मौजों की रवानी में मांझी ,तुफान का खतरा!

ब्यूरो कार्यालय/नई दिल्ली।  2005 की बात है, बिहार में विधानसभा चुनाव के नतीजे आए थे। जनता ने जदयू और भाजपा को सरकार चलाने का मौका दिया था उस वक्त लगा कि यह जनाधार भाजपा को नहीं बल्कि एक इंजीनियर दिमाग के संघर्षशील नेता को मिला है जिसने लालू के जंगलराज को खत्म करने के सपने दिखाए ,लोगों ने उन पर भरोसा भी जताया। बात नीतिश कुमार की ही हो रही है ,जो लोग बिहार की राजनीति को समझते हैं उन्हें बखूबी पता है कि यहां जाति की बुनियाद बेहद मजबूत है। लेकिन नीतिश कुमार के आने के बाद विकास की राजनीति जाति की राजनीति पर हावीहोती दिखी । एक बार को लगा कि बिहार जाति की राजनीति के मिथक को तोड़ेगा। लेकिन आज दस साल बाद बिहार एक बार फिर उसी मोड़ पर खड़ा है जहां से जाति की राजनीति वाली सुरसा ने मुॅह खोल कर बिहार के विकास को अवरुद्ध कर हिंसा की भयावहता का विस्तार करने की कोशिश किया था। अफसोस! इस राजनीति को एक बार फिर हवा मिली है वह भी नीतिश कुमार के जरिए, हां यह अलग बात है कि इस बार उनकी मदद लालू यादव भी कर रहे हैं। लेकिन इन सबके बीच एक और चेहरा बिहार की राजनीति में उभर कर आ गया है वह कोई और नहीं बल्कि निर्वासित मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी हैं। जीतन राम मांझी की राजनीति ने कांशीराम के उस दौर की याद दिला दी है, जब वे सत्ता की मास्टर चाबी हासिल करने के लिए कभी हाथ मिलाते थे तो कभी झटक कर चल देते थे।

ramsundar dash  f.cm bihar

70 के दशक के आखिरी साल में कर्पूरी ठाकुर को किन लोगों ने अपमानित किया बिहार की राजनीति जानती है। कर्पूरी को कुर्सी से हटाकर एक दलित चेहरा खोजा गया, रामसुंदर दास का। जिन्हें सवर्ण नेताओं के समूह और जनसंघ ने समर्थन दिया था। दिक्कत यह है कि आप जीतन राम मांझी को सामाजिक न्याय के प्रतीक से अलग भी नहीं कर सकते, लेकिन उस सियासत से आंख भी बंद नहीं कर सकते जो दिल्ली से पटना तक में इस प्रतीक के नाम पर खेली जा रही है। नैतिकता और न्याय सियासत में कब पाखंड है और कब प्रतीक यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप नीतीश को पसंद करते हैं या नरेंद्र मोदी को या फिर मांझी को। दिलचस्प बात यह है कि जिन तीन दलों ने मांझी को पद से हटाया है उन सभी में वे पहले रह चुके हैं। कांग्रेस, आरजेडी और जेडीयू। लेकिन मांझी के झटके से वे दल भी उबर नहीं पाएंगे, जिनमें मांझी नहीं हैं। जेडीयू से बर्खास्त मांझी इस्तीफा नहीं दे रहे हैं और दूसरी तरफ विधायक दल का नेता चुने जाने के बाद भी नीतीश कुमार शपथ नहीं ले पा रहे हैं। राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी की किस्मत ही कुछ ऐसी है कि वे जहां भी जाते हैं, यूपी विधानसभा की स्थिति पैदा हो जाती है। मांझी की त्रासदी यह है कि कोई इन्हें अपनी नाव का खेवनहार नहीं बनाना चाहता, बल्कि सब मांझी को नाव बनाकर खेवनहार बनना चाहते हैं। मांझी हैं कि तूफान का सहारा लेना चाहते हैं। यह मजा कब सजा में बदल जाएगी मांझी को अभी इसका एहसास शायद न हो आज नितीश का बहुमत मिल गया माझी का विश्वास मत, भाजपा की बैशाखी पर नही टिक सका। समुद्र में आया उफान बहुत कुछ दे दिया करता है लेकिन जो कुछ ले जाता है वह मांझी से बेहतर कोई नही समझ सकता। राजनीति में मौका प्रधान है भावना नहीं।

                                                                                             दिपक
                                                                                           नई दिल्ली

Previous Post
Next Post

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

hogan outlet online scarpe hogan outlet nike tn pas cher tn pas cher nike tn 2017 nike tn pas cher air max pas cher air max pas cher air max pas cher air max pas cher air max pas cher scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher