लालकिले की प्राचीर से ! 15 माॅह मे दिखने लगी माथे पर सिकन

अवसरोचित शब्द-लीला से बाहर निकलना होगा प्रधानमंत्री जी !

narendra modi _ New Delhi: राजनीति में तो एक सप्ताह का वक्त भी काफी माना जाता है। एक साल के तो कहने ही क्या? गत वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालकिले के प्राचीर से जो भाषण दिया था उसमें तमाम वादों और योजनाओं का खुलासा था। वह भाषण उस शख्स के आत्मविश्वास का प्रतीक था जिसने कुछ ही दिन पहले सत्ता संभाली थी। तब से अब तक वह चमक थोड़ी फीकी पड़ी है। नए प्रधानमंत्री के संबोधन में नवीनता भी थी; ढर्रे से हट कर उन्होंने स्त्री के प्रति हिंसा और गंदगी जैसी सामाजिक बुराइयों से लड़ने का आह्वान किया। मगर इस बार जब मोदी ने राष्ट्र को संबोधित किया, तब उन्हें प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाले करीब पंद्रह महीने हो चुके थे। इसलिए उनके भाषण का एक खासा हिस्सा ऐसा था जिसमें सरकार के बचाव की कोशिश नजर आई। उनके समर्थकों को इससे तसल्ली हुई होगी। पर आलोचकों और विरोधियों को भी मुखर होने का मौका मिला है।

…कहीं देश वापस सन 1970 के दशक में न पहुंच जाए

cbi-स्वाधीनता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करने का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह दूसरा मौका था , भाषण को नीतिगत वक्तव्य के बजाय राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जाना चाहिए। यह ऐसे वक्त में सामने आया है जब सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विभिन्न नेताओं के खिलाफ भ्रष्टïाचार के भीषण आरोपों के चलते संसद पूरी तरह पंगु बनी रही। ऐसे में भाषण में यह भी बताया गया कि सरकार कैसे भ्रष्टïाचार से सख्ती से निपट रही है। प्रधानमंत्री ने बताया कि सीबीआई को सौंपे जा रहे मामले पहले के मुकाबले दोगुने से अधिक हो गए हैं। विशेष जांच टीम काले धन को देश में वापस लाने के प्रयास में लगी हुई है। काले धन पर सख्त कानून की वजह से अब तक 6500 करोड़ रुपये मूल्य का कालाधन उजागर हो चुका है।

न्यूनतम सरकार अधिकतम प्रशासन…?

kisan   दिक्कत यह है कि ऐसे रुख में इस बात को जोखिम है कि कहीं देश वापस सन 1970 के दशक के राज्य के हस्तक्षेप वाली स्थिति में न पहुंच जाए। मोदी के भाषण में ऐसी बातें बार-बार आई जो सन 1991 के पूर्व की स्थिति की याद दिलाती हैं। मिसाल के तौर पर उनके भाषण में कहा गया कि निवेश को रोजगार निर्माण से जोड़ा जाएगा। लेकिन क्रियान्वयन के मोर्चे पर इसमें भी दिक्कत सामने आ सकती है। जैसा कि हमने सन 1980 के दशक में रियायती आयात को निर्यात जवाबदेही से जोड़े जाने के रूप में देखा था। किसान कल्याण के लिए नया विभाग खोलने का विचार भी न्यूनतम सरकार अधिकतम प्रशासन के चुनाव प्रचार वाले दावे पर सवाल उठाता है।

 क्या जाति -धर्म पर अनुशाषित है भाजपा के सिपाही ?

amitsahप्रधानमंत्री ने पिछली बार कहा था कि अगर देश को तेजी से विकास करना है तो लोग कम से कम दस साल के लिए जाति और धर्म के झगड़े भुला दें। इस बार भी भारत की एकता और विविधता रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि जातिवाद और सांप्रदायिक उन्माद के लिए देश में कोई जगह नहीं है। सवाल है कि यह अवसरोचित शब्द-लीला है, या उनकी सरकार और पार्टी ने इसे एक नीति के तौर पर भी अपनाया हुआ है? पिछले स्वाधीनता दिवस के मोदी के आह्वान से उलट कई जगह गिरजाघरों पर हमले हुए, ‘घर वापसी’ का तनाव-भरा अभियान चला और सौहार्द बिगाड़ने वाले बयान देने वालों में केंद्र के एक-दो मंत्री भी शामिल रहे। क्या यह विरोधाभास आगे नजर नहीं आएगा? पिछले स्वाधीनता दिवस पर मोदी ने जो कार्यक्रम घोषित किए थे, एक साल पूरा होने पर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि उस दिशा में क्या प्रगति हुई।

      परिहास:  गरीबों की अमीरी !

jandhanमहज एक साल में इतने लोगों को बैंक-खाते की सुविधा मुहैया कराना बड़ी बात है। पर तथ्य यह भी है कि इनमें से लगभग छियालीस फीसद खाते शून्य बैलेंस वाले हैं। विडंबना यह है कि इसे ‘गरीबों की अमीरी’ कहने में मोदी को तनिक संकोच नहीं हुआ। क्या महज खाता खुल जाना अमीरी है? देश से गरीबी मिटाने का इससे आसान तरीका और क्या हो सकता है! निश्चय ही आर्थिक मोर्चे पर सरकार की कुछ उपलब्धियां हैं।

स्टार्ट आप , स्टैंड अप इंडिया  के लिये चाहिए नियामकीय ढांचा  !

यकीनन मोदी अभी भी लोकप्रिय हैं। लेकिन संभावना यही है कि अब उनके वादों की अधिक गहन पड़ताल होगी।प्रधानमंत्री ने भ्रष्टाचार की प्रमुखता से चर्चा की। पर अब ललित मोदी प्रकरण, विनोद तावड़े और पंकजा मुंडे से लेकर व्यापमं तक, अनेक कांड उनmodi stand upका पीछा कर रहे हैं। लोकपाल संस्था का गठन अधर में क्यों है? दरअसल, अब मोदी की समस्या यह है कि वे जो कुछ कहेंगे, उसकी कसौटी पर लोग सबसे पहले उनकी सरकार को कसेंगे। वजह चाहे जो भी हो लेकिन इस वर्ष कुछ ही नई पहल घोषित की गईं। स्टार्ट आप इंडिया, स्टैंड अप इंडिया के अलावा किसी अन्य बड़ी या नई योजना की घोषणा नहीं की गई। स्टार्ट अप का माहौल बनाना जहां अत्यंत महत्त्वपूर्ण है वहीं इस क्षेत्र में सरकार के हस्तक्षेप के अपने खतरे हैं। आदर्श तौर पर देखा जाए तो सरकार को खुद स्टार्ट अप की प्रक्रिया में शामिल होने के बजाय एक बेहतर नियामकीय ढांचा स्थापित करना चाहिए।

Vaidambh Media

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