मुद्दा : भेड़ – भेड़िहार हासिये पर क्यों ?

खेती – किसानी का उद्धार  या तिरस्कार !

sheepfarmingGorakhpur : किसानों की बात आज हर राजनीतिक पार्टियाॅ कर रही हैं। उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव के केन्द्र में किसान है।   सभी किसानों के सच्चे हितैसी बनते हैं ।  किसान का हित कैसे होगा यह भी पार्टीयाॅ अपने-अपने हिसाब से तय कर रही है। किसान कितने प्र्रकार के हैं कौन -कौन किसान,  किस -किस कटेगरी में आता है , अब तो इस बात पर भी भिन्नता देखनंे को मिल रही है।  भारत में किसान -मजदूर-पशुपालक सब एक दूसरे से जुड़े हैं पर राजनेता उन्हें अपने अलग-अलग चश्में से देख रहें हैं।  प्रधानमंत्री श्री मोदी ने बस्ती जनपद में आयोजित चुनावी जनसभा को सम्बोधित करते हुए कुछ ऐसा ही संकेत दिया। उन्होने किसानों मे से गन्ना किसानों को अलग बताते हुए फसल बीमा करने के मामले पर कहा कि प्रदेश सरकार जानबूझ कर गन्ना किसानों को प्रधानमंत्री फसल बीमा के लिये बाध्य कर रही है जबकि उन्हे इस बीमा की आवश्यकता नहीं है। इससे किसानों के उपर अधिक प्रिमीयम का बोझ आ गया। यानि सबकुछ सरकार ही तय करेगी ! कौन एक नम्बर किसांन है , कौन दो नम्बर !  और मजदूर कामगार कहाॅ  जांय ,  भरण- पोषण केसे हो !

ग्रामीण उद्यम  तिल – तिल कर मरने को मजबूर !

मुख्यमंत्री -प्रधानमंत्री में किसान को मदद पहुंचाने के दावे की होड़ सी मची है। मुख्यमंत्री आपदा से हुई छतिपूर्ति के दावे करते फिर रहे है। फिलहाल इन सब दाॅवों के विपरीत भी कुछ सच है जिसे किसी भी मंच से सुना नहीं गया। अब उनकी आवाज उठानें वाला कोई नहीं है तो इस  गा्रमीण लघु उद्यम की बली चढ़ रही है।  हमारे जीवन का जरुरी हिस्सा होने के बावजूद ऐसे कई जनोपयोगी रहे ग्रामीण उद्यम आज तिल – तिल कर मरने को मजबूर है। इनमें से एक भेड़ पालन , बीते कुछ सालों में हासिये पर है। जातीय राजनीति  पर अपना चेहरा चमकाने वाले नेता पिछडी जाति में आने वाले इन भेड़िहारों की कोई सुधि ही नहीं। जिस तरह पूर्वांचल में 2 फिसद् उपस्थिति के बावजूद निषाद दल का निर्माण हो गया और दलों में जातीय प्रकोष्ठ बनें हैं उसमें इनके जाती का कोई नेतृत्व या प्रकोष्ठ नहीं दिखता। अपनें नाम के साथ पाल लगाने वाली इस जाती का कोई बड़ा चेहरा भी राजनीति के फलक पर नहीं दिखता।

सरकारी फरमान की आड़ में चरागाहों व खलिहानों की खुली लूट !

गोरखपुर- सोनौली मार्ग पर सफर के दौरान अचानक कैम्पियरगंज चैराहे से एक किमी पहले एक पेड़ की छाया में प्लास्टिक की जालीदार बाड़ें में घिरी लगभग 300 भेड़े दिखाइ्र्र दीं। उनकी देखभाल कर रहे 56 वर्षीय कोईल से बात -चीत करने पर पता चला कि क्षेत्र में चरागाह की कमी लगातार बढ़ने की वजह से भेड़ पालन बुरी तरह प्रभावति हुआ है।  उन्हाने बताया कि सरकार ने गाॅव में  खाद गढ्ढे से लेकर खलिहान तथा चरागाह की लगभग जमीनें लोगों को पट्टे पर दे दी। भूमिहीनों को देने के नाम पर सरकारी फरमान की आड़ में चरागाहों व खलिहानों की खुली लूट हुई है। इस  सुनियोजित लूट में जनता खासकर किसान का सामुहिक नुकसान हुआ है। भेड़पालकों ने बताया कि भेड़ का मांस भी जनपद में नहीं बिकता। पहले तमाम ग्रामीण देवी-देवता की पूजा में गाॅव में विभिन्न समुदाय के लोग बली भेड़े की बली चढ़ाते थे। वह लोग काफी अच्छा दाम दे जाते थे। अब जिलाधिकारी स्तर पर इसकी निगरानी होती रहती हैं।  भेंड़ का उंन और कम्बल का  लोकल बाजार ही खतम हो गया। अब भंेड़ का ऊंन कई साल इंतजार करने के बाद भी नहीं बिकता। रख-रखाव के लिये कोई उचित ब्यवस्था नहीं होनें के कारण ऊंन नष्ट करना विवशता है। अब ये लोग नेपाल के ब्यापारियों पर निर्भर हैं वह सस्ते दामों में इनसे उंन व भेंड़ खरीदतें हैं। कभी 50 रुपया प्रति किलोग्राम बिकने वाला भेड़ का बाल आज 5 से 7 रुपये में बेंचने की मजबूरी है। जो कम्बल 150 से 200 रु मे बिना कहीं ले गये घर से ही बिक जाता था, आज कोई पूछने वाला नहीं है। गोरखपुर क्षेत्र की भेड़ बाजार में 1500 से 3000 के बीच बेंचने की मजबूरी है। पानीपत यहाॅ की भेड़ के बाल व खाल का बड़ा ग्राहक था। भड़िहारों के मुताबिक भाजपा सरकार के टैक्स बढ़ानेवाले कानून ने देशी उंन को मारकेट में रद्दी बना दिया। एक साल के भीतर उचित रख-रखाव से तैयार होने वाली भेंडो को चारा नहीं मिल पानें के कारण दिन ब दिन हालात बदतर होते जा रहे हैं। बहुतायत में ये कुनबा अपनी पहचान छिपाकर मेहनत मजदूरी में खुद को लगा रहा है ताकि उसका जीवन बसर हो सके । कैम्पियरगंज क्षेत्र में ढोंढ़वाॅ, कुसैना ,इटवा ,भक्सा, बेलौहा,रसूल चकिया, मेहदावल जैसे गाॅव के भेड़िहार अपना उंन नहीं बेंच पा रहे! इनके अलाॅवा प्रदेश भर में भेड़िहार हासिये पर हैं। सरकार की ओर से इनके संरक्षण  संवर्धन के कोई उपाय फिलहाल नहीं दिखते।

भेड़िहार  अथवा गड़ेरिया !
ये स्वभावतः बड़े स्वाभिमानीं लोग होते हैं। इनकी जातियाॅ घूमंतू जातियों में आती है। लेकिन आज इन्हे स्थिर होकर दूसरे काम काज करना इनकी मजबूरी बन गई है। गोरखपुर ग्रामीण विधानसभा छेत्र, सहजनावॅा विधानसभा तथा कैम्पियरगंज विधानसभा में लगभग 2000 घर यानि  लगभग 15 हजार वोटर भेड़िहार है। नेताओं को शायद वोटरों की ये संख्या बहुत कम लगती है। तभी तो इनकी परिस्थिति के बारे में कभी किसी मंच से आवाज नहीं आयी। एक दशक पूर्व जब ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र के माॅमापार गाॅव से जो महावीर छपरा थाने  से महज 3 किमी की दूरी पर है , वहाॅ से दो ट्क भेंड़े चोरी हो गईं और भेड़िहार की भी हत्या हो गई थी। उस घटना को मीडिया ने बड़े जोश-खरोश के साथ छापा था। भेड़ों की चोरी अथवा उनके पालकों पर हमले आम बात है। क्योंकि एक साथ 300 भेड़े दो -तीन लोग एक साथ मिलकर छोटी सी जगह में ही रखते हैंे। चरागाह व ताल -पोखरे , खलिहान  कम हो जाने के कारण  इनके पुस्तैनी खनाबदोश ब्यवस्था को ग्रहण लग लया। अब भेड़े चारा चर के नहीं अन्य पालतू पशुंओं की तरह घेर कर बाड़े में   खिलायी जातीं हैं। मनुष्य के स्वार्थ ने बेजान जानवरों को खानें -पीनें -जीनें तक के अधिकार छीन लिये। यह वह किस हक से करता है,  मलूम नहीं।

भेड़ पालक  हासिये पर !
भेड़ पालक आज हासिये पर हैं। बहुत जल्द ही यह ब्यवसाय जो परम्परागत भेडिहारों ने जिंदा रखी है इतिहास बन जायेगा। सम्राट चन्द्रगुप्त एक गड़ेरिया थे। वहीं से उन्हे स्वाभिमान का ज्ञान था। इन गड़ेरिया लोगों से मिल कर आपको इनके स्वाभिमानी होने का सूबूत आज भी मिल जायेगा। नाम के पीछे सर नेम ’पाल’ लिखने वाले ये भेड़िहार अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं। कोईल बढ़े लिखे नहीं हैं लेकिन स्वाभिमान से लबरेज हैंै वह कहते हैं- ’हम किसी बाभन-ठाकुर के दरवाजे कभी  गिड़गिड़ानें नहीं गये। यही चउआ हमार साथ दिये आ हम इनका साथ दिये।’ं पारस कहते हैं – ’भेड़िहार केहू के दुअरहा कबहूं ना रहलें ! भेड़ चरावत खात जीवन गुरजरि गइल।’ नई पीढ़ी के रोजगार व समझ को काहिलपन का नाम देते हुए जंगल कौड़ि़या ब्लाक के  पंुरवाॅ निवासी 55 वर्षीय रामगोवन्दि कहते हैं कि- ’रोजगार के नाम पर सरकारों ने गाॅव का नस्ल बदल दिया। शांति अब क्राॅति में बदल गयी। गाॅव के सारे रोजगार चैपट करके सबको शहरी ललक लगा दिया।  आज 120 घर वाले गाॅव में मुश्किल से दस गायं नहीं हैं। गाय- भैंस वही रख सकता है जसिके पास पैसा है। ये पैसे का युग है। सरकार भी पैसे के पीछे लोगों को दौड़ाने का सारा जतन कर रही है।’ उनका कहना है कि वह अपने नौजवानों की सोच को लेकर दुखी हैं कि सारा रोजगार शहर में है। गाॅव ही सबसे उत्तम जीवन बसर करने का आदर्श ब्यवस्था है। यहाॅ जीवनोपयोंगी रोजगार स्वतः दिखते रहते हैं।
सवाल जनता से !
जंगल कौड़ि़या ब्लाक में कभी चरागाह असिमित थे। आज के भैतिकवादी ब्यवस्था ने सरकारी रजामंदी से जानवरों के प्रकृति प्रदत्त भेाजन पर कंकरीट बिछा दिया। इस क्षेत्र में तमाम जलस्रोतों को दफन कर स्मार्ट सीटी बनाई जा रहीं हैं। कैम्पियरगंज तहसील में इन कुकुरमुत्ता छाप डेवेलपर ने सरकार व अपनी आमदनीं जनता के जमीन पर कब्जा करके बढ़ा ली है। विधान सभा के चूनावी मौसम में ग्रामीण जीवन के ये सवाल जिनका हल ढूढने का प्रयास नेताओं का चाहिये वो इस समय हाथ जोड़कर जनता के सामने अभूतपूर्व अभिनय करनें में पूरा जोर लगा रहे हैं। अपनें गाॅव, शहर, मुहल्ले, क्षेत्र के बारे में इतिहास भूगोल तक नहीं जानने वाले राजनीतिक पार्टीयों के दबंग नेताओं के आगे नतमस्तक विधान सभाओं के जादातर प्रत्याशी क्षेत्र में किस मुॅह से वोट माॅगते हैं यह रहस्य है। जाति मुद्दा बन जाती है लेकिन उसका पतन मुद्दा नहीं बनता सवाल आपसे है कि ऐसा क्यों है ?

Vaidambh Media

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