मासूम बच्चियाॅ क्या पहनें साहेब ?

    Gorakhpur : आदिमानव को कपड़े का ज्ञान नहीं था। हमें नहीं पता कि आदमी ने तन ढंकना कब शुरु किया? अतीत खंगालनें पर पता चलता है कि प्राकृतिक आपदाओं और बदलते मौसम से बचनें के लिये मनुष्य ने जानवर व पेड़ो की खाल व छाल का सहारा लिया। निरंतर बदलती जीवनशैली में सौंदर्य व श्रृंगार ने बहुत प्रगति की । आज समाज इसे ‘फैशन‘ के नाम से स्वीकार कर चुका है। यह इंण्डस्ट्रªी आज दुनियाॅ भर में सबसे महॅगी बताई जाती है। धरती की भौगोलिक संरचना पर भिन्न-भिन्न देशों में भिन्न-भिन्न परिधान वहाू के लोगों द्वारा धारण किये जाते हैं। कहीं पुरे कपड़े पहनने का रिवाज है तो आज भी कई द्वीप ऐसे हैं जहाॅ सभ्य लोग कपड़े उतार कर घूमते हैं । यहाॅ इस बात का जिक्र इसलिये करना पड़ रहा है क्योंकि देश में माॅसूम बच्चियों से लेकर बूढ़ी महिलाओं तक यौन हिंसा के मामले सुनें और जानें गये हैं। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।
बहुत से लोगों का मत है कि महिलायें कम कपड़े पहनती हैं इसलिये बलात्कार की घटनायें हो रहीं हैं! यह सही नही है। मासूम बच्चियाॅ क्या पहनें ? बूढी़ महिलायें क्या पहनें? और तो और जानवर भी इन भूखे भेड़ियों के निशानें पर हैं। जो अपराध घर में हो रहे हैं, प्रतिष्ठा के नाम पर झूठी शंान में बेटी-बहू की बलि चढाई जा रही है। ऐसे में किसकी नजर व दिमाग खराब है, समाज को तय करना होगा। उत्तर -प्रदेश पुलिस की ओर से जारी एक बयान तो और भी शर्मिंदा करतें हैं कि- “यहाॅ मोरंजन के साधन बहुत कम है, इसलिये पुरुष यौन अपराध की ओर बढ रहे हैं।” पुलिस ने बढ़ते आधुनिक टेक्नाॅलजी व इण्टरनेट को भी इसका कारण बताया। जबकि देश के प्रधानमंत्री पूरे देश में घंूम-घंूम कर टेक्नांेलॅाजी की वकालत करते रहे। यह हमारे सिस्टम की बहानेबाजी कब खत्म होगी पता नहीं। हाॅ एक बात तो तय है कि महिलाओं को दोष देनेवाले लोगों को अपनी परम्परागत पुरुष मानसिकता को तजना होगा। इसी गम्भीर बीमारी से हमारा समाज पीड़ित है। बहुत सारे डिबेट में हमने देखा कि महिलाओ ने स्वीकार किया कि कम कपड़े महिलाओं को नहीं पहनना चाहिये। आप महिलाओं के पक्ष में खड़े हुए नहीं कि ट्रोल होना शुरु हो जाओगे। बलात्कार यानि जबरदस्ती किया जानेवाला कृत्य। महिलाओं पर जबरदस्ती थोंपने की आदत आज भी हजारों परिवारों में प्रत्यक्ष देखने को मिलती है। विवशता ये है कि सरकार व समाज का समर्थन भी इन्हे ही प्राप्त होता है। जबकि महिलायें आज पायलट,सैन्य अधिकारी , डाक्टर ,वैज्ञानिक, प्रशासनिक अधिकारी बन कर सीना तानें चल रहीं हैं। विरोध करनेवाले कमेंट पास करते रहें। बहुत से मामले में तो उनका चलना -बोलना तक शोकाॅल पुरुष को पसंद नहीं आया और कोई जघन्य कृत्य कर दिया। ऐसे लोगों को कोई शह नहीं मिलनी चाहिये। कुछ लोग इस मौके पर महिलाओं को उक्त घटना का जिक्र कर डरानें की कोशिश करतें हैं। ये स्त्री की तरक्की देखकर अन्दर ही अन्दर घुटने वाले लोग होते हैं। ये हर विभाग -समाज, धर्म-जाति में पाये जातें हैं। घरेलू मामले में इनकी समस्या ये है कि ये केवल खुराफात सोचते रहते है। लड़की होकर वो ये कर ली हमें मौका नहीं मिला? उसकी कोई बात आदेश जैसी लगी तब तो उसका काॅल ही समझो। लाॅलच भी कम नहीं है। अपेक्षा बहुत है , जैसे ये ले लो, वो दे दो पर हिसाब मत रखो, वरना बुरा होना तय है। पुरुष की पकड़ से बाहर होती महिलायें स्वच्छंद विचरण व आत्मविश्वास के साथ जी रहीं हैं। दुनियाॅ का सबसे युवा देश भारत की एनसीआरबी की रिर्पोट कहती है कि 98फिसद् लोग जिन पर बलात्कार का अरोप लगे हैं वह पीड़िता को जानने वाले ही रहे। ऐसे प्रश्नों पर जवाब देने की जब बात आती है तो ये पौरुषधारी भग खड़े होते हैं। लड़कियों में शिक्षा बढनें से पाखण्ड व आडम्बर घरों से गायब हो गये। हलाॅकि आज भी हम 19वीं सदी में जी रहे हैं जोे अति दुर्भाग्यपूर्ण है। गर्भ में बेटियाॅ आज भी मारी जा रही हैं, और कुछ ऐसी भी जगहें हैं जहाॅ बेटियाॅ धंधे के लिये बचाई जा रही है। अपाहिज होती मानसिकता से पुरुष जिस दिन बाहर निकल गया महिलाओ पर अपराध शुन्य हो जायेगा। जागरुक पुरुष -महिला ही अब देश के पालन हार है।
                                                                                                                                                          Vaidambh Media

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