मेक इन इंडिया: रीफिटिंग के लिये रुस क्यों भेजी जा रही पनडुब्बी !

                      रूस को 1,800 करोड़ रुपये के लाभ क्यों पहुॅचा रही मोदी सरकार ?

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Mumbai:राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ को लेकर घोषित प्रतिबद्घता के बावजूद रक्षा खरीद के उसके फैसले इस घोषणा का मखौल उड़ाते हैं। हाल में ‘फ्रांस में निर्मित’ 36 तैयार राफेल विमान खरीदने का फैसला इसका ताजा उल्लंघन है। इससे पहले बतौर  रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने पिछले वर्ष 29 अक्टूबर को अपनी पहली रक्षा खरीद बैठक में रूस को 1,800 करोड़ रुपये के लाभ वाला फैसला किया, जिसमें दो किलो-क्लास पनडुब्बियों की मरम्मत (रीफिटिंग) किए जाने का ठेका दिया गया, जबकि ऐसी रीफिटिंग अवश्य ही भारत में होनी चाहिए।
एचएसएल में है भरपूर क्षमता

Hindustan-Shipyard-Limitedवहीं विशाखापत्तनम स्थित हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड (एचएसएल) ने पिछले हफ्ते ही आईएनएस सिंधुकीर्ति नाम की एक किलो-क्लास पनडुब्बी की सफलतापूर्वक मरम्मत की है।  इससे पहले नेवल डॉकयार्ड ने  भी दो पनडुब्बियों की उचित मरम्मत की है। ‘मेक इन इंडिया’ के जुमले, भारत में किलो-क्लास की रीफिटिंग एवं मरम्मत की क्षमता हासिल करने, रूस में इस पर आने वाले अधिक खर्च को छोडि़ए, इसके लिए करीब 50 अधिकारियों, नौसैनिकों और उनके परिवारों को दो से तीन साल के लिए रूस में रहना होगा और इस दौरान प्रतिनियुक्ति पर उन्हें तमाम चीजों के लिए भारी-भरकम भत्ते देने होंगे। नौसेना के जोर देने पर रक्षा मंत्रालय ने विशेष रूप से पनडुब्बी हाते (यार्ड) के रूप में उपयोग के लिए जहाजरानी मंत्रालय से एचएसएल का अधिग्रहण किया। असल में एचएसएल को मझगांव डॉकयार्ड लिमिटेड (एमएसएल) का विकल्प होना था, जिस पर पहले ही छह स्कॉर्पीन पनडुब्बियों के निर्माण का बोझ है और वह परियोजना 751 के तहत छह अन्य पनडुब्बियों के निर्माण के लिए मजबूत दावेदार है, जिनके लिए निविदा जल्द जारी की जानी है।
मरम्मत के लिये रूस पर निर्भर होने के बजाय भारत में सक्षम को बढ़ावा क्यों नहीं?-Russian-Navy

वर्ष 1999 की 30 वर्षीय पनडुब्बी निर्माण योजना के अनुसार इन 12 पनडुब्बियों के बाद 12 स्वदेशी पनडुब्बियां और बनाई जाएंगी। उनके अतिरिक्त नौसेना के पास नौ रूसी किलो-क्लास के अलावा चार जर्मन एचडीडब्ल्यू टाइप 209 सहित 13 मौजूदा पनडुब्बियां हैं, जिनकी समय-समय पर मरम्मत की जरूरत होती है। यह रूस पर निर्भर होने के बजाय भारत में क्षमता विकसित करके ही किया जा सकता है।

रुस नही चाहता कि भारत पनडुब्बी मरम्मत मे हो सक्षम!

यह सच है कि आईएनएस सिंधुकीर्ति की मरम्मत में एचएसएल ने नौ वर्ष लगाए, जो किसी भी लिहाज से स्वीकार्य नहीं हैं। मगर एचएसएल से मिली जानकारियां यही बताती हैं कि रूसी विशेषज्ञों ने इसमें देरी की ताकि भविष्य में मरम्मत के काम के लिए भारतीय इकाइयों को होड़ से बाहर किया जाए।  रक्षा मंत्रालय यह विचार किए बिना इस जाल में फंसता हुआ नजर आ रहा है कि अगर नए अनुबंध नहीं मिलेंगे तो एचएसएल के लिए वित्तीय मुश्किल हो जाएगी और सिंधुकीर्ति की मरम्मत के दौरान उसने जो अमूल्य अनुभव हासिल किया, वह जाया हो जाएगा। जहां एमडीएल परंपरागत पनडुब्बियां निर्माण करती है, वहीं पूर्वी तट पर एचएसएल की सुरक्षित जगह और गहरे पानी वाला बंदरगाह उसे उन परमाणु पनडुब्बियों के निर्माण के लिए आदर्श बनाता है, जिनकी भारी तादाद में जरूरत है। पहली परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी आईएनएस अरिहंत के बाद कम से कम तीन ऐसी पनडुब्बियां और बनाई जाएंगी। परमाणु हमले में सक्षम पनडुब्बियों (एसएसएन) की एक खेप भी तैयार की जानी है, हालांकि अभी तक उसे मंजूरी नहीं मिली है। रक्षा मंत्रालय की समिति ने तय किया है एचएसएल परमाणु जोखिम के चलते परमाणु पनडुब्बियां नहीं बना सकती क्योंकि उसके कर्मचारी शिपयार्ड के बहुत करीब रहते हैं। ऐसा लगता है कि रक्षा मंत्रालय इस शिपयार्ड में शायद अपनी दिलचस्पी खो रहा है।
  नकदी की किल्लत झेल रही है युद्घपोत बनाने वाली हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेडHindustanShipyardLimited_thumb

युद्घपोत बनाने वाले तीन अन्य शिपयार्ड गार्डन रीच शिपबिल्डर्स ऐंड इंजीनियर्स (जीआरएसई)-कोलकाता, गोवा शिपबिल्डर्स लिमिटेड (जीएसएल) और सबसे अहम एमडीएल के पास दशक भर तक व्यस्त रहने के लिए अनुबंध हैं। एमडीएल के पास 60,000 करोड़ रुपये, जीआरएसई के पास 30,000 करोड़ रुपये और जीएसएल के पास भी 30,000 करोड़ रुपये के अनुबंध हैं। उनके उलट एचएसएल के पास महज 1,885 करोड़ रुपये के अनुबंध हैं। शुरुआती एकमुश्त भुगतान के तौर पर एमडीएल के पास 6,000 करोड़ रुपये की नकदी है, जिस पर सालाना 500 करोड़ रुपये का ब्याज मिलता है। वहीं एचएसएल नकदी की किल्लत झेल रही है।

बाजारी भेडिय़ों के हवाले नहीं किया जा सकता एचएसएलvisakhapattanam
हालांकि जहाज निर्माण की निजी कंपनियों की अवश्य ही मदद की जानी चाहिए, मगर इसके लिए एचएसएल को बाजारी भेडिय़ों के हवाले नहीं किया जा सकता। अपनी भौगोलिक स्थिति की वजह से वह अनमोल है। विशाखापत्तनम बंदरगाह 10 मीटर गहरा है, जो चार-चार मीटर गहरे एमडीएल और जीएसएल या नदी के मुहाने पर स्थित जीआरएसई की तुलना में बड़े जहाजों की आवाजाही के लिए अधिक मुफीद है। यह रक्षा मंत्रालय की सबसे बड़ी पोत निर्माण इकाई है। नौसेना की सामुद्रिक क्षमता परिदृश्य योजना (एमसीसीपी) के तहत पोत निर्माण के काम को देखते हुए रक्षा मंत्रालय के पास एचएसएल के लिए काम की कमी नहीं। मौजूदा रक्षा पोत निर्माण इकाइयों पर काम के बोझ को देखते हुए एचएसएल की शिद्दत से दरकार है।  कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड देश के लिए विमानवाहक पोत बनाने में जुटी है। एमडीएल और जीआरएसई भी मिलकर सभी जरूरतें पूरी नहीं कर सकतीं। हालांकि लार्सन ऐंड टुब्रो के अलावा एबीजी और पीपावाव जैसी निजी कंपनियों के पास भी संपन्न बुनियादी ढांचा है लेकिन जरूरत के स्तर को देखते हुए वह भी काफी नहीं होगा। केवल भारतीय नौसैनिक जरूरतों के लिहाज से ही ये जरूरी नहीं है बल्कि नौसैनिक कूटनीति के तहत हिंद महासागर के देशों को निर्यात करने के लिए भी आवश्यक हैं।

                एचएसएल को प्रत्येक मोर्चे पर  मिलनी चाहिए मदद !

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ऐसे में अपनी स्थिति, बुनियादी ढांचे और पनडुब्बियों की मरम्मत में हासिल की गई महारत को देखते हुए एचएसएल को प्रत्येक मोर्चे पर हरसंभव मदद मिलनी चाहिए और रक्षा मंत्रालय को अपनी किलो क्लास पनडुब्बियों को मरम्मत के लिए रूस भेजने के फैसले को एचएसएल के पक्ष में बदलना चाहिए। बेहतर नतीजों के लिए इसमें अपार क्षमताएं हैं और इसे नाकाम होने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता।

                                                                                                      अजय शुक्ला    (B.S.)

                                                                                                   Vaidambh Media   

                                                                                  

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