दासता की असीम ममता! जो हमारी जमीन में उत्तरोत्तर उर्वरा हो रही

 भाषाओं के बीच आपसी संपर्क ही विविधता में एकता हैं !

   New Delhi : भाषा और संप्रेषण एकता को मजबूत तभी कर सकते हैं जब उनमें हमारी सांस्कृतिक सत्ता की जड़ें सुदृढ़ हों; ममता, समता, मानवता के संस्कारों की आत्मीयता की सलिल निर्मल धारा सदा प्रवहमान रहती हो। इन सबका सहज संगम और स्रोत भारतीय भाषाएं हैं। भारत के बहुभाषिक समाज और सांस्कृतिक परिवेश में उनकी निश्चय ही अमित ऊर्जा है। इनका पनपना, अस्तित्व बनाए रखना और ज्ञान की असीम धाराओं के रूप में विकसित होना भारतीयता के हित में है। भारतीयता को यदि हम मानवीय, संस्कारपूर्ण, समतामूलक और उन्हें सींचने के लिए शांतिमय संस्कृति की संज्ञा के रूप में मानते हैं, तब हमारी अपनी मातृभाषाओं के प्रति निश्चय ही हममें आत्मीयता पैदा हो सकती है। ‘विविधता में एकता’ का मूलमंत्र हमारी भाषाओं के बीच आपसी संपर्क और इनके सार्थक सह-अस्तित्व का भी संदेश देता है। जब हमारी असंख्य प्रतिष्ठित आत्मीय वाणियां सुसंपन्न हैं, हमें किसी और भाषा की दासता में सड़ते रहने की जरूरत नहीं है।

किसी भी भाषा के सीखने के प्रति हमारी उदारता स्वागत-योग्य है; लेकिन…!

अंग्रेजों ने जो दासता हमारी जमीन में पैदा कर दी थी, उसकी ममता (असर) असीम है, अभी इसके यहां खत्म होने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं। अंग्रेजी की दासता छोड़ने में हम हर पल असफल साबित हो रहे हैं। दुनिया की प्रचलित भाषा के रूप में अंग्रेजी की महत्ता, वैश्वीकृत बाजार की भाषा के रूप में उसकी अहमियत, दुनिया में कई स्रोतों से विकसित ज्ञान भाषांतरण के माध्यम से उसमें मिल जाने से अद्यतन ज्ञान के भंडार के रूप में उसका विकास आदि कई कारणों से अंग्रेजी का ज्ञान व्यर्थ नहीं कहा जा सकता। किसी भाषा या भाषाओं का ज्ञान कभी व्यर्थ नहीं जाता है। इसी दृष्टि से दुनिया की किसी भी भाषा के सीखने के प्रति हमारी उदारता स्वागत-योग्य है। दुनिया में मानवता का संदेश प्रसारित करते हुए मानवीयता का विकास करने की कोशिशों में दुनिया की भाषाएं सीखने के प्रयासों से (‘विश्व गुरु की भूमिका’ निभाने में) हम सफल हो सकते हैं।

हिन्दी का श्राद्ध या दिवस !

दुनिया के बहुत-से देशों ने अपनी जमीन की भाषाओं को अहमियत देकर वहां के शासन, न्यायिक कार्य, शिक्षा, अनुसंधान, ज्ञान-विज्ञान की भाषाओं के रूप में विकसित कर दिया है। हमारे यहां ऐसा क्यों नहीं हो सकता? हम मातृभाषाओं को शिक्षा कामाध्यम बनाने की शिक्षाविदों की राय को क्यों नहीं अंगीकार करते? हम भारत में उलटी गंगा बहा रहे हैं। सब कुछ अंग्रेजी में चलाने के आदी हो गए हैं। संवैधानिक व्यवस्था किसी हद तक भारतीय भाषाओं के पक्ष में होने के बावजूद अधिकांश संदर्भों में हम अंग्रेजी का ही दामन पकड़ कर काम चलाना चाहते हैं। विभिन्न दिवसों को मनाने के सिलसिले में हम काफी आगे बढ़ चुके हैं। ‘हिंदी दिवस’ के नाम से हर साल चौदह सितंबर को एक प्रहसन के रूप में मना कर साल भर हिंदी की जो अवहेलना की जाती है, वह किसी के लिए कोई बड़े रहस्य की बात नहीं है। शायद यह भी कारण हो सकता है कि ‘मातृभाषा दिवस’ मनाने की पक्षधरता हमारे शिक्षण संस्थानों में नजर नहीं आती है। शिक्षा के माध्यम के रूप में उच्चस्तर पर जब तक भारतीय भाषाएं नहीं अपनाई जाएंगी, ऐसी निराशाजनक स्थिति बनी रहेगी।

दासता की शिक्षा को ही मजबूत करते कुलीन व सरकारें!

मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा के पक्ष में कई वैज्ञानिक तर्कों के बावजूद हम अंग्रेजी माध्यम की ओर ज्यादा आकर्षित हैं। प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा के माध्यम से देने की वैज्ञानिकता के पक्ष में कई विभूतियों द्वारा दिए गए तर्कों और आग्रहों को हमने नजरअंदाज किया है। बढ़ते कानवेन्टों (शिक्षा का निजीकरण!), सरकारों का अंग्रेजी माध्यम की ओर आकर्षण (शिक्षा का व्यापार?) आदि ने दासता की शिक्षा को ही मजबूत किया है। गणित और विज्ञान की शिक्षा मातृभाषाओं के माध्यम से देने से भारत की वैज्ञानिक प्रगति को दुनिया में अव्वल देखने की चेतना जगाने वाले अब्दुल कलाम अमर हो गए हैं। भारत के राष्ट्रपति के तौर पर कई विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति के रूप में सुशोभित रहते हुए उन्होंने अनेक बुद्धिजीवियों (मंत्रियों, सांसदों, कुलपतियों, प्रशासकों आदि) को प्रेरित किया था। मगर आजीवन ज्ञान-ज्योति को जीवंत रखने के लिए तड़पने वाले उस विभूति की राय के प्रति कोई श्रद्धा दर्शाने की उदारता हममें कहीं बची हुई है?

भाषा दिवसों  को मनाने की सार्थकता क्या ?
उच्च-शिक्षा के लिए मातृभाषा माध्यमों के बारे में बिल्कुल नहीं सोचा जा रहा है। जब तक मातृभाषा के माध्यम से उच्च-शिक्षा देने के लक्ष्य की ओर हम उन्मुख नहीं होते हैं, तब तक क्या ‘भाषा दिवसों’ को मनाने कोई सार्थकता है? हिंदी दिवस हम हर साल मनाते हैं। पर यह सिर्फ सालाना रस्म अदायगी होकर रह गया है, क्योंकि हिंदी समेत भारतीय भाषाओं को राज-काज की भाषाएं बनाने की संकल्प-शक्ति कहीं नहीं दिखती। शिक्षा के माध्यम के रूप में मातृभाषा को अपनाने के कई लाभ सुनिश्चित हैं। भारतीय भाषाओं में अद्यतन ज्ञान-विज्ञान को अनूदित कर उपलब्ध कराने के लिए राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की सिफारिशों के आधार पर जिस राष्ट्रीय अनुवाद मिशन का गठन किया गया है, उसके उत्पादों का सार्थक उपयोग विचारणीय है। कोई भी अकादमिक उत्पाद जनसामान्य के लिए निश्चय ही उपयोगी होंगे ही, मगर शैक्षिक संस्थानों में उनका विशेष उपोयग होने से उनकी मांग, गुणवत्ता, स्तर अपने आप बढ़ने लग जाते हैं, और करोड़ों की धनराशियां उन पर व्यय करने की सार्थकता भी सिद्ध होगी। यदि हम शिक्षण के माध्यम के रूप में भारतीय भाषाओं को अपनाएंगे तो भारतीय भाषाओं में अद्यतन ज्ञान के अनुवाद व प्रकाशन के कार्य को बड़ी गति मिल सकती है, जिससे रोजगार के भी कई अवसर सृजित होंगे। हमारे तमाम महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में उच्च-शिक्षा की उपाधियां हासिल करने वाले सभी छात्र कहीं विदेशों में जाकर बसने वाले हैं नहीं। हां, जिन्हें जाना है उनके लिए अंग्रेजी माध्यम कहीं उपयोगी हो सकता है।

यूरोपीय देशों में उच्च-शिक्षा के माध्यम वहां की मातृभाषाएं ही हैं

गौरतलब है कि कई यूरोपीय देशों में उच्च-शिक्षा के माध्यम वहां की मातृभाषाएं ही हैं, अंग्रेजी नहीं। भारत के स्कूलों में अंग्रेजी की अनिवार्यता की शर्त हाई स्कूल स्तर से है और तमाम स्नातक स्तर तक की पढ़ाई में भी इसकी अनिवार्यता है। हां, इन तमाम स्तरों पर अंग्रेजी के शिक्षण में गुणवत्ता सुनिश्चित किया जाए, सुधार ला पाएं तो सबके अंग्रेजी के स्तर में निश्चय ही सुधार आएगा। तब जाकर किसी छात्र को किसी विदेशी विश्वविद्यालय में पढ़ाई के लिए जाने, किसी भी देश में नौकरी के लिए जाने और अंग्रेजी में व्यवहार करने में किसी भी प्रकार की समस्या नहीं होगी। जब एक अनिवार्य भाषा के रूप में अंग्रेजी की पढ़ाई की व्यवस्था सुनिश्चित की गई है, तब माध्यम के रूप में भी अंग्रेजी के ही पीछे पागल बने रहने की क्या जरूरत है?

भारतीय भाषाओं में लेख व प्रकाशन, इंटरनेट पर  बहुत कम उपलब्ध हैं!

शिक्षा के माध्यम की समस्या से भी कई छात्र विश्वविद्यालयीय स्तर की पढ़ाई से विमुख हो रहे हैं। हम उच्च-शिक्षा मातृभाषा के माध्यम से देने लगेंगे तो वे सब छात्र भी पढ़ने लगेंगे; इससे निश्चय ही उच्च-शिक्षा के क्षेत्र में नामांकन भी बढ़ सकता है और उच्च-शिक्षा क्षेत्र के लिए आबंटित अनुदानों का सार्थक उपयोग भी हो सकता है। विदेशों से प्रकाशित अंग्रेजी की पुस्तकों के मूल्य उन-उन देशों के आर्थिक स्तर के आधार पर निर्धारित होने की वजह से भारत के छात्रों के लिए वे पुस्तकें महंगी साबित होती हैं। वैसे तो अंग्रेजी में प्रकाशित विभिन्न विषय-क्षेत्रों की कई पुस्तकें इंटरनेट पर पढ़ने के लिए नि:शुल्क उपलब्ध हो रही हैं। मगर भारतीय भाषाओं की पुस्तकों की स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है।एक तो विभिन्न विषय-क्षेत्रों की पुस्तकें भारतीय भाषाओं में बिल्कुल कम प्रकाशित हो रही हैं और उन्हें इंटरनेट पर उपलब्ध कराने की प्रवृत्ति भी बिल्कुल कम है। भारतीय भाषाओं के माध्यम से शिक्षा की व्यवस्था सुनिश्चित करने से इन स्थितियों में निश्चय ही परिवर्तन हो सकता है। भारतीय भाषाओं में शैक्षिक पुस्तकें इंटरनेट पर नि:शुल्क उपलब्ध होना भी सुनिश्चित किया जाना अपेक्षित है।

सभी भाषाओं के संरक्षण को बढ़ावा दें !

वर्ष 1999 में यूनेस्को ने हर वर्ष इक्कीस फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मनाने की सिफारिश की थी। यूनेस्को द्वारा यह निर्णय बांग्लादेश में मातृभाषा के माध्यम को लेकर जो बलिदान 1952 में हुए थे उनकी स्मृति को सार्थकता प्रदान करने का प्रयास था। शांति और बहुभाषिकता को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 2000 से अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जा रहा है। 16 मई 2009 को संयुक्तराष्ट्र महासभा ने संकल्प पारित किया था और अपने सदस्य-राष्ट्रों से आग्रह किया था कि ‘दुनिया के लोगों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली सभी भाषाओं के संरक्षण को बढ़ावा दें।’ विश्वविद्यालय आयोग की तरफ से आए दिन कोई न कोई दिवस मनाने के निर्देश-पत्र विश्वविद्यालयों को भेजे जाते हैं। पर इक्कीस फरवरी को रविवार होने के कारण मातृभाषा दिवस नहीं मनाया जा सका।

भाषाओं के प्रति  कितना आदर !

यूनेस्को द्वारा वर्ष 2016 के अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का विषय था- ‘गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, शिक्षण की भाषा(एं) और अधिगम के परिणाम’। हमें चाहिए कि अपने देश में शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने तथा मातृभाषा के माध्यम से पढ़ाई करने संबंधी लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए शीघ्र ही भारतीय भाषाओं के माध्यम से प्राथमिक से उच्च स्तर तक की शिक्षा देने का निर्णय लेकर ईमानदारी से लागू करें। यूनेस्को ने 2016 के अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के लिए जो प्रतीक-चिह्न जारी किया है, उसमें ‘रेसपेक्ट’ (सम्मान) का पर्याय लगभग शताधिक भाषाओं की लिपियों में दर्शाया गया है, जिसमें भारत की राजभाषा और उसकी लिपि चौपट (या न दिखने के बराबर हो ?) ! यह अपनी भाषाओं के प्रति हम कितना आदर दर्शा रहे हैं, इसका अप्रत्यक्ष संकेत तो नहीं? हम अपनी भाषाओं का सम्मान (रेसपेक्ट) करना जानते भी हैं?

(सी जय शंकर बाबू के ब्लाग से )
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