ये कैसा लोकतंत्र है , तीस साल के लम्बे संघर्ष पर सरकारें उदासीन !

   सरकार को खुली बहस का निमंत्रण !
 Bhopal: अपने आप को को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहने वाले मुल्क की यह विडंबना है कि तीस साल विस्थापन के खिलाफ लगातार संघर्ष करने के बावजूद नर्मदा घाटी के डूब प्रभावित बाँध की उचाई 14 मीटर बढ़ाकर 139 मीटर तक करने के खिलाफ जीवन अधिकार सत्याग्रह करने को मजबूर हुए .

artist's impression of proposed world's largest statue of sardar patel at sardar sarovar dam site

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पिछले दिनों मध्यप्रदेश में बड़वानी जिले के राजघाट पर 12 अगस्त से से शुरू हुआ जीवन अधिकार सत्याग्रह 14 सितम्बर भोपाल में हुई एक आम सभा में समाप्त हुआ. इस दौरान मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री को आगामी 27 अक्टूबर को सरदार सरोवर परियोजना के तहत विस्थापन को लेकर यह कहते हुए खुली बहस का निमंत्रण दिया गया है कि “हम संवाद के लिए तैयार है, अगर आप भी हो तो ज़रूर पधारे”| प्रधान मंत्री को भी यह सलाह दी गयी है कि वे हवाई दौरा बंद करके, ज़मीन पर उतरें और अपने “विकास” के वादों को पूरा करें. जाहिर है दिल्ली और भोपाल में बैठे हुकूमतदानों द्वारा लगातार अनसुना किये जाने के बावजूद आपभी भी इनके हौसले पस्त नहीं हुए हैं.
 सरदार सरोवर के विस्थापितों की  ज़मीनी हकीकत 

jal satyagrahसरदार सरोवर के विकास, विस्थापन और पुनर्वास को लेकर शासन के दावे और ज़मीनी हकीकत को लेकर बीते 11 और 12 सितम्बर को एक “जन अदालत” का आयोजन किया भी गया था, इस जन अदालत में उच्च न्यायालयों के सेवानिवृत्त न्यायाधीश सर्वश्री पी.सी. जैन (राजस्थान उच्च न्यायालय), नागमोहन दास (कर्नाटक उच्च न्यायालय), बी.डी. ज्ञानी और एन.के. मोदी (दोनो मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय) शामिल थे। इस दौरान सरदार सरोवर के विस्थापितों और पीड़ितों ने अपनी बात रखी . sardaar srowar प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर जन अदालत ने माना कि 18 अक्टूबर 2000 के सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले उल्लंघन हुआ है जिसमें कहा गया था कि बिना पुनर्वास के बाँध की ऊँचाई नहीं बढ़ाई जाएगी। जन अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय से यह निवेदन किया कि वह सरकार के गुमराह करने वाले शपथ पत्रों के तथ्यों का पुनर्परीक्षण करें। आंदोलन की सुधारात्मक पेटिशन को स्वीकार करते हुए अपने निर्णय पर पुनर्विचार करें। हाल ही में “डिस्ट्रॉयिंग अ सिविलाइजेशन” एक रिपोर्ट भी जारी हुई है जिसके अनुसार अनुसार अभी भी हजारों परिवार सही मुआवजा और पुनर्वास से वंचित है, कई प्रभावितों को तो डूब क्षेत्र में शामिल ही नहीं किया गया है और अगर भविष्य में बांध की ऊंचाई को बढाया जाता है तो इससे और ज्यादा परिवार डूब क्षेत्र में आएंगे। मेधा पाटकर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुला पत्र भी लिखा है जिसमें उन्होंने राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया व विकास मॉडल, दोनों मुद्दों पर अजनतांत्रिक व संवादहीन होने के आरोप लगाए है।

“कोई नहीं हटेगा बांध नहीं बनेगा”
sardar priyojna 30 साल पहले जब यह आन्दोलन यह शुरू हुआ था तो नारा था “कोई नहीं हटेगा बांध नहीं बनेगा” लेकिन तमाम प्रतिरोध के बावजूद सरदार सरोवर बांध बन गया है । अब आन्दोलन विस्थापितों को बसाने, उन्हें मुआवज़ा दिलवाने, इसमें हो रहे भ्रष्टाचार और बांध की ऊंचाई बढ़ाए जाने के खिलाफ संघर्ष कर रहा है । इन सब के बावजूद आन्दोलन की ही वजह से ही यह संभव हो सका है कि सरदार सरोवर परियोजना और अन्य बांधों के मामले में विस्थापन से पहले पुर्नवास की व्यवस्था,पर्यावरण व अन्य सामाजिक प्रभावों पर बात की जाने लगी है . नर्मदा बचाओ आन्दोलन की तीस साल की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसने वर्तमान विकास के माडल पर सवाल उठाया है जिससे एक बहस की शुरुवात हुई है ।

आपको कष्ट उठाना पड़ता है तो आपको देशहित में ऐसा करना चाहिए :पं0 नेहरु 
अरूंधती राय नर्मदा बाँध पर अपने चर्चित लेख “द ग्रेटर कॉमन गुड” की शुरुवात जवाहरलाल नेहरु द्वारा हीराकुंड बांध के शिलान्यास के मौके पर दिए गए भाषण के उन लाईनों से करती है जिसमें उन्होंने कहा था “If you are to suffer, you should suffer in the interest of the country.” (अगर आपको कष्ट उठाना पड़ता है तो आपको देशहित में ऐसा करना चाहिए).jal styaबड़ी परियोजनाओं के संदर्भ में इसी “व्यापक जनहित” की छाप अभी भी सरकारों की सोच पर हावी है। अब तो सरकारें एक कदम आगे बढ़कर नर्मदा बचाओ जैसे आन्दोलनों पर यह आरोप लगाती हैं कि वे विकास के रास्ते में रोड़े अटका रही हैं। इसकी हालिया मिसाल इस साल गर्मियों में औंकारेश्वर बांध का जलस्तर बढ़ाए जाने के विरोध में जल सत्याग्रह कर रहे किसानों को लेकर मुख्यमत्री शिवराज सिंह चौहान का दिया वह बयान है जिसमें उन्होंने कहा था कि यह आन्दोलन विकास और जनविरोधी है, इससे मध्यप्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश का नुकसान हो रहा है और इसकी जितनी भ्रत्सना की जाए कम है। नर्मदा बचाओ आन्दोलन ने पिछले तीस सालों में इसी सोच को चुनौती दी है ।

डूब क्षेत्र  के 48000 परिवार नही पा सके पुनर्वास !
sardar s visthapit  नर्मदा बचाओ आन्दोलन के अनुसार अभी भी लगभग 48000 परिवार डूब क्षेत्र में हैं जिनका पुनर्वास होना बाकी है, सत्ता में आने के महज 17 दिन के अन्दर ही नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा बांध की ऊँचाई को 17 मीटर तक बढ़ाने का निर्णय लिया गया था । जिसके खिलाफ डूब प्रभावितों द्वारा बड़वानी के राजघाट पर करीब एक महीने सत्याग्रह किया गया. इस साल बारिश कम होने की वजह से डूब क्षेत्र के परिवारों को थोड़ी राहत रही लेकिन अगले मानसून में फिर वही खतरा वापस आएगा . भावितों का कहना है कि हम जीवन की लडाई लड़ रहे हैं और इसे आगे भी जारी रखेंगें.

  सरदार सरोवर विस्थापितों  का अनसुलझा भविष्य ?
इस बीच आन्दोलनकारियों के लिए अच्छी खबर यह है कि सर्वोच्च अदालत के सामाजिक न्याय खंडपीठ ने सरदार सरोवर विस्थापितों के वयस्क पुत्रों के ज़मीन अधिकार समाप्त करने संबंधी मध्य प्रदेश सरकार की याचिका को खारिज करते हुए कहा है कि वर्ष 2000 और 2005 में अदालत द्वारा दी गयी आदेशों का कोई पुनर्विचार संभव नहीं है |

Vaidambh Media

  जावेद अनीस

 

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