विज्ञापन,उत्पादन,बिक्री, मुनाफा के बाद अवैध दवायें प्रतिबंधित !

बीमार – ईलाज व दवा के लिये  देश में है चयन का  विकल्प !

New Delhi :  देश में हर तरह की बीमारी का प्रतिशत बढ़ते क्रम में पाया जाता है। कोई भी संक्रमण यहाॅ बहुत तेजी से फैलते हुए देखा जा सकता है। स्वास्थ्य क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या है गरीबअमीर को समान इलाज का अभाव! समान दवाओं का अभाव ! उद्योगपतियों  के हाथों में खेलती सरकारों के पास दृढ निष्चय कर कदम उठाने का साहस अब नही रहा! चाहे वह पालिथ्ीन पर पूर्ण प्रतिबंध हो या अवैध दवाओं का खुलेआम प्रचार बिक्री पर रोकmedicine भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय ने कफ सीरप के मिश्रण समेत उन करीब 344 दवाओं को प्रतिबंधित करने की पहल की है, जिनमें दो या ज्यादा दवाओं का निश्चित मात्रा में मिश्रण होता है। मंत्रालय ने कार्रवाई यह कहते हुए की है कि इनसे लोगों की सेहत को खतरा है और इनके सुरक्षित विकल्प मौजूद हैं। अचरज इस बात का है कि जिन दवाओं पर पाबंदी लगाई गई है, उनमें से कई ऐसी हैं जिन्हें आम आदमी डॉक्टर के परचे के बगैर किसी भी दवा विक्रेता से भरोसे के साथ खरीदता रहा है और उनके बेशुमार विज्ञापनों, उनकी, बिक्री और इस्तेमाल में दशकों तक कोई बाधा नहीं रही है। इनमें कुछ नाम लिए जा सकते हैं, जैसे विक्स एक्शन 500, कफ सीरप कोरेक्स, फेनेसिडिल और बेनाड्रिल। इनके अलावा देश में धड़ल्ले से बिक रही पांच सौ और दवाओं पर पाबंदी की तलवार लटकती बताई जा रही है क्योंकि स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार मिश्रित दवाओं के नुस्खे या फिक्स्डडोज कॉम्बीनेशन (एफडीसी) से तैयार होने वाली ये विषाणुरोधी (एंटीबायोटिक) और एंटीडायिबिटक दवाएं अप्रासंगिक, असुरक्षित और अप्रभावी हैं। इन्हें बनाने इनकी बिक्री को गैरकानूनी घोषित किया जा सकता है।

 केंद्र सरकार की मंजूरी के बिना  वर्षेां से बनाई व प्रचारित  तथा बेंची   जा रही  ‘फिक्स्डडोज कॉम्बीनेशन ‘   !

मंत्रालय का कहना है कि ऐसी ज्यादातर दवाएं केंद्र सरकार की मंजूरी के बिना बनाई और बेची जा रही हैं। खास बात यह है कि कई दवाओं के मिश्रण से तैयार इन दवाओं को अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस और जापान में बेचने की इजाजत नहीं है।add बताया यह भी जा रहा है कि स्वास्थ्य मंत्रालय करीब छह हजार और दवाओं की जांचपड़ताल रहा है जिनमें से एक हजार से ज्यादा एफडीसी यानी मिश्रण से तैयार नुस्खे हैं। इन सैकड़ोंहजारों दवाओं को बनाने और बेचने पर पाबंदी की मंशा कई सवाल खड़े कर रही है। सबसे पहली जिज्ञासा यही है कि सालोंसाल सरकार की नाक के नीचे खुल्लमखुल्ला बेची जाने वाली इन दवाओं में ऐसी क्या खराबी गई है, जो इन्हें बेचनेखरीदने पर पाबंदी लगाने की नौबत आई है। एफडीसी यानी फिक्स्डडोज कॉम्बीनेशन कहलाने वाली ये दवाएं गलीमोहल्लों के मेडिकल स्टोर से लेकर आम जनरल स्टोर तक में आसानी से मिल जाती हैं। खांसीजुकाम जैसे मामलों में तो इन पर लोग आंख मूंद कर भरोसा करते आए हैं। पर अब बताया जा रहा है कि इन्हीं दवाओं की वजह से हमारे शरीर की रोगाणुरोधी प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होती रही है। कुछ मामलों में टॉक्सिसिटी (दवाओं का विषैला प्रभाव) ज्यादा होने के कारण कई महत्त्वपूर्ण अंगों के नाकाम होने का खतरा भी पैदा हो जाता है। मोटेतौर पर ये ऐसी दवाएं हैं जिनमें दो या इससे अधिक दवाओं का निश्चित मात्रा (फिक्सडोज कॉम्बीनेशन) में मिश्रण होता है।

प्रतिरोध क्षमता खत्म कर देतीं हैं ये दवायें !
pillsइन दवाओं के सेवन का फौरन असर तो लोग महसूस करते हैं लेकिन थोड़े समय बाद इनके हानिकारक प्रभाव पैदा होने की बात अब बताई जा रही है। जैसे कहा जा रहा है कि इस तरह के एंटीबायोटिक के ज्यादा मात्रा में इस्तेमाल से सेंट्रल नर्व सिस्टम पर असर होता है और ये लिवर के लिए भी हानिकारक हैं। एफडीसी से तैयार होने वाले एंटीबायोटिक के ज्यादा सेवन से दिल का दौरा पड़ने का खतरा बढ़ जाता है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने अपनी जांच में कई विटामिन मिश्रणों (कॉम्बीनेशंस) को भी अविवेकपूर्ण पाया। इन दवाओं के खतरों को भांपते हुए वर्ष 2013 में स्वास्थ्य से संबद्ध संसदीय समिति ने इस मामले में कड़ा रुख अख्तियार किया था और इन्हें सेहत के लिए खतरनाक बताते हुए बाजार से बाहर का रास्ता दिखाने को कहा था। समिति का यह भी कहना था कि कई कॉम्बीनेशंस में तो एक से ज्यादा एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल किया गया है, जो कि अवैज्ञानिक होने के साथ ही बैक्टीरिया और वायरस में दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा सकता है।

कम्पनियों की खुशामद में  ; प्रतिबंध के लिये दशकों तक कमर कसती रही सरकार !
सबसे उल्लेखनीय तो सरकार की यह दलील है कि इनमें से कई दवाओं को दवा नियामक संस्था सीडीएससीओ से मंजूरी ही नहीं हैं और कंपनियां हानिकारक मिश्रण के बावजूद इनकी धड़ाधड़ बिक्री vicksरती रहती हैं। पर जरा यह देखा जाए कि आखिर इन दवाओं के खतरों को महसूस करने में कितनी अधिक देरी की गई है। जैसे दवा कंपनी प्रॉक्टर एंड गैंबल ने प्रतिबंध के बाद अपने जिस लोकप्रिय ब्रांड विक्स एक्शन-500 एक्स्ट्रा के निर्माण और बिक्री पर रोक लगाने की कार्रवाई की है, उसे भारत के दवा बाजार में आज से तैंतीस साल पहले उतारा गया था। इसी तरह प्रतिबंधित की गई अन्य दवाओं में कोरेक्स और फेनेसिडिल बाजार में पच्चीस साल से बिक रही थीं और लोग इनका धड़ल्ले से सेवन कर रहे थे।

30 वर्ष से ज्यादा दिन खुलेआम बिकी देश में हानिकारक अवैध दवायें !

healthसवाल है कि आखिर ढाईतीन दशक तक स्वास्थ्य मंत्रालय क्या कर रहा था, जबकि इन्हीं दवाओं की बिक्री पर कई मुल्कों में पांबदी लगी हुई थी? क्या सरकारें इस मामले में जानबूझ कर खामोश थींउल्लेखनीय है कि इन सैकड़ोंहजारों दवाओं को बनाने की इजाजत भारत के ड्रग कंट्रोलर जनरल (डीसीजीआई) कार्यालय से नहीं ली गई थी और राज्यों ने अपने स्तर पर ही इन्हें बनाने की इजाजत दवा कंपनियों को दे दी थी। The Union Minister for Health & Family Welfare, Shri J.P. Nadda addressing the 12th India Health Summit, organised by the CII, in New Delhi on December 10, 2015. बारे में दवा विशेषज्ञों का साफ मत है कि कई दवाओं या सॉल्ट से तैयार होने वाली इन दवाओं को एक नई दवा मान कर इनके ठीक वैसे ही क्लीनिकल ट्रायल होने चाहिए थे, जैसे नई दवाओं के होते हैं। हालांकि ट्रायल का मतलब है कि एक ही दवा के निर्माण और मंजूरी पर वा कंपनियों को करोड़ोंअरबों रुपये खर्च करने पड़ते और दवा को बाजार में उतारने में सालों का इंतजार करना पड़ता। संभवत: इसीलिए सारे नियमकायदे ताक पर रख दिए गए और विज्ञापनतंत्र की बदौलत ये दवाएं आम लोगों तक पहुंचा दी गर्इं।

2007 में भी प्रतिबंधित हुई थीं 294 दवायें  !

यों सरकार इस मामले में यह कह कर अपना बचाव कर सकती है कि उसने वर्ष 2007 में भी ऐसी ही करीब 294 दवाओं पर रोक लगाई थी और राज्यों से इन्हें बनाने के लाइसेंस निरस्त करने को कहा था, लेकिन तब दवा कंbainपनियां उसके फैसले के खिलाफ अदालत में चली गई थीं और वहां से उन्हें राहत मिल गई थी। इसके बाद सरकार की पहल पर दो साल पहले दवा तकनीकी सलाहकार बोर्ड की बैठक हुई और उसने इस मसले पर दिशानिर्देश बनाने के लिए एक समिति का गठन भी किया। समिति की सिफारिशों के आधार पर ही इन सारी दवाओं की क्षमता और इंसानी सेहत पर उनके असर की जांच की जा रही है। पर करीब पांचछह हजार दवाओं के इस जखीरे की जांचपड़ताल और दवा कंपनियों के दावों की परख आसान काम नहीं है, क्योंकि अभी यह मामला सालों तक अदालत के गलियारों लटका रह सकता है।

देश में दवाओं की गुणवत्ता को लेकर गोरखधंधा !

fakeइन मामलों को देखने से लगता है कि आखिर क्यों अमेरिका, ब्रिटेन, आॅस्ट्रेलिया जैसे देश भारतीय दवा कंपनियों द्वारा बनाई गई दवाओं की गुणवत्ता को लेकर आशंकित रहते हैं और दवाओं में यदि कुछ भी अनुचित पाते हैं, तो उनका आयात रोक देते हैं। स्पष्ट है कि इन ज्यादातर देशों को अपने नागरिकों की सेहत की फिक्र है, जबकि हमारे देश में यह बात तो शायद सरकार के आखिरी एजेंडे में भी बड़ी मुश्किल से ही अटती रही है। देश में दवाओं की गुणवत्ता को लेकर कैसेकैसे गोरखधंधे चल रहे हैं, इसका अनुमान 2014 में स्वास्थ्य मामलों की संसदीय समिति की एक रिपोर्ट में मिला था। govt.बसपा सांसद अखिलेश पाठक की अगुआई वाली इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में सेंट्रल गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम (सीजीएचएस) के तहत मरीजों को दी जाने वाली दवाओं की गुणवत्ता पर सवाल उठाए थे और कहा था कि इस मामले में उसे सीजीएचएस सदस्यों से बड़ी तादाद में शिकायतें मिली हैं। इन सदस्यों ने शिकायत की थी कि कई बार तो उन्हें ऐसी दवाएं भी दे दी जाती हैं, जिनकी एक्सपायरी डेट एकदम करीब होती है। समिति ने यह आशंका भी जताई थी कि कहीं सीजीएचएस के जरिए घटिया और नकली दवाओं की सप्लाई तो नहीं की जा रही है। समिति के मुताबिक, सीजीएचएस में जेनरिक और ब्रैंडेड दवाओं की खरीद हॉस्पिटल सर्विस कंसल्टेंसी कॉरपोरेशन के जरिए की जाती है। खरीद के बाद दवाएं मेडिकल स्टोर डिपो में रखी जाती हैं, जहां से इनकी सप्लाई मांग के मुताबिक सीजीएचएस सेंटर्स में की जाती है। इस चक्र में कहीं कोई चूक अवश्य हो सकती है। पूरा मामला इलाज और दवाओं के निर्माण बिक्री तंत्र में भारी झोल का है। आम आदमी को इलाज और दवाओं के नाम पर किस तरह लूटा जाता है, यह किसी से छिपा नहीं रहा है।

गरीब मरीजों को  दवाखाने से उनके लिये  सस्ते और घटिया विकल्प क्यों ?

समस्याएं कई हैं, जैसे विशेषज्ञ डॉक्टर मरीज के पर्चे पर जो दवाएं लिखते हैं वे अत्यधिक महंगी होती हैं।वे दवा कंपनियों से मिलने वाले कमीशन के एवज में महंगी दवा लिखते हैं, जबकि उनCHILDERNके सस्ते विकल्प (सबस्टिट्यूट्स) बाजार में मौजूद होते हैं। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर जो दवा गरीब मरीजों को लिखते हैं, दवाखाने से उनके सस्ते और घटिया विकल्प दिए जाते हैं। ऐसी हालत में गरीब मरीजों को भी बाजार से दवाएं खरीदने को मजबूर होना पड़ता है। इन करतूतों का एक असर यह हुआ है कि पिछले कुछ वर्षों में कई सरकारी दवा कंपनियां या तो बंद हो गई हैं या फिर उनकी हालत खस्ता है। इससे निजी दवा कंपनियों को बेखौफ धांधली के बेशुमार मौके मिले हैं। इसी कारण आम जनता को रियायती दरों पर अच्छी गुणवत्ता की दवाएं नहीं मिल पा रही हैं।

Vaidambh Media

 

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