व्यवहारिक धरातल पर मानवाधिकारों की जन जागरूकता

 

प्रकृति ने सभी जीवों का सृजन कर उन्हे जीवन जीने का अधिकार प्रदान किया है। इस सृजन का सबसे अद्भुत जीव मनुष्य है। मनुष्य , प्रकृति के जीव निर्माण मिशन का सम्भवतःअंतिम उत्पाद है। मनुष्य ने इसे समय-समय पर प्रमाणित भी किया है। स्वएं को श्रेष्ठ साबित करने की हवस ने मानव को मानव के विरुद्ध खड़ा कर दिया है। विकास के नाम पर प्रगति करती भोगवादी संस्कृति ने मनुष्य को मानवता से ही विरत कर दिया। वैश्विक समाज ने मानव हितों की रक्षा के लिये मानवाधिकार की आवश्यकता पर बल दिया। दुःखद है कि इसं अधिकार को जहाॅ सबसे अधिक तरजीह मिलनी चाहिये वहाॅ सभी इसे अलग-अलग चश्में से देख रहे है।
मानवाधिकार तथा मौलिक स्वतंत्रता हमें अपने गुणों, ज्ञान, प्रतिभा तथा अन्र्तविवेक का विकास करने में सहायता करते है जिसमे हम अपनी भौतिक, आध्यात्मिक तथा अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति एवं संतुष्टि कर सकें। कह सकते हैं कि मानवधिकार वह है जो हमारी प्रकृति में अन्र्तनिहित है तथा जिनके बिना हम मनुष्य की भाॅति जीवित नही रह सकते। इसे किसी विधायी शक्ति या सरकार द्वारा छीना नही जा सकता। मानवाधिकार एवं मूलाधिकार ’विधि’ की महत्वपूर्ण अवधारणाएॅ हैं। मानवाधिकार का संरक्षण आज विश्व के समक्ष एक बहुत बड़ी चुुनौती हैै। मानवाधिकार की आवश्यकता सदैव रही है। वैदिक युग में भी मानवाधिकारों का अस्तित्व था। प्लेटों एवं अन्य दार्शनिकों ने भी अपनी कृतियों में मानवाधिकारों को महत्वपूर्ण स्थान दिया है। मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम ‘1933’ से इस क्षेत्र में एक नयी किरण का संचार हुआ।
अन्र्तराष्ट्रीय स्तर पर मानव अधिकारों मंे अभिवृद्धि का भविष्य बहुत उज्वल नही दिखाई पड़ता। ऐसा उस समय तक रहने के लिए सम्भाव्य है, जब तक विकासशील देशों के प्रति विकसित देशों की प्रवृत्ति में परिवर्तन नही हो जाता। वास्तव मेे, मानव अधिकार के सम्बन्ध में कागजी कार्यवाही बहुत ही अधिक की गर्यी िकन्तु वास्तव में, स्थिति पूर्णतया भिन्न है। लाखों लोग अत्यधिक बिगड़ी हुई आर्थिक तथा सामाजिक स्थिति के कारण जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से अब भी वंचित है। सुसम्पन्न राज्य तथा उनके निवासी, जो संयुक्त राष्ट्र के भीतर तथा बाहर मानव अधिकारों के लिए वकालत करते हैं, उनकी ओर से इस बात की आवश्यकता है कि वे उन व्यक्तियों की स्थिति का अनुभव करें, जो इन मूल आवश्यकताओं से वंचित है। उनसे यह अनुभव करने की भी अपेक्षा की जाती है कि मानव जाति एक है और सभी मानव समान है और उन्हें कम से कम न्यूनतम अधिकार तथा स्वतंत्रता व्यवहारिक स्तर पर मिलनी चाहिए। जन सामान्य में व्यवहारिक धरातल पर मानवाधिकारों की जन जागरूकता के राष्ट्रीय, अन्र्तराष्ट्रीय परिकल्पनाओं को साकार करने की दिशा में गोरखपुर का एलर्ट मूवमेण्ट फोरम का प्रयास निःसन्देह सराहनीय व प्रशंसनीय है।
विकासशील देश या अल्प विकसित राज्यों में मानव अधिकार के संरक्षण की समस्या पूर्णतया भिन्न है। ऐसे राज्य अपनी कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण अपनी जनसंख्या के जीवन की मूल आवश्यकताओं को प्रदान करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वह राज्य अपनी जन संख्या कों सिविल तथा राजनैतिक अधिकार कैसे प्रदान कर सकता है, जहां जनसंख्या को भोजन, आवास तथा वस्त्र ही उपलब्ध नही है ? निःसन्देह, राज्यों का अपने नागरिकों की मूल आवश्यकताओं को उपलब्ध कराने का प्रत्येक सम्भव प्रयास करना उत्तरदायित्व है। किन्तु विकास के प्रश्नों पर नयी अन्र्तराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था पर विचार किये बिना मानव अधिकारों पर बात करने से वृद्धि करने का उद्देश्य पूरा नही हो पायेगा। इन्हें अन्य राज्यों ,विशेषकर विकसित राज्यों के सहयोग की अत्यधिक आवश्कता है। गरीबी तथा भूख का उन्मूलन करने में कोरे कागजी वादे नही अपितु यह उनका कर्तब्य है क्योंकि कही भी इनका बने रहना, देश की समृद्धि के लिए खतरा उत्पन्न कर सकता है। शान्ति और सुरक्षा बनाये रखने का मानव अधिकार के संरक्षण से निकटतम सम्बन्ध है। अन्र्तराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था में परिकल्पित समाधान को प्रभावी करने में जो राज्य असफल हैं वहाॅ आर्थिक सुधार और मानव गरिमा में वृद्धि, सुरक्षा, न्याय और समानता के विचार का खतरा उत्पन्न हो गया है।

धनन्जय ’बृज’
मो0-9415691024
गोरखपुर

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