THAVD_KEJRIWAL_2306133gनयी दिल्ली। राजनीति की बढ़ती गन्दगी का ढेर साफ करने के लिए जब राजनीतिक जमादारों ने हाथ में झाडू उठाया तो जनता ने पूरी गन्दगी साफ कर देश के तमाम राजनीतिक दिग्गजों को यह चेतावनी दे दी कि विकल्प मिला तो देंगे करारा जवाब!
दिल्ली विधान सभा की 70 सीटों पर 67 के मुकाबले 3 सीटांे पर जीत हासिल करने वाली भाजपा तथा सूपड़ा साफ करवा चुकी कांग्रेस को नये सिरे से राजनीति को समझना होगा। तमाम टीवी चैनलों पर चल रही बक-बक में राजनीतिक पार्टियों के प्रवक्ता पार्टी में तथा पार्टी के प्रमुख व्यक्तियों ने महिमामण्डन में इतने लीन हो जाते हैं कि उन्हें देश व समाज के अच्छे-बुरे का भी ज्ञान नहीं रह जाता। राजनीतिक पार्टियों में लोकतांत्रिक व्यवस्था के बजाय अधिनायकवाद के विस्तार ने आज दिल्ली में राजनीतिक पार्टियों की जो गति की है वह आने वाले समय में राजनीतिज्ञों के लिए एक सबक है। जनता के बीच जाकर उनके सुख-दुःख, जरूरतों को पूरा करने के बजाय उन्हंे जाति, धर्म, व्यवसाय के आधार पर बांटकर देखने वाले अब तो सावधान हो जाए!

आने वाले वक्त में यदि पार्टी के टिकट का बंटवारा का आधार जाति, धर्म, व्यवसाय नहीं रह जाता है तो माना जाएगा कि इस घटनाक्रम से पार्टियों ने कुछ सबक लिया है, क्योंकि आने वाला चुनावी समर बिहार में है जहां महादलित को कुर्सी पर बैठाकर गहरी पैठ बनाने की कोशिश की जा रही थी और आज वहां भी दांव उल्टे पड़ गये। बात पार्टियों के चाल-चरित्र की है जिसका खामियाजा कार्यकर्ता से लेकर नेतृत्व तक को भुगतना पड़ता है। लगभग पार्टियों में अधिनायकवाद देखने को मिल रहा है। समाजवाद का मुखौटा लगाये नेताओं के कुनबे में कोई भी बिना राजनीतिक पद के नहीं देखा गया। जाहिर है कि पार्टी व व्यक्ति दोनों के चाल-चरित्र व विचारधारा में विरोधाभास होने के कारण ही देश में जनादेश इस तरह मिल रहा है कि सरकार बनाने वाली पार्टी मुद्दो पर बहस के लिए एक विपक्ष तक के लिए मुहाल देखी जा रही है। यहां जनता द्वारा सरकार का चयन नहीं बल्कि आक्रोश है जो विकल्प मिलते ही एकतरफा गिरता है। कांग्रेस के एक दशक की मनमोहन सरकार, शीला दीक्षित की कंकरीट के बाग विस्तार को विकास बताती 15 साल की सरकार और अब केन्द्र में गरीबों, युवाओं को रोजगार व सुविधा मुहैया कराने के नाम पर सत्तासीन मोदी सरकार सभी के विरूद्ध जनता में आक्रोश था जो क्रमशः एक-एक कर बाहर आया।

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जनता वादों के लुभावें में आकर वोट करती है और ठगी जाती है। यह व्यवस्था राजनीति में परम्परावादी रही है। आज जब देश में 80 लाख युवा शिक्षित हो तो ऐसी राजनीति के बारे में पार्टियां कैसे सोच सकती हैं! लेकिन यहां तो उसी परम्परा पर चलने की कोशिश में हर नेता जुटा दिख रहा है। वर्तमान में लोकतांत्रिक व्यवस्था के सभी रिकार्ड तोड़कर दिल्ली विधानसभा की 70 सीटों में से 67 सीटों पर विजय पताका फहराने वाली आम आदमी पार्टी जनता में जन-जन की भावनाओं, अपेक्षाओं से जुड़ी रही। वहीं अन्य पार्टियों के शीर्षस्थ नेताओं ने कार्यकर्ताओं के भरोसे चुनावी समर में उतरने की परम्परागत व्यवस्था के अनुरूप कार्य किया। यदि चुनाव बाद दिल्ली की उन व्यवस्थाओं जिनका जिक्र वर्ष 2013 के विस चुनाव में मंच से चीख-चीख किया गया था उनके अनुकूल कुछ काम जमीनी स्तर पर किया गया होता तो कांग्रेस-भाजपा को अपना चेहरा छुपाने की जरूरत नहीं पड़ती। अहम व लापरवाह राजनीति का परिणाम अब, सूपड़ा साफ ही होगा। राजनीति गन्दी कही गयी तो इसके पीछे राजनीतिक लोगों का ही दोष रहा, राजनीतिक लोगों की ईमानदारी, त्याग, तपस्या का ही यह परिणाम होगा कि अब राजनीति स्वच्छ होगी!

जनता से जुड़ते समय यह राजनीतिक पार्टियों को बहुत पारदर्शिता के साथ देखना होगा कि कहीं हम जनता को जाति, धर्म, व्यवसाय में उलझाकर मुख्य मुद्दे से भटका तो नहीं रहे, क्योंकि ऐसे में कोई भी केजरीवाल सूपड़ा साफ करने के लिए मैदान में आ डटेगा।