रसूखदारों की पंचायत में आबरू की कीमत 40हजार

कुशीनगर जिले  के बरवां सुखदेव गांव मे एक किशोरी के आबरू की कीमत बकायदा पंचायत बैठाकर लगाई गयी। क्या यह महिला सम्मान का कोई नया फार्मूला इजाद किया गया है? जिले का तुर्कपट्टी थाना ,पंचायत का खुलेआम साथ दे रहा है। इतना ही नही पंचायत में मामला हल करने का दबाव भी थाने पर रिपोर्ट दर्ज कराने गये पीड़िता के परिजनों को पुलिस द्वारा ही दिया गया। इस घटना पर बारीक नजर डालें तों हमारा समाज इस अत्याधुनिक युग में कितना पीछे है इसका अंदाजा लगा सकते हैं और लैपटाप बाॅटकर खुद पर इतरा रहे समाजवादी विचारधारा के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के गुड गर्वनेंस का नंगा सच देख सकते हैं। लोकतंत्र की पहली कक्षा ग्राम पंचायत है। सत्ता के विकेन्द्रीकरण की परिकल्पना में ग्रामसभा को भारी अधिकार दिये जाने की वकालत की गई है। पंचायत दबंगों की रखैल बन बयी है। थेाड़ी छूट मिलने पर किस हद तक जा सकती है इसका उदाहरण बरवां सुखदेव गांव मे जाकर देखिए । स्वयं को बौद्धिक बताने वाले मनुष्यों के समाज में जंगली जानवरों से अधिक बहसीपन देखने को मिलेगा । इस बहसीपन के मजबूत बटबृक्ष की जड़ मे खाद-पानी निःसंदेह सरकारो ने ही दिया है। यहाॅ 14 वर्षीय बालिका से बलात्कार के सनसनीखेज मामले मे दो आरोपियों पर पंचायत ने 20-20 हजार रूपये जुर्माना करते हुए 40 हजार रूपये पीड़ित पक्ष को दिये जाने का फरमान सुना दिया। यानि अस्मत की कीमत पंचायत ने 40 हजार रू लगा दी,पर उस दुस्साहस के लिये आरोपियों को कोई हिदायत तक नही दी गयी जिसमे कभी-कभी दिल्ली की सरकार तक हिल गई। पीडित की पहुॅच बहुत ऊॅची नही होने से वह बार-बार पुलिस के पास जाती है और पुलिस पंचायत के फैसले को सही बताकर उसे स्वीकार करने की धमकी मिश्रित सलाह दे रही है। ये महिलाओं का कैसा सुरक्षा व सम्मान है?

किसी तरह से बस सत्ता हाथ लग जाय फिर तो बल्ले-बल्ले। शासन -प्रशासन जैसे खुश रहे ,खुश रखो और ऐश करो,बाकी बची जनता उससे तो अब पाॅच साल बाद मिलना है, तब तक बहुत से मामले खुद ही हल हो चुके होते है । शायद सत्ता मिलने के बाद ऐसे ही सोच-समझ रखने वाले नेता देश को गर्त में धकेलते रहंे हैं। उत्तर प्रदेश की जनता ने प्रदेश मे समाजवाद लाने के लिये युवा मुख्यमंत्री को पुर्ण बहुमत के साथ कुर्सी पर बिठाया ताकि कोई बहाना ना रह जाय। हम यहाॅ एक पंचायत के फैसले का संदर्भ लेकर कथाकार प्रेमचंद के ’सरपंच’ की तुलना आज के आधुनिक समाज से कर रहे है। समझना चाहते है कि हम नैतिकता के किस छोर पर खड़े हैं। राजनीतिक एजेण्डे में महिला सुरक्षा व न्याय सबसे ऊपर है ,क्या जनता की इस अपेक्षा पर सरकारें अभी तक खरी उतरी है समाज को बदलने की कोई ठोस पहल हुई ! या डिवाइड एण्ड रूल सत्ताप्रप्ति के सूत्र बन गये हैं।

घटना इस प्रकार है :

कुशीनगर जिले के तुर्कपट्टी थाना क्षेत्र के बरवां सुखदेव गाॅव में दलित ,पिछड़ी च सामान्य बिरादरी के लोग रहते हैं। सभी मध्यम व निम्न मध्यम आय वर्ग के लोग हैं। इन सभी बिरादरी के अपने नेता हैं। दिखावे की राजनीति में सभी अलग हैं। इन सफेदपोश नेताओं का सही चेहरा पंचायत के फैसले पर सहमति देने के बाद स्वतः उजागर हो जाता है। 23 अप्रैल की शाम 14वर्षीय किशोरी घर से शौंच के लिये निकली। इसी बीच गाॅव का ही एक युवक उक्त किशोरी को जरूरी काम के बहकावे में गाॅव के सभ्रंात कहे जाने वाले परिवार के घर ले गया। गृहस्वामी ने किशोरी के घर मे जाते ही दरवाजा बंद कर दिया। थोड़़ी देर बाद युवक व एक और ब्यक्ति भी कमरे में दाखिल हो गये बाहर से दरवाजा बंद कर दिया गया। कमरे के भीतर से किशोरी के चिल्लाने की आवॅाज सुनकर गाॅव के लोग उक्त घर के आस-पास पहुॅच कर दरवाजा खोलने का दबाव गृहस्वामी पर बनाने लगे। जनदबाव में दरवाजा खुला और किशोरी को बदहवास अवस्था में मुक्त कराया गया। बाद में पता चला कि उसकी आबरू लुट चुकी थी। पीड़ित पक्ष थाने पर गया। पुलिस ने मामला पंचायत के जरिये हल कराने का दबाव बनाते हुए पीड़िता का मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ा दिया। 24 अप्रैल को पंचायत बैठी। पीड़ित किशोरी के पिता ने आरोपी के साथ शादी का प्रस्ताव रखा,उसे दूसरे समुदाय का होने के कारण पंचायत ने खारिज कर दिया। आरोपी को आश्रय देने वाले को सार्वजनिक सजा की भी बात पंचायत में उठी पर ऊॅचे रसूख वाले परिवार के ब्यक्ति को पंचायत ने सजा देना जरूरी नही समझा। अब पंचायत ने इस अपराध पर अर्थदंण्ड लगाने की ठान ली। एक किशोरी की लुटी अस्मत की कीमत का मोलभाव पंचायत के सामने शुरू हुआ। डेढ़ लाख से शुरू होकर 60 हजार तक बोली उछली। अंत में पंचायत ने निर्णय पीड़ित व बलात्कारी दोनो के हित को ध्यान में रखते हुए दो आरोपियों को संयुक्त रूप से 20-20 हजार रूपया पीड़िता के पिता को देने का आदेश दिया। पंचायत का यह फैसला न मानने का मतलब है गाॅव से हुक्का पानी बंद हो जाना। पीड़ित पक्ष के पास अपना गुस्सा निकालने के लिये एक मात्र शस्त्र है झर-झर बहते आॅसू। आज भी पीड़ित परिवार को हजारों सवाल परेशान किये हुए हैं। पर शायद आज की विकासवादी संस्कृति के ध्वजवाहकों के लिये ये बातें कोई मायने नहीं रखतीं।

आप जागो आस -पास ऐसी घटना घटे तो चुप मत बैठिये, कलम उठाईये हमें लिखिये । कोई नही सुनेगा हम हवा को सुनायेंगे पर चुप नही बैठेंगे।
जय हिंद!

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