मौसम की मार , किसान लाचार ?

 New Delhi : जम्मू में बहुत पहले और बेमौसम ही लीची में फूल आ रहे थे। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि जाड़ा पर्याप्त नहीं था और मौसम सामान्य की तुलना में गरम हो चला था। ag farmer लेकिन अब जबकि वहां भरपूर ठंड है, फूल गिर रहे हैं और यह डर पैदा हो गया है कि इन गर्मियों में लीची की फसल नहीं होगी। बिहार में गेहूं की खड़ी फसल पर पिछले पखवाड़े बेमौसम ओलावृष्टि हुई और सामान्य से गरम दिनों के बाद अचानक तेज ठंड लौट आई। मैंने मौसम में इस बदलाव के साक्षात दीदार हरियाणा के मेवात जिले में किए जहां किसानों ने मुझसे कहा कि वे पिछली तीन फसल से परेशानी का सामना कर रहे हैं। वे टूट चुके थे क्योंकि हर बार जब वे फसल बोते, कुछ न कुछ ऐसा हो जाता कि उपज पैदा न होती। उदाहरण के लिए वर्ष 2015 की गर्मियों में उन्होंने धान की खेती की लेकिन पहली बारिश में देर हो गई।उन्होंने महंगे डीजल चालित पंप किराये पर लिए (कृषि कार्यों के लिए मुफ्त बिजली है जो प्राय: जरूरत के वक्त नहीं मिलती)। आखिरकार धान की फसल तैयार हुई लेकिन तभी एक रात पांच घंटे में 250 मिलीमीटर की भीषण बारिश हो गई। यह ऐसा जिला है जहां सालाना औसत बारिश ही 500-600 मिमी होती है। जब मैं गांव गई तो सारे खेत पानी से भरे हुए थे।

किसानों की आंखों में गहरी हताशा !
फसल नष्टï हो चुकी थी और किसानों की आंखों में गहरी हताशा और निराशा का भाव था। जरा उन प्रश्न की ओर रुख करते हैं जिनका उत्तर तत्काल तलाश करना आवश्यक है। आखिर मौसम में यह असमान्य बदलाव क्यों देखने को मिल रहा है?Telangana इसकी आवृत्ति इतनी बढ़ क्यों गई है? आइए चर्चा करते हैं कि इस क्रम में हमें क्या करने की आवश्यकता है। सबसे पहले, हमें यह समझने की जरूरत है कि ये घटनाएं हमारे विश्व को तोड़ रही हैं। आज हमें देश में होने वाली ओला वृष्टिï और बेमौसम बारिश की तुलना में स्नोजिला के बारे में कितना ज्यादा पढऩे को मिल रहा है। यह विनाशकारी बर्फ का तूफान अमेरिका के पूर्वी तट पर आया था। हमें अपने देश में हो रही घटनाओं के बारे में अधिकाधिक खबरें छापने की जरूरत है। भले ही इससे प्रभावित होने वाले लोग मध्य वर्ग के न हों। इसलिए कि अगर हम इस विषय को तवज्जो नहीं देंगे तो हम कभी समझ नहीं पाएंगे कि हम पर कितनी बड़ी विपदा आन पड़ी है।दूसरी बात, हमें जलवायु के लिहाज से संवेदनशील होती दुनिया में बीमा सुरक्षा की आवश्यकता है। यह बीमा योजना गरीबों के लिए कैसे काम करेगी जिनको जोखिम ज्यादा है? गत सप्ताह केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नई फसल बीमा योजना प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) को मंजूरी दी। यह मौजूदा राष्टï्रीय कृषि बीमा योजना की जगह लेगी।

असल समस्या है फसल के नुकसान का आकलन करना !
देश में कृषि बीमा का अध्ययन करने वाले मेरे सहयोगी अपनी रिपोर्ट में कहते हैं कि यह कुछ चिंताओं को दूर करने की दिशा में बढ़ाया गया कदम है लेकिन अभी भी एक किसानों को सुरक्षा प्रदान करने वाली एक सर्वोपयोगी बीमा योजना बनाने में लंबा अरसा लगेगा।pro-farmer-nda-govt

असल समस्या है फसल के नुकसान का आकलन करना और उसके बाद बिना किसी देरी के हर्जाना चुकाना। पीएमएफबीवाई में बीमा इकाई गांव होगा जबकि इससे पिछली योजना में यह राजस्व विभाग की इकाई होती थी। एक ब्लॉक में काफी इलाका शामिल होता है जहां तमाम मौसमी घटनाएं घटित होती रहती हैं। ऐसे में अगर कुछ गांवों में जमकर बारिश हो गई जबकि ब्लॉक के शेष हिस्से में नहीं हुई तो किसानों को बिना समुचित प्रमाण पेश किए हर्जाना नहीं मिलता। ऐसा तब है जबकि हमारे मौसम कार्यालय तक मौसम की खराबी के आंकड़ों को समुचित रूप से दर्ज नहीं कर पाते। दावों के प्रमाणन का काम भी एक समस्या है। राज्य सरकारों से उम्मीद की जाती है कि वे फसल कटाई के प्रयोग के जरिये अनुमान लगाएं कि आखिर कितना उत्पादन हो सकता था। उसके बाद ही नुकसान का जायजा लिया जाता है। प्राय: इन प्रयोगों को सही ढंग से अंजाम नहीं दिया जाता है और किसानों को नुकसान का सही मुआवजा नहीं मिल पाता। उसके बाद जब दावा लगाया जाता है तो पटवारी आकलन करता है। पटवारी से उम्मीद की जाती है कि वह हर गांव में जाकर एक-एक खेत के नुकसान का आकलन करेगा।

 किसका किया जाए बीमा  ?
इस पूरी प्रक्रिया में भ्रष्टïाचार का बोलबाला रहता है।आप किसानों से बात करें तो आपको पता चलेगा कि पटवारी खेतों में जाते ही नहीं या फिर ऐसे लोगों का दावा तैयार कर देते हैं जिनकी फसल ही खराब नहीं हुई होती। कई बार तो वे सीधे दावा ही खारिज कर देते हैं। इन समस्याओं का हल नई तकनीक के प्रयोग में निहित है। इनमें रिमोट सेंसिंग और मोबाइल आधारित तस्वीर खींचने की प्रणाली शामिल हैं। नई बीमा नीति में मोबाइल फोन के उपयोग से फसल के बेहतर आंकड़े जुटाने और दावों को समय पर निपटाने का उल्लेख शामिल है। सवाल यह है कि यह सब कैसे और कितनी तेजी से हो सकता है? सवाल यह भी है कि बीमा दरअसल किसका किया जाए? किसान का या बैंकर का?

बीमा योजना एक पैकेज डील!
आज किसान क्रेडिट कार्ड के तहत बैंक से ऋण लेने वाले हर किसान का बीमा किया जाता है। बीमा योजना एक पैकेज डील है और अधिकांश मामलों में किसानों के पास इसके बारे में जरूरी जानकारी भी नहीं होती। न केवल बीमा का प्रीमियम ऋण में अतिरिक्त रूप से काटा जाता है बल्कि जब दावे का निपटान किया जाता है और राशि दी जाती है तो उस पर पहला अधिकार बैंक का होता है। इन सारी चीजों पर काम करने की आवश्यकता है। बीमा का दायरा सबके लिए होना चाहिए और मुआवजा इतना मिलना चाहिए कि नुकसान की भरपाई हो सके। यह एक ऐसी योजना है जिस पर हमारा ध्यान होना चाहिए। जलवायु संकट से जूझ रहे हमारे विश्व में यही सबसे बड़ी चुनौती है। (B.S.)

सुनीता नारायण

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