शर्मनाक : पत्रकारिता में अधजल गगरी की होड़ क्यों ?

भारत में एक स्वतंत्र मीडिया का अभाव जो मुनाफे के लिए काम न करता हो !

New Delhi : भारत में ही नहीं अपितु विश्व भ्रर में पत्रकारिता आज कारपोरेट के चंगुल में फंस कर रोबोट मशीन की भाॅति काम कर रही है। jouranilismसभी देशों में पत्रकार को स्वतंत्र निष्पक्ष् मानने वालों की संख्या में कमी देखी गयी है। पत्रकार . धर्म ,जाति ,वर्ग से प्रेरित नही होता है। उसकी एक ही जाति है पत्रकारिता  और कर्म है सच को बाहर लाना !  वर्ष 2001 में बोस्टन ग्लोब के संपादक के रूप में काम संभालने के पहले ही दिन मार्टिन बैरन स्पॉटलाइट टीम को सुझाव देते हैं कि वह उन आरोपों की पड़ताल कर सकती है जो कैथलिक चर्च में होने वाले बाल यौन शोषण की बात को छिपाने से संबंधित हैं। स्पॉटलाइट उस समाचार पत्र की खोजी शाखा है और वह खबरों पर कई महीनों तक और यदाकदा तो सालों तक काम करती है। संपादकीय टीम की बैठक के तत्काल बाद बैरन प्रकाशक से मुलाकात करते हैं। वह उनसे कहते हैं कि वह एक प्रस्ताव लाने जा रहे हैं ताकि उनको सीलबंद दस्तावेजों में ताकझांक का अवसर मिल सके और वे चर्च की संलिप्तता के बारे में पता लगा सकें। प्रकाशक उनसे कहता है कि उनके पाठकों में से अधिकांश कैथलिक हैं लेकिन इसके बाद वह उनको इजाजत दे देता है।journalism2 हमारे देश को ऐसी स्थिति में आने के लिए लंबा सफर तय करना है। भारतीय समाचार मीडिया के साथ समस्याएं ही समस्याएं हैं: आक्रामक विज्ञापनदाता, पैसा न देने वाले दर्शक, खंडित कारोबारी मॉडल एक निजी समाचार मीडिया जिसके मालिक अचल संपत्ति के कारोबारी, राजनेता आदि हैं। इसके अलावा अन्य लोकतांत्रिक मुल्कों की तरह अंतिम तौर पर इन पर किसी तरह की निगरानी नहीं है यानी एक स्वतंत्र मीडिया का अभाव जो मुनाफे के लिए काम न करता हो। ब्रिटेन में बीबीसी और द गार्जियन आदि इसके उदाहरण हैं। भारत में दूरदर्शन जरूर है लेकिन यह प्रशासनिक और वित्तीय रूप से बंधा हुआ है।

 कैथलिक पाठकों के अखबार में यहूदी संपादक !
यह इस साल सर्वश्रेष्ठï फिल्म की श्रेणी में ऑस्कर जीतने वाली फिल्म स्पॉटलाइट (सत्य घटनाओं पर आधारित) का एक सामान्य सा दृश्य है। लेकिन ऐसा कोई भी व्यक्ति जो स्वतंत्र मीडिया और एक सक्रिय लोकतंत्र से उसके संबंधों में रुचि रखता हो, उसके लिए यह दृश्य अहम है। यह कि एक कैथलिक पाठकों के अखबार में यहूदी संपादक नियुक्त किया जाता है, वह एक ऐसी खोजी रपट सुझाता है जो कैथलिक चर्च का खुलासा करती है और यह खबर पुलित्जर पुरस्कार हासिल करती है।  यह वाकया तीन चीजें स्पष्टï करता है।
journalism 11- पहली बात, यह एक ऐसा समाज है जहां कोई भी किसी भी चीज पर प्रश्न उठा सकता है फिर चाहे संबंधित बात कितनी भी पवित्र क्यों न मानी जाती हो। सोचने, बहस करने और सत्य की खोज करने पर किसी तरह की कोई रोक नहीं है। यह एक लोकतांत्रिक व्यवस्था है जो ऐसी जांच को अंजाम देने के लिहाज से पर्याप्त मजबूत है जहां सहजता से तार्किक परिणति पर पहुंचा जा सकता है।
2- दूसरी बात, एक ऐसा मीडिया उद्योग जहां प्रकाशक, संपादक और संवाददाता सभी बढिय़ा ढंग से प्रशिक्षित हैं, अपने काम के बारे में बखूबी जानते हैं और जो अपने काम को अंजाम देने या गलतियों को स्वीकार करने में हिचकते नहीं हैं। फिल्म में यह नजर आता है। स्वनियमन, प्रभाव या दबाव कहीं नजर नहीं आता है हालांकि एक सीमा तक ऐसा होना चाहिए।
3-तीसरी बात, मीडिया में असली अंतर पैदा करने की क्षमता है। फिल्म में जो लोग यौन शोषण की दास्तान सुनाते हैं, उनकी शक्लें कई घंटों तक आपके साथ बनी रहती हैं। यह बात सुखद लगती है कि अंतत: उनको एक हद तक न्याय मिलता है।
समाचार मीडिया पर तगड़ा अंकुश की नौबत क्यों ?
 journalism_study_picभारत में अनेकों ऐसे मामलें आये दिन प्रत्यक्ष हो रहे हैं जिनके कारण अक्सर हम और हमारी पत्रकारिता शर्मिंदा होती है।  इनमें सबसे ताजा घटना है जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की घटनाओं की कम जानकारी, कम जांच वाली और एकदम फैसला सुना देने वाली रिपोर्टिंग। एक वीडियो सामने आया जिसकी विश्वसनीयता पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। उसे तमाम मानकों को धता बताते हुए प्रसारित कर दिया गया। याद रखिए कि बीबीसी के पास एक पूरी टीम है जो उसे मिलने वाले वीडियो की जांच करती है।
भारतीय मीडिया मेंं  शोधपरक रपट  क्यों नहीं ?
यहां पर दो प्रश्न उठते हैं –
पहला, हालात इतने खराब कैसे हो गए कि देश के लोग चाहते हैं सरकार समाचार मीडिया पर तगड़ा अंकुश लगाए? सोशल मीडिया में पत्रकारों पर ओछी टिप्पणियां की जा रही हैं। इस पेशे की विश्वसनीयता दांव पर है। आप कह सकते हैं कि यह पूरी छवि टीवी jouranilism.3के कारण बनी है और कई चैनल अच्छा काम कर रहे हैं। लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है।
दूसरा, अगर अच्छी सामग्री ही इस कारोबार का मूल है तो क्या मीडिया को वापसी नहीं करनी चाहिए? उसके पास शोध और विश्लेषण के साथ कहने को अच्छी खबरें नहीं हैं? द हिंदू, द टेलीग्राफ, द इंडियन एक्सप्रेस आदि अखबार अच्छी खबरें प्रकाशित करते रहे हैं। ऐसे अनेक मामले हैं जहां मीडिया के कारण फर्क पड़ा। जेसिका लाल हत्याकांड हो या कोयला घोटाला। अगर इन खबरों का असर हो तो पाठक भी बढ़ें और विज्ञापन भी जो कि इस उद्योग की आय का प्रमुख स्रोत है। क्या भारतीय मीडिया को अपना समय शोधपरक रपट लिखने मेंं नहीं लगाना चाहिए ताकि उसकी गुणवत्ता को लेकर बहस पर विराम लगे।
 मीडिया ब्रांड के लिए विश्वसनीय रेटिंग में निवेश करें मीडिया संस्थाएं
एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया, न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन तथा अन्य मीडिया संस्थाएं बेहतर मानक, अनिवार्य प्रशिक्षण, फेलोशिप और शोध अनुदान के जरिये यह सुनिश्चित कर सकती हैं। इसके लिए उन्हें केवल अपनी वेबसाइट पर मानक निर्धारित करने से आगे बढऩा होगा। अगर वे मिलकर मीडिया ब्रांड के लिए विश्वसनीय रेटिंग में निवेश करें तो? अगर स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अच्छा मीडिया जरूरी है तो सोशल मीडिया और टीवी पर हो रही गड़बड़ी का मुकाबला ऐसे काम से क्यों नहीं किया जाए जो केवल अच्छे प्रशिक्षित पत्रकार ही कर सकते हैं? स्पॉटलाइट हमें यही प्रेरणा देती है।
             D.J.S.
Vaidambh Media
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