लवारिश शहर में फर्जी माई-बाप!

दिखावे के सरकारी विभागों में बैठे होनहार कारिंदे कर्तब्य को मजबूरी बताते हुए दिन काट रहे हैं। माफिया हर क्षेत्र में अपना जौहर दिखा रहे हैं। जिम्मेदार बस रस्म निभा रहे हैं। ऐसा कहीं नही दिख रहा कि बद्तर हालात में बढ़ते शहरीकरण के प्रति कोई इस शहर का अभिभावक भी है। सभी ने कर्तब्य निभाने के बजाय टालू रवैया अपना रखा है। क्या यह शहर लावारिश हो चला है। हम बात कर रहे हैं गंगा -जमुनी तहजीब वाले शहर-ए-गोरखपुर की। इस शहर का भौगोलिक आकार कटोरेनुमा है। हल्की बरसात भी यहाॅ का जन जीवन ठप कर देती है। फिर भी यहाॅ के गढ्ढों में शहर बसाव तेजी से हो रहा है। बेलगाम शहरीकरण पर सबका मौन समर्थन , इस शहर के भविष्य के साथ खिलवाड़ नही तो और क्या है। शहर विस्तार के लिये दो अति महत्वपूर्ण विभाग हैं। गोरखपुर विकास प्राधिकरण के पास आवासीय प्रसार तो गीडा के हाथ में औद्योगिक विस्तार की जिम्मेदारी है। नगर-निगम, शहर में विजली ,पानी व सड़क आदि बुनियादी सुविधा मुहैया कराता है। राप्ती व रोहिन नदी के प्रभाव वाले इस महानगर में बाढ़ से राहत दिलाने के लिये चहुॅओर बंधों का निर्माण किया गया है। इसकी निगरानी व निर्माण के लिये बाढ  खंण्ड व ड्रेनेज खंण्ड को जिम्मेदारी दी गयी है। जिला प्रशासन इन सबकी समय -समय पर मानिटरिंग करता रहा है। इन विभागों के कर्तब्यों के बीच भॅाजी मारने वाला विभाग है रजिस्ट्री ।
आपको अवगत कराना चाहतें हैं कि ये सभी विभाग एक ही सरकार के अंर्तगत आते हैं,फिर भी ये एक दूसरे के बारे मे न अवगत हैं न ही कभी सरकार ने इन्हे एक साथ बैठाकर मामले का हल ढूढने का प्रयास किया। अपनी डफली अपना राग अलापते इन विभागों के बीच पत्राचार खूब होता है लेकिन मामलों का हल निकलने में वषों लग जाते हैं। सरकार की ये आधारभूत कमजोरी न्यायालयों मे मुकदमों की ढेर बढ़ा रहे हैं। सभी विभाग जो इस जिले के विकास में दिन रात लगे हुए हैं, आमजन का संकट बढ़ाने के अलाॅवा कुछ भी संतोषजनक नहीं कर रहे। जरा गौर करिये शहर को बाढ़ की विभिषिका से बचाने की जिम्मेदारी सम्भाल रहे हावर्ट बंाध के सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है? पता है यह बाॅध ब्रिटिश हुकुमत मे बना था जो आजाद भारत में किसी विभाग को हस्तांतरित नही हुआ, ऐसे में बंधों की देख-रेख करने वाला विभाग ‘बाढ़ खंण्ड ‘व ‘ड्रेनेज खंण्ड‘ बंधे से अतिक्र्र्रमण हटाने की जुर्रत नही कर पाता। इसकी फाइल आज तक आफिस-आफिस घूम रही है। बाॅध पर 2लेन रोड बनाने का प्रस्ताव नगर निगम ने हाल ही मे पास किया है। इसके पहले पीडब्लूडी यहाॅ सड़क बना चुकी है। मजे की बात है कि बंधे पर कुछ भी करने की इजाजत बाढ़ खंण्ड से लेनी होती है,जिसको आज तक बंधा सौंपा ही नही गया।बंधे पर बढ़ रहे अतिक्रमण से शहर की जिंदगी खतरे में है पर बचाने के जिम्मेदार पहरुये नौकरी कर रहे हैं। नौकरी का मतलब कर्तब्य पालन नहीं बल्कि फाइलों को दफ्तरों की मेज पर दौड़ाना होता है। हर गली नुक्कड़ पर जमीन बेचने वालों के कार्यालय फारचून की दुकान सदृश खुले पड़े हैं। इन पर किसी का बस नहीं। ये स्व घोषित प्रापर्टी डीलर हैं। गौर कीजिये तो शहर में इधर एक दशक में जो भी गोली चली उसमें प्रापर्टी ही मुख्य कारण रहा। जिले के जिम्मेदार विभाग व मीडिया तक जिसे प्रपर्टी डीलर बता रहे हैं उसके प्रापर्टी तथा डीलिंग को जाॅचना जरुरी नहीं समझा गया। शहर में 70प्रतिशत विवाद का कारण जमीन है। उभरते कथित भूमाफिया इस शहर में अपराधिक प्रदूषण फैला रहे हैं। इनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जगह सरकारी दफ्तरों में बैठाकर काफी पिलाई जाती है। फिलहाल शहर का जीवन जलप्लावन व भूकम्प जैसी आपदा को खुली दावत दे रहा है।

मसविरा…………….

इतना तो स्पष्ट है कि ये शहर लावारिश हो चुका है। ऐसे में आप स्वयं कुछ एहतियात रखें‐‐‐ जमीन खरीदने से पूर्व उसके असली मालिक तक पहुॅच कर उसकी तथा जो जमीन आप ले रहे हैं उसकी असलियत जानें, नगर-निगम व जीडीए से अनापत्ति प्राप्त लोगों से ही प्रपर्टी खरीदें,औधोगिक क्षेत्र में जमीन खरीदने से पूर्व औधेगिक प्रधिकरण से अनापत्ति लेलें। यदि क्षेत्र के लेखपाल या कानूनगो आप पर जमीन लेने पर अपनी राय प्रापर्टी डीलर के पक्ष में दे ंतो उनसे कहिये जमीन लेने योग्य है यह लिख कर दें। इत्मीनान कर लें कि हल्की बारिश में बसने वाली जगह के जल जमाव की दशा कैसी है। इन बातों पर गौर नही करने पर आप भारी मुश्किल में पड़ सकतें हैं, साथ ही आपके जीवन भर की कमाई भी लुट जायेगी। जो शहर खुद गढ्ढे मे बसा हो उसे गढ्ढे से उबारने का प्रयास होना चाहिए। सावधान! जमीन के मामले एक पीढ़ी मे निस्तारित होते हमने नही देखा । आप स्वतंत्र हैं।

——-जय हिंद!

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