका में बौद्घ धर्म का ही दबदबा था। महात्मा गांधी से लेकर बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर ने जिस अहिंसा, शांति और भेदभाव को दूर करने का जो संदेश दिया था, उसकी प्रेरणा उन्हें गौतम बुद्घ से ही मिली थी। अम्बेडकर तो बौद्घ धर्म के ही अनुयायी बने।

               वैशाख पूर्णिमा
बुद्घ का जन्म वैशाख पूर्णिमा को हुआ था। इसी दिन उन्हें बोध (निर्वाण) प्राप्त हुआ और इसी दिन उन्होंने अपने शरीर का त्याग किया।   आज के नेपाल के लुम्बिनी में उनका जन्म, बिहार (भारत) के बोध गया में उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ।Lumbini of Nepal

वाराणसी के सारनाथ में उन्होंने अपना पहला धर्मोपदेश दिया। कुशीनगर में उन्होंने अपनी देह को भी त्याग दिया। इसलिए ये चारों स्थल आज बौद्घ तीर्थ के रूप में जाने जाते हैं। उन्हें गौतम बुद्घ, सिद्घार्थ, तथागत और बोधिसत्व भी कहा जाता है। उनका संदेश ज्ञान, करूणा और प्रेम से परिपूर्ण है। बुद्घ ने कहा है कि परीक्षा करके हम उनके उपदेशों को ग्रहण करें। हमें किसी बाहृय आलम्बन पर निर्भर नहीं रहना चाहिए बल्कि स्वयं अपनी आत्मा को अपना आलम्बन बनाना चाहिए। हमारे अंदर आत्मा की जो आवाज उठती है, उसकी मांग पूरी होनी चाहिए। बुद्घ केवल रास्ता बताते हैं, उस पर चलने का कष्ट उठाना हरेक की अपनी जिम्मेदारी है। बुद्घ का गौरव उनके व्यक्तिगत अनुभव पर प्रतिष्ठित है।

कारणमय संसार कर्म के नियम से शासित है

ipalबुद्घ के अनुसार यह दृश्य जगत्, ये उत्पत्ति विनाशशील वस्तुएं, यह कार्य कारणमय संसार कर्म के नियम से शासित है, और निर्वाण उस दुनिया की चीज है जहां वस्तुओं से परे केवल आत्मा का आधिपत्य है, जो सत्ता का केंद्र है। आदमी के अंदर वह शक्ति और संकल्प है, जो उसे संसार से उठाकर सत्य पर प्रतिष्ठित करता है। यदि आदमी अपने अस्तित्व की सीमाओं को तोड़ने में असफल रहता है तो वह मृत्यु का ग्रास बनता है, विनाश को प्राप्त होता है। उसे पहले शून्य का अनुभव करना है, तभी वह उसके परे जा सकता है। इस वस्तुमय जगत से परे पहुंचने के लिए आदमी को विनाश की वेदना का अनुभव होना आवश्यक है। उसके अंदर इस भावना का उदय होना आवश्यक है कि यह सारा दृश्य जगत जो कि परिवर्तन और मृत्यु के नियम के अधीन है, नितांत शून्य है।
दुनिया के अस्तित्व में आस्था> प्रयत्न करते रहो! 

कालातीत का अनुभव ही निर्वाण है   Buddha-Indonesia

बुद्घ ने निर्वाण का और उसके लिए प्रयत्न करते रहने का उपदेश देकर एक दूसरी दुनिया के अस्तित्व में आस्था प्रकट की है। उन्होंने कहा है कि काल प्रवाह से ऊपर उठना और बुद्घत्व प्राप्त करना मनुष्य के लिए सम्भव है। विशुद्घ सत्ता काल चक्र से ऊपर है। इसी पर संसार प्रतिष्ठित है, संसार निर्वाण में है। नित्यता काल में केंद्रित है। हरेक के अंदर एक ऐसी गुप्त शक्ति का निवास है जो उसे कालप्रवाह से मुक्त कर सकती है, जो हमारी अन्तरात्मा को बाहृय वस्तुओं के बंधन से हटा सकती है। जिससे हम अपने अंदर रहने वाले अमृत को खोज सकते हैं। उस क्षण में हमारे काल का विनाश हो जाता है, फिर हम काल के बंधन में नहीं रहते, बल्कि जो कालातीत है वह हमारे अंदर आ जाता है। काल के अंदर कालातीत का यह अनुभव ही निर्वाण है। सभी धर्मों ने इसी अंतिम और मूल रहस्य की खोज की है और अपरिपक्व भाषा तथा अधूरे प्रतीकों एवं कल्पनाओं के द्वारा इसी को व्यक्त करने की कोशिश की है। बुद्घ ने व्यक्ति की आत्मा को अत्यधिक महत्व दिया है।

    BY, निरंकार सिंह 

       V.N.S.

   

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