शर्म… शर्म… शर्म…!

  चार साल की मासूम के साथ बलात्कार, छः साल की बच्ची को कमरे में बंदकर युवक ने किया नंगा

गोरखपुर । महानगर गोरखपुर के समाचार पत्रों में एक सप्ताह के भीतर दो घटनायें सामने आयी। दोनों ही घटना स्कूल से जुड़ी हैं। शहर के जागरूक लोग, बुद्धिजीवी समाज सड़क पर उतर आया। अपराधी पकड़े जायेंगे,पुलिस का दावा है। अखबार और चैनल के लिए ये सनीसनीखेज हो सकता है पर समाज के लिए बस शर्म…शर्म… शर्म..!
प्रश्न उठता है कि समाज में ये हैवानियत कहां से आ रही है? हमारे-आपके घरों में क्या पुत्र व पुत्री के बीच समानता का भाव रखा जा रहा है। परिवार में लिंग भेद जैसी कोई समस्या तो नहीं है। इन बातों को हम परे रखकर चलेंगे तो ऐसे हैवान हमारे आपके बीच पलते-बढ़ते रहेंगे। कबूतर के तरह बिल्ली देखकर आंख मूंदने वाले सभ्य समाज को अगल-बगल सजग निगाह दौड़नी पड़ेगी। समूह में किसी घटना के प्रति रोष दर्ज कराने के लिए सच्चे मन से आइएं और अंत तक डटे रहिए, कोरम से अब काम नहीं चलेगा। प्रशासन अपना काम करेगा, अपराधी को सजा मिलेगी लेकिन समाज में हैवानियत के जहरीले छत्ते जब तक नहीं ढूंढे जायंेगे। इस तरह के अपराध बढ़ेगे। सोचनीय है कि जिसने घटना को अंजाम दिया उसकी जांच में कोई कोताही नहीं होनी चाहिए, मसलन उम्र क्या है, घटना क्यों हुयी, आगे इसकी पुनरावृत्ति जैसी कोई बात तो नहीं, घटना अंजाम देने वाले किस समूह, कैसे परिवार से तालुक रखता है इसकी पूरी शिनाख्त होनी चाहिए। ऐसे अपराधियों की मानसिक जांच-रिपोर्ट समाज तथा स्कूल में शिलापट्ट पर दर्ज कराया जाना चाहिए। मासूम बच्चों को जिन्होंने जीवन वाटिका मंे अभी पहला कदम ही रखा है कि उन्हें शिकार बनाने वाले मस्तिष्क में जो भी बातें हैं उनका परीक्षण कुशल मनोचिकित्सकों से कराया जाना चाहिए। ऐसे लोग कैसे चिन्हित किये जा सकते हैं, समाज तथा खासकर स्कूलों में अध्यापकों को जरूर प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। मासूम बच्चों के साथ दरिन्दगी के मामले में अपनी नैतिक जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए शासन-प्रशासन पर निष्पक्षता दिखाने तक पूर्ण दबाव बनाये रखना चाहिए। साथ ही साथ न्यायिक प्रक्रिया में भी सामूहिक रूप से पैरवी में लगे रहने से घटना की न्यायिक प्रक्रिया तीव्र होगी क्योंकि समाज को भूलने की बीमारी है, यह भूल जाने वाली समस्या ही है,जिसने हमें अब तक जागरूक बनने से रोक रखा है।

 क्या होता है घटना के बाद ? 

मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि जिस मासूम के साथ ऐसी घटना हो जाती है उसे लम्बी उम्र तक सदमा तथा अन्य समस्याओं से गुजरना पड़ता है। दीदउ विवि गोरखपुर के मनोवैज्ञानिक डा. धनंजय का कहना है कि ऐसी घटना मासूम का बचपन छीन लेती है इसे मासूमियत का कत्ल कह सकते हैं। इन घटनाओं से कभी-कभी तो व्यक्तित्व ही परिवर्तित हो जाता है। ऐसी बच्चियों में प्रोस्टट्राउमेटिक स्ट्रेस सिन्ड्रोम हो जाता है। एंजाएटी व डिप्रेशन सदैव के लिए घर कर जाता है। आगे वैवाहिक जीवन भी अच्छा नहीं रहता। काउंसलर मानते हैं कि बच्चा सदैव अपराध बोध से ग्रस्त हो जाता है उसके मन में हमेशा सवाल बना रहता है कि उसे ऐसी सजा क्यो दी गयी। मुझे किसी गलती की सजा दी गयी है। ऐसे में वह अपने हर काम को बड़े संशय में करता है। मासूमों के मन में उठते सवालों के जवाब क्या आपके पास हैं! नहीं तो जागरूक बनिए, आवाज उठाइएं।

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