वर्तमान शिक्षा और शिक्षक

स्वामी विवेकानन्द ने कहा था -”शिक्षा की व्याख्या, शक्ति के विकास के रूप में की जा सकती है । शिक्षा मनुष्य की अन्तर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति है।“ शिक्षा हमारे सर्वांगीण विकास का माध्यम होने के साथ -साथ बदलते हुए संदर्भ में सामाजिक; आर्थिक; राजनीतिक परिवर्तन का एक सशक्त साधन भी है। नवीन शोध, सृजन, आविष्कार एवं लोकप्रवृत्ति को आत्मसात् करते हुए शिक्षा अप्रासंगिक प्रथाओं,रूढ़ प्रवृत्तियों तथा अंधविश्वासों का उन्मूलन करने की दिशा में मानव को अभिप्रेरित करती है।
अतः शिक्षा का अर्थ व्यक्ति के अन्दर निहित क्षमताओं का अधिक से अधिक विकास करना है । शिक्षा एक गतिशील सामाजिक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से मनुष्य में अन्तर्निहित क्षमताएं विकसित कर उसका सर्वांगीण विकास किया जा सकता है और शिक्षक समाज का नीव निर्माता है। अरस्तू का कहना था- अगर आप किसी राष्ट्र के भविष्य की रूपरेखा खींचना चाहते हैं तो वहां के शिक्षकों की सोच एवं दृष्टिकोण समझने की कोशिश कीजिए।
भारतीय संस्कृति में गुरू शिष्य परम्परा आदिकाल से विद्यमान है। विश्वामित्र ने राम को, मर्यादा पुरूषोत्तम बनाया तो द्रोणाचार्य ने अर्जुन, चाणक्य ने चन्द्रगुप्त और परमहंस ने विवेकानंद पैदा किये।
तुर्क और मुगलों ने भारत की गुरू शिष्य परम्परा को नुकसान पहुंचाया और अंग्रेजों ने गुलाम भारत की सनातन शिक्षा प्रणाली को ध्वस्त कर आधुनिक शिक्षा प्रणाली स्थापित की। दुर्भाग्यवश मैकाले की मानसिकता से हम आज तक नहीं उबर पाए।
पाश्चात्य जगत में शिक्षकों मे व्यवसायिकता, नवोन्मेषण, मौलिकता एवं बौद्विकता को अनिवार्य दक्षता माना जाता है वहीं हम अपने शिक्षकों में रटन्तु विद्या तथा लेखन कौशल को ही अति मानते हैं यही कारण है कि शिक्षा में बुद्वि, नवाचार,तर्क एवं व्यवसायिकता का अभाव है परिणामतः 28 करोड शिक्षित बेरोजगार सड़कों पर अपराध, दंगे, भीड़-भगदड़ का हिस्सा बनते रहते हैं। आज अध्यापक पद पर नियुक्त होने के लिए ज्ञानी होना आवश्यक नहीं रह गया है । छात्र भी ज्ञानी – अज्ञानी के चक्कर में नहीं पड़ना चाहता – जो उसका तात्कालिक काम करा दे वही उसके लिए श्रेष्ठ है, वही पूज्य है। आज छात्र अध्यापक संबंध व्यवसायिक हो गया है जिसमें छात्र की हानि तो होती ही है, समाज और देश की भी हानि होती है। अयोग्य, अशिष्ट और अनुत्तरदायी युवाओं की फौज खड़ी हो गयी है। शिक्षक की भी प्रतिष्ठा धूल धूसरित हो गई है, परन्तु उसे स्वयं इसकी चिन्ता नहीं है।
भारत मे शिक्षा का व्यवसायीकरण तो हो रहा है किन्तु शिक्षण पद्धति मे कोई खास अन्तर नही आ रहा है खासकर सरकारी क्षेत्र मे शिक्षण पद्धति मे कोई बदलाव नही आ रहा है। आज छात्रों के पास जानकारी तो है पर समझ नही बन पा रही है।
समझ से तात्पर्य है कि अखिल शिक्षा का व्यवहारिक उपयोग हम नही सीख पा रहे हंै। प्राथामिक विद्यालय का छात्र कुछ कहानियां/ पाठ तो रट लेता है किन्तु इस पाठ के पीछे सीख कहीं खो जाती है ऐसे ही अन्य स्तर के छात्र, शिक्षा शास्त्र व समाज शास्त्र के कुछ सिद्धान्त व अवधारणा को याद तो कर ले रहे है किन्तु इसके सामाजिक पहलू तथा उसके व्यवहारिक जीवन मे उपयोग को नही समझ पाते।
शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर समय-समय पर अनेक अध्ययन होते रहे हैं, इन अध्ययनो से साफ है कि उच्च शिक्षा डिग्री धारक छात्रो मे कार्य कुशलता, जीवन कुशलता तथा व्यवहार नही आ पा रहा है परिणाम स्वरूप न उन्हे नौकरी मिलती है और न जिन्दगी जीने की सीख।ऐसी स्थिति के लिए हमारी शिक्षण पद्धति के साथ-साथ शिक्षा तंत्र भी जिम्मेदार है । एक बड़ा स्याह पहलू ये भी है कि अध्यापक असंवेदनशील हो गये हैं। शिक्षण में नवाचार एवं शोध नही करना चाहते शिक्षण को जिम्मेदारी तो मानते हैं किन्तु शिक्षा की गुणवत्ता तथा छात्रांे का भविष्य उनकी जवाबदेही मे नही आता।ऐसा नही है सब कुछ काला एवं स्याह ही है कुछ शिक्षण संस्थाएं शिक्षा के मुददे पर और स्वैच्छिक संगठन शिक्षा मे नवाचार एवं व्यवसायिकता के क्षेत्र मे कार्य कर रही है।सवाल यह है कि शिक्षिकों में व्यवसायिकता एवं नवोन्मेषण किसकी जिम्मेदारी और जवाबदेही है-
सरकार एवं सरकारी प्रतिष्ठानों की
गैर सरकारी संगठन एवं प्राइवेट शिक्षण संस्थानों की
स्वयं शिक्षक की
या सब बराबर के भागीदार है ???
उत्तर की प्रतीक्षा में………….

ऋचा शुक्ला

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