शांति के लिए लड़ना ही पडे़गा निर्णायक युद्ध

आज सभी मौन हैं। स्तब्ध, एकटक सामने नजर मुंह से बोल नहीं फूट रहे लेकिन आंख से बहते आंसू झरने का रूप धारण कर चुके हैं। ऐसा इसलिए नहीं कि पड़ोस के मुल्क में एक आतंकी घटना हुयी, बल्कि इसलिए कि आर्मी स्कूल आफ पेशावर में हमारा बच्चा रहा होता तो…….।
अमेरिका, रूस, जापान जैसी महाशक्तियां या फिलीपींस, पाकिस्तान, नेपाल सरीखे छोटे राष्ट्र सबको आतंकवाद ने तबाह व बर्वाद करने का निरन्तर प्रयास किया है। आतंकी अपने को विचारधारा वाला बताते हैं, क्या विचार जानवरों के पास नहीं है? यदि उनके पास विचार नहीं हैं तो वो हमसे बेहतर हैं। ऐसे विचार जहां मासूमों का कत्ल नहीं बल्कि हंसते-खेलते अठखेलिया करते मासूमो का वीभत्स स्वरूप निर्मित करना और उस पर इतराना यह किसी भी जीव मात्र की विचारधारा नहीं हो सकती। यह तो महज हैवानियत और शायद उससे भी कहीं आगे। विश्व की बढ़ती रफ्तार रोकने के लिए यह स्वयं से चिढे आतंकी किसी न किसी रुप में हमारे व आपके इर्द-गिर्द रूकावट का वीभत्स स्वरूप पेश करते हैं। 24 घण्टे पूर्व सिड़नी में घटना को अंजाम देने के बाद पाकिस्तान में मासूमों का कत्लेआम और इन्हें इससे रोक पाने वाला कोई नहीं क्यो? सभी तो शान्ति स्थापित करने की बात करते हैं फिर अमेरिका, रूस, चीन, जापान जैसी महाशक्तियों को ये आतंकी कैसे हिला दे रहे हैं। इस बात के लिए सम्पूर्ण विश्व को बैठकर एक झण्डे के नीचे एक विचारधारा का होकर सोचना होगा और शान्ति के लिए अब निर्णायक युद्ध अवश्यंभावी हो चुका है।

पाकिस्तान के पेशावर में तालिबान आतंकियों ने चुन-चुन कर निशाना बनाया। मीडिया खबरो में 1100 बच्चों में से 148 को मृत बताया गया। शिक्षा के मन्दिर, किलकारी भरती बच्चों की दुनिया में इन राक्षसों का प्रवेश किस कमजोरी के कारण हो जाता है इसे विश्व पटल पर एकसाथ समझना होगा। आतंकवाद, अराजकता अगर विचारधारा है तो इन विचाराधारों के संचालक क्या है? कहां है? क्यों हैं? कहीं हमारी छोटी-छोटी लोभलोलुपता के आस्तीन में ये सुरक्षित पल-बढ़ तो नहीं रहे! डिस्कवरी चैनल पर हमने देखा कि एक शेरनी, हिरनों के झुण्ड से बिछुड़ गये अभी-अभी पैदा हुए मासूम बच्चे को भूख के बावजूद दुलार रही थी। उसे भी उस मासूम को मारना न्यायिक नहीं लगा, जबकि प्रकृति ने उसे ये अधिकार व नैतिकता दोनों प्रदान की है। हंसी के साथ रोष और इन सबके साथ असहाय, यहीं हमारे समाज का स्वरूप है। हम आज सब मिलकर मासूमों के शिकारियों के घृणित व वीभत्स कृत्य पर आंसू बहा सकते हैं, लेकिन यह संकल्प और उसका प्रतिपादन नहीं कर पा रहे कि अब बस! नहीं मरेंगे मासूम और नहीं बहेगा खून। धरती पर कहीं भी आतंकवाद या उससे जुड़ा जड़, मूल है तो उसे हम सभी मिलकर नष्ट कर देंगे। हम मानव है हमारी कुछ आकांक्षाएं हैं पर वह इतनी अधिक हैं कि ऐसी सैकड़े घटनाएं सह सकती हैं, क्योंकि हमें तेल के कुएं का लोभ है। हमें प्रकृतिक सम्पदा का लोभ है। हमें धरती का पता नहीं चांद व मंगल का लोभ है। कैसे होगी मासूमों की रक्षा। हमें तो इस दुःखद व वीभत्स स्वरूप में भी किसी हैवान रुपी जगमठाधीश का चेहरा धुधंला-धुधला सा आ-जा रहा है। शेरनी व हिरन के बच्चे वाली घटना ऐसे हैवानों के ऊपर थूकती दिखाई देती है।
आज समूचा विश्व मासूम बच्चों के क्षत-विक्षत् शव व परिजनों की चीत्कार से सन्न खड़ा है। मासूम किसी के दुश्मन कैसे हो सकते हैं? क्या विश्व राजनीति इतनी घिनौनी व वीभत्स हो गयी है, या स्थानीय राजनीति इतनी अस्तित्वविहीन हो चुकी है कि इनके बीच मासूम, अबोध पिसे जा रहे हैं। क्यों तालिबान अब तक पाकिस्तान में सफर कर रहा है। एक पड़ोसी दूसरे पड़ोसी के दुश्मन को जब तक पनाह देता रहेगा, ऐसे कृत्य को रोक पाना कठिन ही रहेगा। मासूमों की मौत पर यदि वास्तव में विश्व को दुःख और स्तब्धता है तो संकल्प यहीं लेना चाहिए कि अब एक युद्ध होगा वह भी निर्णायक।

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