माइग्रेण्ट: शहरी मजदूरों से गावों मे फैल रही टीबी ?

” ये शहर में रोजगार तलाश कर कमा रहे मजदूरों पर आरोप नही है! विडम्बना है कि गाॅव से खेती में कमर तोड़ मेहनत के बाद भी कुछ हाथ नही लगनें से हताश ग्रामीण शहर आकर मजदूरी कर रहे हैं. प्रदूषण व शहरी जिंदगी से ताल- मेल नही tuberculosis-philippinesबिठा पाने के कारण कठिन परिश्रम करने वाला मजदूर बीमार पड़ जाता है.  असंगठित मजदूरों का स्वास्थ्य जिम्मदारों के लिये किसी वेश्या के ढले दिनों की तरह है। यह हमारे प्रगतिशील समाज का नंगा सच है। मजदूर जब शहर से शहर से निराश होकर गाॅव वापस आ जाता है तो बाहर से कमा कर बहुत कुछ करनें का सपना उसकी आॅखों में हर क्षण पानी भर देता है। ऐसे रोगी अवसाद मे चले जाते है। उन्हे मौत का इंतजार रहता है जीवन बोझ लगने लगता है। यही वह पल हैं जो उसके अपनों में टीबी का संक्रमण फैलाकर मरीजों की संख्या में बढोत्तरी करने का सुगम मार्ग बनता है । हमारे शोकाल   काउंसलर इस वक्त डीएमसी पर रजिस्टर में हस्ताक्षर कर चपरासी को ये हिदायत देते हुए जरुरी काम से चले जाते हैं कि कोई मरीज आये तो देख लेना! “

टीबी  संक्रमण से लड़ने के लिये रहना होगा उससे  दूना सतर्क !

 संक्रमित बीमरियों से निपटने के लिये होल लाइफ हेल्थ कार्ड की जरुरत !

Ghazipur: टीबी का प्रसार रोकने का सबसे महत्वपूर्ण तरीका है स्वास्थ्य के TB DOTS(3)प्रति जागरुक रहना। हमारे आस-पास बीमारियाॅ मकड़ी के जाल की तरह फैली हुई हैं। कुछ प्रत्यक्ष कुछ अप्रत्यक्ष ; टीबी के प्रति जागरुक रहकर हम समाज को इस बीमारी की पकड़ से दूर कर सकते हैं। चूंकि टीबी का संक्रमण बहुत तेजी से होता है इसलिये उससे लड़ने के लिये हमें उससे दूना सतर्क रहना होगा। सरकार टीबी से लड़ने के लिये ढेरों प्रयास कर रही है पर अपेक्षित सफलता नही मिल रही। देश में पैदा होने वाले बच्चे का स्वास्थ्य कार्ड बनता है जिस पर जरुरी टीका लगाने का समय सारिणी अंकित होता है। यदि यह स्वास्थ्य कार्ड बच्चे के पैदाइश से लेकर ब्यक्ति के मृत्यु तक के लिये बन जायें और निश्चित अवधि पर जाॅच कराना अनिवार्य हो जाय तो देश का बहुत धन व समय बच जायेगा ! देश में बीमारों की संख्या में कमी स्वतः होने लगेगी।

      डाट्स को चाहिए सबका साथ !

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Directly Observed Treatment (DOT)

सरकार के तरफ से चलायी जा रही तमाम योजनाओं की तरह ही टीबी इलाज के लिये समर्पित डाट्स भी मंदम- मंदम शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों मे समान रुप से चल रही है। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में सामाजिक ताने -बाने में टीबी की बीमारी व इसके इलाज को जानने की नियत से पहुॅचा तो यहाॅ भी देश के अन्य क्षेत्रों की तरह ही समस्याये जस की तस मिली। यहाॅ काम कर रही सामाजिक संस्था सेफ सोसाइटी के काय्रकर्ताओं के सहयोग से जिले की चार डीएमसी पर मरीजों का हाल जानने का प्रयास किया।
बीतेे अप्रैल मई व जून माह में टीबी मरीजों का आंकड़ा हमें जो प्राप्त हुआ…..
डीएमसी                      सम्भावित मरीज                       टीबी पाॅजिटिव
सदर                                      669                                        67
कॅासिमाबाद                          182                                        21
मोहम्दाबाद                           580                                       99
सुभंकरपुर                              52                                         06

कागजी आंकड़े दुंरुस्त रखने से  ठीक होगी टीबी ?

Brijraj Varma

dmc sadar kshetr

गाजीपुर जिले में कुल 33 डीएमसी छयरोग निदान के लिये कार्य कर रहीं हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से विश्व भर मे संचालित डाट्स यनि टीबी उन्मूलन का उद्देश्य इस तरह के आंकड़ों से अलग नहीं हो पा रहा। जागरुक कार्यकर्ताओं द्वारा ढूढ़कर अस्पताल भेजे गये ये उन मरीजों की संख्या है जिन्हे 15 से जादा दिन खाॅसी आते हो गये थे। भेजे गये 15 से 20 प्रतिशत मरीज में जाॅच के बाद टीबी पाई गई। ये आंकड़े बताते हैं कि समाज में स्वास्थ्य के लिये सौपा गया कार्य जिम्मेदार लोग इमानदारी से नहीं कर रहे। यदि करते तो मरीज कम से कम हफ्ते भर की खाॅसी के बाद अस्पताल जरुर जाता। हलाॅकि सरकारी महकमें इसके विपरीत राय रखतें हैं। जिले के मुख्य चिकित्साधिकारी का दावा है कि सभी केन्द्रों पर दवा व जाॅच हो रही है। मरीज भी निर्धारित मानक में आ रहे है। यहाॅ स्पष्ट करना जरुरी है कि सरकारी सेवायें बेहतर स्वास्थ्य के बजाय बेहतर रजिस्टर व निर्धारित आंकड़े पर ज्यादा घ्यान देते हैं।

समूह में काम करने वाले मजदूररों की नियत तिथि पर जाॅच करायें मिल!
sukhveer ag gajeepur ricemil majdoor sukhveer agro   गाजीपुर में जीवनयापन का मुख्य आधार खेती ही है छोटेमोटे उद्योग हैें। इनदिनों तेजी से हो रहे शहरीकरण का प्रभाव यहाॅ भी है। बुनकर और राइस मिल तथा आरा मशीन पर काम करने वाले मजदूर हैं। सर्वे के दौरान हमने सदर डीएमसी के अंतर्गत फतुल्लापंर राइसमिल में काम करने वालेें 800 लोगों के बीच टीबी के प्रति जानकारी को लेकर बातचीत की।यहाॅ 150 लोगों से बातचीत की जिसमें लगभग 70प्रतिषत लोगों को 15 दिन से जादा खाॅसी आते हो गई थी और वह दुकान से कफ् सिरप के अलांवा कोई चिकित्सकीय परामर्श नहीं लिये थे! मजदूरों के बीच टीबी को लेकर जानकारी से कहीं जादा भ्रंतियां है। कम्पनियाॅ इस तरह के मामले में कागजी दुरुस्त रहकर काम करती हैं ऐसे में मजदूर का बीमार होकर अस्पताल जाना नियत हो जाता है। हर जगह कागजी खानापूर्ति कोई स्वास्थ्य को लेकर गम्भीर नही दिखता। मील मालिक ऐसे सवालों से स्वएं को अछूत बनाये रखते हैं। ऐसी जगह जहाॅ मजदूर समूह में काम करते हैं वहाॅ टीबी के संक्रमण का खतरा बढ़जाता है। यहाॅ लेबर माइग्रेण्ट हाते रहते हैं। ऐसी जगहों पर स्वास्थ्य कक्षा या स्वास्थ्य परीक्षण अनिवार्य होना चाहिए । सुखबीर एग्रो का एच. आर. तो बात ही नही किया हाॅ स्वएं को प्रबंधक बताने वाले मनोज मित्रा ने स्पश्ट शब्दों में कहा कि मजदूरोें के स्वास्थ्य चेकअप को लेकर मिल की ओर से फिलहाल कोई ब्यवस्था नही है.

शहरी,  पलायनवाद गाॅव में टीबी प्रसार का बड़ा कारण !

Bangladeshi migrant workers unload sand from Indian owned boats on the Thane River near Ghodbunder Village in Maharashtra, India on March 15, 2013. As construction and industry drive a demand for sand, illegal sand mining is stripping riverbeds and beaches of sand with severe environmental consequences. The unregulated sand mining industry employs thousands of workers who depend on the mining for their livelihood. Photo by Adam Ferguson for WIRED

जिले की सदर कासिमाबाद ,मोहम्दाबाद, शुभांकरपुर डीएमसी क्षेत्र में टीबी माइग्रेण्ट होकर ही फैली है। यहाॅ महज दो प्रतिशत महिलाओं को टीबी है ऐसा उन घरों में है जिनके पति टीबी की बीमारी लम्बे समय तक पाले रहे। पुरुष जो इस बीमारी से ग्रसित है वह जब तक यहाॅ थे निरोग थे ये बीमारी उन्हे बड़े शहरों से मिली ।

Indian workers crush stone into sand at an Illegal mine near Raipur Village in Greater Noida, Uttar Pradesh, India on March 18, 2013. The mine was opposed by Raipur local Pale Ram Chauhan, who was murdered in his home after speaking out against local powerbrokers controlling the sand trade. As construction and industry drive a demand for sand, illegal sand mining is stripping riverbeds and beaches of sand with severe environmental consequences. The unregulated sand mining industry employs thousands of workers who depend on the mining for their livelihood and is controlled by local powerbrokers. Photo by Adam Ferguson for WIRED

रामसूरत ,खुर्शीद अहमद, इकबाल ये सब बीमार पड़ने के बाद गाॅव लौट आये यहाॅ 8 से 10 माह बाद पता चला कि टीबी है। खुर्षीद बतााते हैं कि हमने जीने की उम्मीद छोड़ दी थी। मुम्बई में पेण्ट पालिश का काम करते थे पूरा दिन बड़ा पाव खा कर गुजार देते थे । अचानक बुखार खॅासी शुरु हुआ फिर कई दिनो तक बिना खाये. पीये रहे। हारकर घर वापस चले आये। सदर बाजार के खालिदपुर बवाड़े निवासी 35 वर्षीय विजय ने बताया कि बड़े भैया मुम्बई में फ्लोर मिल पर काम कर रहे थे इस बीच उन्हे टीबी हो गया वो गाॅव चले आये लोकल स्तर पर इलाज हुआ कोई फायदा नही हुआ इस बीच आर्थिक तंगी में भैस बेच देनी पड़ी। पर वो चल बसे। कुछ दिन बाद पता चला उनकी पत्नी को भी टीबी है उनकी जाॅच सरकारी अस्पताल में हुई इलाज चल रहा है ठीक हैं। चार माह पहले मुम्बई से बीमार लौटे विजय ने डीएमसी पर जाॅच कराई तो पता चला कि उसे भी टीबी है। दो माह से घर पर रहकर इलाज करा रहे हैं। इन्हे चिकित्सक ने पौश्टिक भेजन की सलाह दी है । घर में कोई भी ब्यक्ति काम करने वाला नही ऐसे में आजिविका के लिये हल्क काम करके विजय भरण- पोषण का इंतजाम करता है।

डाट्स में ग्रम्य समिति का सहयोग आपेक्षित !
projects_agriculturaldevelopment_02डाट्स से बेहतर ब्यवस्था टीबी ईलाज की हो ही नही सकती। पर डाट्स की पहुॅच अंतिम ब्यक्ति तक क्यां नही हो पा रही यह सोेचनीय है। गाॅव में काम करने वाली सरकारी मशीनरी को इस तरह के प्रोजेक्ट में शामिल करते समय शायद इमानदारी नहीं बरती जाती। ग्रामसभा में ग्राम प्रधान के अलांवा ग्रम्य समिति के सदस्य होते है। गाॅव में लोग एक दूसरे का हाल चाल सुबह शाम लेते हैं। ये विडम्बना ही है कि ऐसे समन्वय वाली जगह पर भी मरीज को 15 दिन से जादा खाॅसी होने के बावजूद वह जाॅच के लिये अस्पताल नहीं पहुॅच पाता । टीबी जैसी कोई भी संक्रामक बीमारी सम्मिलित प्रयास से ही भगाई जा सकती है।

Vaidambh Media

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