विधुत संकट :बेईमान राजनीति की देन

लखनऊ। प्रदेश भर में विद्युत आपूर्ति का संकट अभूतपूर्व है। हर जिले, तहसील, ब्लाक, शहर व गांव में कोहराम मचा हुआ है। सरकार के पास जवाब नहीं है। लोगो को सही जानकारी देने के बजाय केन्द्र व प्रदेश की सरकारे एक दूसरे केे कंधे पर बन्दूक रखने वाली कहावत चरितार्थ कर रही हैं। सच्चाई पर नजर डाले तो न केन्द्र के पास बूता है और ना ही प्रदेश सरकार की विद्युत उत्पादन की इतनी हैसियत है कि वह लोगों की अपेक्षाओं पर खरा उतर सके।
जोश में होश गंवा चुके नौजवानों को अपने पक्ष में कर राजनीतिक पार्टियां स्वयं का उल्लू सीधा करने में जुटी हुयी हैं। वास्तविकता से कोसो दूर ले जाकर तमाम उत्तेजनापूर्ण बयान व लक्ष्यविहीन पथ दिखाकर युवाओं को विद्युत केन्द्रों पर हमलावर बनाने वाले राजनीतिक पार्टियों के लोगो को क्या यह नहीं पता कि वह सरकार व जनता को ही क्षति पहुंचा रहे हैं। राष्ट्र के प्रति अगाध प्रेम का छद्म व तमाम तकनीकी संसाधनों के बूते दिवास्वप्न दिखाने वाले नेताओं से आज जब लोगों की अपेक्षाएं बढ़ गयी तो उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा है और वह उलझाने वाले तमाम बयानों का बाजार गरमाने में लगे हुए हैं। यह सही है कि विद्युत हमारे जीवन का आवश्यक अंग बन गयी है लेकिन ऐसा भी नहीं इसके बिना रहा न जा सके। राजधानी लखनऊ हो, ओद्योगिक नगर कानपुर, मेरठ, अलीगढ, बरेली, वाराणसी, फतेहपुर हो उन्नाव, बिजनौर, गोरखपुर, कुशीनगर सरीखे जनपदों में विद्युत को लेकर त्राहि-त्राहि मची हुयी है। गांवो में किसान परेशान है तो शहर में व्यापारिक गतिविधियां पूरी तरह ठप सी हो गयी हैं। पावर कारपोरेशन व सरकार के लोग निरन्तर हल ढूढने में लगे हुए हैं। कुशीनगर में भाजयुमो कार्यकर्ताओं ने विद्युत केन्द्र पर हंगामा किया, मथुरा में कांग्रेस के कार्यकर्ता उबाल में रहे। गोरखपुर के सहजनवां में छोटे दलों के शह पर युवा, थाने का घेराव किये, गोरखपुर में बंद कराने के प्रयास में लाठियां खाये। क्या राजनीतिक पार्टियों का विरोध विद्युत आपूर्ति के संकट में जायज है? राजनीतिक लोग  बिना किसी सिर-पैर की बात को मुद्दा बना आन्दोलन की शक्ल दें, युवाओं को अपना मोहरा बनाते रहेंगे!
याद कीजिए सत्तर का वो दशक जब देश मे खाद्यान्न की कमी थी। लोग एक-एक दाने को मोहाल थे। ऐसे में राजनीति भी चरम पर थी फिर भी देश के नेता की जिम्मेदारी को समझते हुए जब पूरे विश्वास के साथ प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने आम जनता से अपील की सप्ताह में एक दिन अन्न का त्याग करें तो इसे जनमानस ने  समझा और सच्ची अपील का स्वागत इस तरह हुआ कि उसे राष्ट्रीय उपवास के रुप में जाना जाता है। यही से जय-जवान, जय किसान का नारा लगा और आज तक हमें अन्न के लिए किसी का मुंह नहीं ताकना पड़ा। यहां भी बात ईमानदार व बेइमान राजनीति की है। सरकारें जनता से सीधे संवाद की वकालत करती हैं लेकिन सही संवाद करने से बचती हैं। पूरे देश को गुजरात माडल दिखाने वाले के नेतृत्व मे आज देश विद्युत संकट झेल रहा है। तमाम नये शोध पर विचार हो रहे हैं पर सच्चाई यह है कि राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम का ऊंचाहार ताप विद्युत संयंत्र 210 मेगावाट की दो नम्बर इकाई में तकनीकी खराबी आने से उत्पादन ठप है। रोजा तापी संयंत्र की 500 मेगावाट की इकाई बंद पड़ी है। ये दोनों ही व्यवस्था केन्द्रीय पूल से संचालित होती हैं। अनपरा की लैको इकाई बंद है। उत्तर प्रदेश को 13000 मेगावाट के सापेक्ष 10 हजार मेगावाट बिजली उपलब्ध हो रही है। 3 हजार मेगावाट की खाई भरने के लिए धुआंधार विद्युत कटौती जारी है। पावर कारपोरेशन के साथ मुख्यमंत्री निर्णय लेते हैं कि 4 घंटा 49 मिनट गांव क्षेत्रांे में विद्युत आपूर्ति की जायेगी और बाहर निकलकर केन्द्र सरकार को विद्युत संकट के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। केन्द्र व सरकार दोनों ही सच्चाई से विमुख, जनता को राजनीति का ही पाठ पढा रहे हैं। होना यह चाहिए कि विद्युत खरीद के नये विकल्प पर जोर दिया जाए। विद्युत मांग पूरा करने में हांफते बिजली घर, जर्जर ट्रासफार्मर तथा खस्ताहाल पारेषण लाइनें दुरूस्त की जाए।
राजनीति करने वालों ने जनता का विश्वास खो दिया है। ऐसे में वह शास्त्री जी की तरह कोई ईमानदार अपील करने में देश की जनता से डरते हैं। यदि वह सच्चाई जनता के सामने लाते हैं तो वास्तविकता के धरातल पर बेइमान राजनीति चारों खाने चित्त हो जायेगी।

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