विपक्ष व सरकार की रॅार में फॅसा देश का विकास !

देश के विकास की जगह राजनीतिक स्वार्थ हो गया अहम!

deshNewDelhi: तूफानी बादल मंडराने लगे हैं और हमारी राजनीति और अर्थव्यवस्था को आने वाले महीनों में बुरे वक्त का सामना करना पड़ सकता है ! दिल्ली में सरकार और विपक्ष के बीच आपसी विश्वास की राजनीतिक संस्कृति टूट के कगार पर है। सरकार में बैठे लोगों को सत्ता का अहम है तो सदन में सरकार के क्रियाविधि पर नजर रखनें वालों को अब सिर्फ मौके कि तलाश है कि सरकार कोई गलती करे और विपक्ष को राजनीतिक प्रोपगण्डा फैलाने का मौका मिले ! जनता और देश के विकास की जगह राजनीतिक स्वार्थ ने ले ली है ! अर्थव्यवस्था की बात करें तो वृद्घि दर में मंदी और चीन की मुद्रा के अवमूल्यन की वजह से समायोजन की गंभीर समस्या खड़ी होगी। लेकिन इन दोनों चिंताओं में हमारी राजनीतिक व्यवस्था का भविष्य अधिक बड़ी चिंता है।
क्या ये धरना, प्रदर्शन, भूख हड़ताल संवैधानिक तरीका है!

dharna prdarshanहर देश आगे चलकर उन्हीं तौर तरीकों की ओर लौटता है जिनसे उसका जन्म होता है। फ्रांस में कोई बड़ा राजनीतिक वक्तव्य बिना पेरिस की गलियों में बैरिकेड (बाड़) लगाए नहीं दिया जा सकता। ब्रिटेन में यह काम संसदीय उथलपुथल के बीच होता है। भारत में हम विभिन्न प्रदर्शनों, धरना और भूख हड़ताल आदि के सत्याग्रही तरीके अपनाकर अपनी राजनीतिक मांग पर जोर देते हैं। हमारे देश में यह राजनीतिक संस्कृति इतने गहरे तक घर कर गई है कि लोकसभा के बीते सत्र में कांग्रेस द्वारा लगातार व्यवधान उत्पन्न करने पर सत्ताधारी दल तक धरना-प्रदर्शन करने पर उतारू हो गया। जब संसदीय बहस का स्थान सड़कों पर धरना-प्रदर्शन ले ले तो इसका मतलब है कि लोकतंत्र को खतरा पैदा हो गया है। डॉ. आंबेडकर ने इसे बहुत पहले भांप लिया था। 27 नवंबर 1949 को उन्होंने संविधान सभा में अंगीकरण के लिए संविधान को पेश करते समय जो भाषण दिया था उसका उल्लेख करना श्रेयस्कर होगा। डॉ. आंबेडकर ने कहा था, ‘अगर हम सही मायनों में लोकतंत्र को कायम रखना चाहते हैं तो हमें क्या करना चाहिए? मेरा मानना है कि हमें अपने सामाजिक और आर्थिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए संवैधानिक तौर तरीके अपनाने चाहिए। इसका अर्थ यह है कि हमें क्रांति का रक्तपात भरा रास्ता त्याग देना चाहिए। इसका यह भी अर्थ है कि हमें सविनय अवज्ञा, असहयोग और सत्याग्रह जैसे तरीकों का त्याग कर देना चाहिए। जब आर्थिक और सामाजिक लक्ष्य हासिल करने का कोई संवैधानिक तरीका नहीं रह जाएगा तब असंवैधानिक तौर तरीकों को उचित ठहराने की गुंजाइश बढ़ जाएगी। लेकिन अगर संवैधानिक तौर तरीके मौजूद हैं तब असंवैधानिक गतिविधियों के लिए कोई संभावना शेष नहीं रहती। ये तरीके अराजकता का जरिया भर हैं। इनको जितनी जल्दी त्याग दिया जाए उतना ही अच्छा है।’
सदन में गतिरोध, राजनैतिक संस्कृति की नई समस्या !

parliyamentमॉनसून सत्र में हमें जिस तरह का गतिरोध देखने को मिला वह हमारी राजनैतिक संस्कृति की एक नई समस्या की ओर ध्यान आकृष्टï करता है। इस गतिरोध में केवल आपसी सम्मान ही नहीं खो रहा है बल्कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवाद की कमी भी साफ नजर आ रही है। इसके लिए कुछ हद तक पार्टी नेताओं की अपने कार्यकर्ताओं को लुभाने की कोशिश भी जिम्मेदार है जो जमीनी स्तर पर एक दूसरे से उलझते रहते हैं।mumbai_azad_maidan.कई बार उनकी झड़प हिंसात्मक भी हो जाती है। हमने पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में ऐसे विवाद देखे हैं। लेकिन केंद्र में विपक्ष की स्वीकृति और उसकी असहमति को सम्मान आजादी के बाद से हमारी संसदीय राजनीति का अहम हिस्सा रहा है। वर्ष 1975-77 के आपातकाल को इसका अपवाद माना जा सकता है। राजनीतिक इतिहास के उस दुखद प्रसंग के 40 साल बाद क्या हम एक बार फिर संसदीय लोकतंत्र के पराभव की ओर बढ़ रहे हैं? किसी भी सुचिंतित नागरिक को केवल संसद के हालात से भयभीत होने की जरूरत नहीं है लेकिन दोनों पक्षों के नेताओं के बीच नजर आ रही कटुता जरूर इसकी वजह है। इसका असर केंद्र और राज्य के आपसी संबंधों पर भी पड़ रहा है। हाल ही में एनडीसी की बैठक में कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की गैरमौजूदगी इसका उदाहरण है।
अहम है, राजनीतिक बहस को सहयोगी और रचनात्मक राह पर लाना

deshयह सच है कि कार्यपालिका काफी कुछ कर सकती है और सरकार को उसके द्वारा उठाए गए कदमों के लिए साधुवाद दिया जाना चाहिए। उनमें ताजातरीन है सरकारी बैंकों के सुधार की योजना। लेकिन हमारी राजनीतिक बहस को सहयोगी और रचनात्मक राह पर लाना अत्यंत अहम है। केवल वैसा करके ही हम जीएसटी विधेयक और अन्य सुधार संबंधी अन्य अहम विधेयकों को पारित कर सकेंगे। अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति संबंधी पहल को आम सहमति दिलानी है तो सरकार को विपक्ष के समर्थन की भी आवश्यकता होगी। हमारे राजनेताओं को हमें आश्वस्त करना चाहिए कि वे न केवल संसदीय लोकतंत्र को लेकर प्रतिबद्घ हैं बल्कि वे राजनीतिक मतांतरों के प्रति भी सम्मान की भावना रखते हैं। कांग्रेसमुक्त भारत जैसे नारे उचित नहीं हैं जो एक पार्टी के विरुद्घ हैं। भारत जैसे विविधतासंपन्न देश में वे एक त्रासदी के समान हैं।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सवाल ?
संसदीय बहस को सभ्य बनाने में प्रधानमंत्री बढ़ें आगे !

modi selfi प्रधानमंत्री को आगे बढ़कर संसदीय बहस को सभ्य बनाने का प्रयास करना चाहिए। विपक्ष को भी इस काम में मदद करनी चाहिए। प्रधानमंत्री ने सहयोगी संघवाद को लेकर प्रतिबद्घता दिखाई है। वहां भी विपक्ष शासित राज्यों को लेकर समझदारी से काम करना होगा। मीडिया और स्वयंसेवी संगठनों को लेकर सरकार का व्यवहार खासतौर पर प्रसार भारती जैसे सरकारी संस्थान के मामले में उसके व्यवहार ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर उसकी प्रतिबद्घता पर सवाल खड़े किए हैं। भारत जैसे देश में सरकार को सार्वजनिक बहस में असहमति को बरदाश्त करना चाहिए।career-development फिलहाल विवादरहित सकारात्मक राजनीतिक बहस जरूरी है लेकिन फिलहाल इसकी आवश्यकता और भी ज्यादा है क्योंकि केंद्र सरकार को निकट भविष्य में कई आर्थिक नीति संबंधी चुनौतियों का सामना करना है। वैश्विक अर्थव्यवस्था भी अस्थिरता की शिकार है। इससे पहले से संकटग्रस्त औद्योगिक क्षेत्र की समस्याएं और बढ़ेंगी। युआन के अवमूल्यन का इस्पात और बिजली उपकरण जैसे क्षेत्रों पर बुरा असर होगा क्योंकि चीन से होने वाला आयात अब सस्ता हो गया है। निर्यात करने वाली फर्मों को तीसरे देशों के बाजार में इसका खमियाजा भुगतान होगा क्योंकि चीन वहां सस्ता निर्यात करेगा। निर्यात में पहले से गिरावट का रुख है। आगे हालत और खराब हो जाएगी।
आरबीआई रुपये को और गिरने देगा ताकि निर्यातकों को मिले मदद !

rbi1यकीनन आरबीआई रुपये को और गिरने देगा ताकि निर्यातकों को मदद मिले और युआन के अधिमूल्यन का मुकाबला किया जा सके। लेकिन रुपये का अवमूल्यन उन कंपनियों की बैलेंस शीट पर बुरा असर डालेगा जिन्होंने विदेशों में कर्ज ले रखा है और जो उन कंपनियों में शामिल हैं जिनका 275 करोड़ रुपये का कर्ज पुनगर्ठित किया जा रहा है। ऐसा भी नहीं है कि दबाव उद्योग जगत तक सीमित रहेगा। यह बैंकों की बैलेंस शीट को प्रभावित करेगा। लब्बोलुआब यह है कि सरकार के महत्त्वाकांक्षी वृद्घि एवं विकास एजेंडे को जोखिम पैदा हो जाएगा। मौजूदा समय में जबकि हालात जोखिम भरे हैं सरकार को विपक्ष के सहयोग की आवश्यकता है। विपक्ष को भी यह समझा चाहिए कि उसकी जिम्मेदारी क्या है। सरकार और विपक्ष से भविष्य में और अधिक जिम्मेदार राजनीति की अपेक्षा है।
Vaidambh Media

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