मासूमो की मौत के बाद कुछ सबक लेगा मेडिकल कालेज ?

gorakhpurmedicalcollege गोरखपुर :  बीते पखवारे में मासुमों की मौत, माताओं के करुण क्रंदन तथा सिस्टम की जानलेवा,घोर लापरवाही से देश-विदेश में गोरखपुर शहर की क्रूर पहचान बनीं। यह पहचान चिकित्सासेवा के लिये समर्पित उच्च डिक्रीधारक (धरती के भगवान) और बुरी तरह दीमक लग चुके लोकतांत्रिक ब्यवस्था के संयुक्त प्रयास हैं। बाबा राघवदास मेडिकल कालेज गोरखपुर में मासूम की मौत के जितने भी कारण बताये जांय , सजा दी जाय पर उनमें सुधार नहीं लाया जा सकता ।  एक तरह से कहें तो इस मेडिकल कालेज के जीन में ही  खराबी आ गई है।मासूमो की मौत के बाद कुछ सबक लेगा मेडिकल कालेज ! उम्मीद की जा सकती है पर बिना सही पड़ताल के सब कुछ फेक है। प्रशासनिक कार्यवाही, जांच पड़ताल में जिन मुख्य बिंदुओं को छूना चाहिए वहां सम्भव है कि मेडिकल प्रशासन न जाने चाहे। यदि जाता या इसके पूर्व में कभी गया होता तो आज इस संस्थान की इतनी भद्द ना पिटी होती। बेबाकी से कहा जाय तो यहां भगवान स्वरुप चिकित्सकों के ब्यवहार में सेवा भाव कहीं नहीं दिखाई देता इसे खुद मेंडिकल कालेज में एक रात तिमारदार के रुप में गुजार कर देखा जा सकता है। इससे बी आर डी मेडिकल कालेज के नेहरु चिकित्सालय में भर्ती होनेवाला प्रत्येक मरीज व तिमारदार न केवल वाकिफ है बल्कि दुबारा यहां न आने की कसम खाता है। यहां हालात आज भी इतने बदतर हैं कि कइयो मरीज बिना कागज पत्तर के भगा दिये जाते हैं और मनमाना समय डालकर उक्त मरीज का डिस्चार्ज कार्ड बना दिया जाता है। मुख्यमंत्री के दौरे के अगले दिन यानी 11 अगस्त को बीआरडी मेंडिकल कालेज में हुई मासूमों की मौत की जानकारी उनके घर जाकर जुटाने के दौरान जो चैकाने वाले तथ्य सामने  आये वह समाज व देश के लिये भयावह है क्योंकि धरती पर मनुष्य को सबसे जादा विश्वास भगवान के बाद डाक्टर पर ही होता है।

चपर- चपर जबान ना चलाओ !

“टृक्का-टुक्का बिक जाइब लेकिन कवनों लइकन के लेके मेडिकल देखावे ना जाइब “ !
मेडिकल कालेज से करीब 10 किमी दूर स्थित गाॅव जंगल एकला मझिला टोला निवासी बहादुर निषाद् का 4 साल 2माह का बेटा दीपक बाहर दरवाजे पर ख्ेाल रहा था । उसके पापा पेण्ट पालिस का काम करते हैं सा 9 बजे रोटी खा कर काम पर निकल गये। लड़का दिन के 12 बजे अचानक उल्टी करने लगा उसे बुखार होने लगा। माॅ ,बच्चे को लेकर पास के चैराहे पर एक झोला छाप डाक्टर के पास भागी , लेकिन हालत बिगड़ने लगी उसे तुरंत मेडिकल जाने को कहा गया। अब तो बच्चे को झटका भी आने लगा था । किसी तरह दीपक को लेकर उसकी माॅ नेहरु चिकित्सालय पहुंची। दिन था 9 अगस्त 2017 । इस दिन मुख्यमंत्री मेडिकल कालेज दौरे पर आ रहे थे । दीपक की माॅ नंदिनी ने बताया कि, “इमरजेंसी मरीज को लेकर जब हम पहुंचे तो 2 बज रहा था हमें एडमिट पर्ची पकड़ाकर बैठने को कहा गया । हम बच्चे को लकर हाल में ही बैठ गये। बच्चे को झटका आना शुरु हो गया। इसी बीच मुख्यमंत्री के आने की सूचना हुई और बाहर निकलने वाले सारे रास्ते बंद कर दिये गये। “ उसने बताया कि ,“ बच्चे को  एक खुराक दवा तक नहीं दी गई। 2से 6 बजे तक कोई इलाज नही हुआ। जब मुख्यमंत्री चले गये उसके बहुत देर बाद चैनल खुला।  वो रोते हुए बताती रही कि , “हम रोते रहे, बच्चे को झटका आने से लार बार हो गया था, उसका शरीर तप रहा था। मैं चीख्ती रही बच्चे की तबियत बिगड़ रही है ईलाज नहीं कर सकते तो हमें जाने दो हम कहीं और ईलाज करायें हमें बंद क्यों रखा है। पर सब एक ही जवाब देते मुख्यमंत्री आये हैं डाक्टर लोग सी एम के साथ मिटिंग में ब्यस्त हैं।“ आखिर 6 बजे बच्चे का इलाज शुरु किया गया। डाक्टर से बीमारी के बारे में पूछने पर एक ही , “जवाब मिलता चपर चपर जबान ना चलाओ“ फिर बोतल लटकाकर चले गये, रात भर बच्चे को 7बार झटका आता रहा । कुछ समझ में नहीं आया। रात में दीपक के पिता बहादुर निषाद भी बच्चे के पास रहे। सुबह 8 बजे बच्चे की मौत हो गई। बहादुर से कहा गया कि पिछले रास्ते से डेडबाडी लेकर निकल जाओ। कोई डिस्चार्ज पेपर नहीं दिया गया। अब बहादुर मेडिकल कालेज दौड रहे हैं कि उनके बच्चे का डिस्चार्ज पेपर बन जाय। हलांकि उन्हे बताया गया कि 10 अगस्त को रात 10 बजे बच्चे की मृत्यु दिखाई गई है। मृतक बच्चे की दादी दोनो हाथ जोड़कर रोते हुए बोली टृक्का-टुक्का बिक जाइब लेकिन कवनों लइकन के लेके मेडिकल देखावे ना जाइब ।
ये मनमानापन क्यों ? सब मौन क्यों हैं ? कैसे सुधरेगी ब्यवस्था ?

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khushi

सी दिन 11अगस्त को दिन में 10 बजेें हुई एक बच्ची की मौत पर उसके परिजनों ने बताया कि,ईलाज में लापरवाही तो थी ही मेडिकल स्टाॅफ दुश्मन की तरह ब्यवहार करके हमें पहले ही त्रस्त कर दिया था। जंगल तुलसीराम के मांे0 जाहिद की 5 वर्षीय बच्ची  खुशी , 10 अगस्त को अचानक सायं 7 बजे बुखार उल्टी से परेशान हो गई पास में नजदीकी डा0 सीडी पाठक के यहां लेकर जाने पर पता चला कि हालत सीरियस है मेडिकल जाना पड़ेगा। 11 बजे मेडिकल कालेज पहुॅचने पर पर्ची तो बन गई पर बेड और ईलाज शुरु होने में  2 बज गये। इतने देर से ईलाज शुरु होने के बाद अब आक्सीजन नहीं मिल पा रहा था । थोड़ी-थोड़ी देर के लिये आक्सीजन देने के साथ अम्बू बैग दिया गया जिसे दबाते रहने के लिये कहा गया। जाहिद ने कहा कि उसको पक्का यकीन है कि उसके बच्ची की मौत आक्सीजन की कमी से ही हुई है। बच्ची की मौत हो जाने पर बेपरवाही से कहा गया कि लाश उठा कर जल्दी भागो ! जाहिद के मुताबिक एक दिन भर्ती रहने में 600/रुपये की दवा बाहर से लाकर दिया। बच्ची की मृत्यु होने पर हमसे सारे डाक्यूमेण्ट मेडिकल स्टाफ ने छीन लिये।

                “एम्बुलेंस तक नहीं दिया गया कि बच्चों का शव घर ले जा सकूं। “

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उसी दिन बाघागाड़ा के  एक दम्पति जिनकी शादी को 7 साल बाद पैदा हुए 10 दिन के जुड़वा बच्चे चल बसे। मेडिकल कालेज के100 नम्बर वार्ड में भर्ती थे। बच्चों के पिता ब्रहम्देव यादव ने बताया कि , “बच्चों केा लेकर जितने दिन भर्ती रहे डाक्टर से पूछते रहे कि बच्चे को क्या हुआ है लेकिन चिकित्सकों ने कुछ भी नहीं बताया। जब पूछने की कोशिश की बहुत बुरी तरह डाॅट कर भगा दिया गया। नर्स गाली से बात कर रहीं थी। ईलाज के दौरान पाइप ग्लब्स तक बाहर से खरीद के लाना पड़ा । 10 हजार की तो दवा बाहर से खरीदे। एनआईसीयू में बच्चों को रखा देखकर आप काॅप जायेंगे। चार फिट की उंचाई से बच्चे रोते हुए गिर जाते हैं , बाहर से देखने पर आप शिकायत करें तो  जूनियर डाक्टर व नर्स भद्दी गालियों से बात करते हैं। उसने बताया कि मेेरे जुड़वा बच्चे ईलाज के दौरान मेडिकल कालेज में मर गये मुझे एक एम्बुलेंस तक नहीं दिया गया कि बच्चों का शव घर ले जा सकूं। ”

नर्स ने कहा कि चलाते रहो तभी तुम्हारा बच्चा बचेगा नही तो यहां सब मरने ही आते हैं !

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पब्लिक हेल्थ सेण्टर खोराबार में चार दिन पहले हुई नार्मल डिलेवरी के बाद कृष्णा गुप्ता व मंजू के परिवार में अचानक शेाक छा गया। मजनूं चैराहा तरकुलहीं निवासी मंजू के नवजात बच्चे के पेट में अचानक दर्द होने लगा। लोकल सलाह पर बच्चे को लेकर मेडिकल कालेज गये कि बच्चे का उचित ईलाज वहीं सम्भव  है। 11 अगस्त को बच्चे के कहरने के साथ साढ़े नौ बजे उसकी ईह लीली समाप्त हो गई। कृष्णा के मुताबिक आक्सीजन कम होने के कारण मेडिकल कालेज मेे अफरा तफरी मची हुई थी।  उसने बताया कि डाक्टर से जितनी बार पूछा बेटे को क्या हुआ है तोे डांट कर भगा दिया गया। वेण्टिलेटर नहीं मिल पाया। हमें अम्बू बैग देते हुए नर्स ने कहा कि चलाते रहो तभी तुम्हारा बच्चा बचेगा नही ंतो यहां सब मरने ही आते हैं! बाद में एनआइसीयू में भर्ती किया गया पर कुछ हासिल नही हुआ। इन सभी बयानों में एक बात काॅमन रही वह है तिमारदार और मरीजों के साथ मेडिकल स्टाफ व धरती के भगवान यानी चिकित्सक का ब्यवहार सेवा का नहीं बल्कि गुण्डों जैसा है। हो सकता है यहाॅ भीड़ का दबाव जादा होने से ऐसा हो! पर क्या कोई सेवा करनेवाला  गुण्डागर्दी से वो हासिल कर पायेगा जो उसे करना होता है। निः संदेह नहीं। ऐसे में बीआरडी मेडिकल कालेज केवल मासूमों की मौत की मौत की सूचना प्रसारित  करने वाला दफ्तर बन कर रह गया है जबकि यहाॅ से डाक्टर पढ ़लिखकर मानव सेवा के लिये तैयार होते हैं। जब तक प्रेम घोलकर यहाॅ के चिकित्सक तिमारदार व मरीज को संात्वना नही देने लायक हुए इस मेडिकल कालेज व श्मशान घाट में कोई खास अंतर मेरी समझ से नहीं है।

Vaidambh Media

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