मोदी की कूटनीतिक परीक्षा

धनंजय ब्रिज

कथिततौर पर विश्व चौधरी  के रुप में जाना जाने वाला संयुक्त राष्ट्र अमरीका अपनी आर्थिक व सामरिक शक्तियों के बूते विश्व को निरन्तर अपनी भारी भरकम उपस्थित दर्ज कराता रहा है। भारत एक कृषि सम्पन्न सर्वाधिक गांवो व किसानों का देश है। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की मुलाकात का समय आ गया है। श्री मोदी स्वयं को विश्व पटल पर व्यापारी बताते हैं, इस समय वह अमरीकी यात्रा पर हैं। कहना गलत नहीं होगा कि गांवों का देश एक व्यापारी के नेतृत्व में शहरी होने की राह चल पड़ा है।

समाचार जगत की चकाचैंध से थोड़ा दूर चले तो एक चीज काफी परेशान करती है कि विदेश व रक्षा मंत्रालय से वार्ता व परिपक्व तैयारी के अभाव में ही श्री मोदी अमरीकी यात्रा पर निकल पड़े हैं। द वाल स्ट्रीट जनरल में लिखे लेख में मोदी अपनी उपलब्धियां गिनाते रहे। विदेश व रक्षा के कूटनीतिक तथा गंभीर विषयों की चर्चा तक नहीं रही। यदि इस यात्रा में रक्षा सौदा व विदेशी निवेश ही प्राथमिक रहा तो निश्चित ही भारत की कूटनीतिक हार के रुप में देखा जायेगा।
विदेश दौरे पर रक्षा मंत्रालय व विदेश मंत्रालय की सलाह बहुत महत्व रखती है। कभी-कभी स्वयं को सिद्ध समझने वाले उच्च पदस्थ लोगों के अहम के कारण देश व समाज को उनके कृत्यों के कारण दुःख भुगतना पड़ जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक चमात्कर के धनी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बिना किसी स्पष्ट एजेण्डे के अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से मिलने निकल पड़े हैं। आर्थिक एजेण्डे पर उनका आशावादी रुख किसी से छिपा नहीं है। यह यात्रा व मुलाकात अन्य देशों की अपेक्षा सबसे अलग व अहम है। यहां सजगता, सतर्कता व चालाकी की परीक्षा होनी है। अमेरिकी कारोबारियों व निवेशकों का ध्यान भारत की ओर खींचना एक स्वाभाविक वैश्विक संबंध है।
भारत से अन्य देशों की ही तरह अमेरिका अपने संबंध कैसे रख सकता है जबकि खुद प्रधानमंत्री इसे दुनिया का सबसे बड़ा बाजार बताते हैं। देखना होगा कि अमरीकी एजेण्डे में भारत का मूल्यांकन अब कैसे किया जा रहा है। अमरीका विश्व चौधरी  बनता है उसके साथ रिश्तों की मिठास के समानान्तर ही जोखिम परिणाम भी मिलते हैं। परमाणु व रक्षा सौदों पर आज एक दशक से दोनों देशों के बीच दिशाहीनता ही देखी गयी है। भारत के परमाणु जवाबदेही कानून व पेण्टेण्ट नियम के साथ-साथ रिटेल, रक्षा क्षेत्र व खाद्य सब्सिडी की विदेश नीति पर अमरीका को आपत्ति रही है। अमरीकी सैन्य निर्माताओं के उम्मीद के विपरीत भारत जवाब देता रहा है। अमरीका का सबसे बड़ा दुःख यह भी है कि भारत कभी उसकी मदद पर आहलादित हो अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर गुणगान नहीं गाता।
अमरीका में आगाज शानदार रहा, खूब आवाभगत हुयी। ध्यान दें भारी संख्या में गुजराती समाज अमरीका में कारोबार करता है। गौर कीजिए जापान में सम्बोधन के दौरान भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि मैं गुजराती हूं और व्यापार मेरे खून में है। यह आत्मविश्वास है या देश के 125 करोड़ लोगों के विश्वास के साथ खिलवाड़! यह फैसला आप स्वयं करें। प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जो अमरीका में उनके साथ हैं अजीत ढोभाल, उन्हें वैश्विक कूटनीति में ज्ञान अल्प हैं, दूरदर्शिता की भरपूर कमी लिए अमरीका जैसे कूटनीतिज्ञ से मिलने जाते समय हमें हर तरह से स्वयं को खंगाल कर परिष्कृत कर लेना चाहिए। फिलहाल भारत और मोदी को निराशा न हो, इसके लिए ईश्वर से दुआं करें। भारत की कूटनीति में यही होना चाहिए कि सिर्फ राजनीतिज्ञ मुद्दो को अमरीका के पाले में डालकर उसके जवाब व हरकत पर पैनी नजर रखी जाए।

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