सरकार की निगेहबानी से दूर , रेलवे प्लेटफार्म पर भटकते एक करोड़ 20 लाख मासूम !

बाजारु हो चुके समाज में लग रही मासूम की कीमत !

Gorakhpur :  युवा भारत में बच्चों की संख्या इतनी है कि अब उनकी भी आवाज प्राथमिकता पर  सुनी जाय। कानून जो बने उसका पालन करने में बचपना नही दिखे । यदि समाज अभी पूरी तरह जागरुक नही हो पा रहा तो भी प्रशासनिक अमले को अपना काम पूरी निष्ठा के साथ करना होगा। बच्चों के मामले में सबसे अधिक निराशा प्रशासन की बचकानी हरकतों के कारण समाज में देखने को मिलती रही है। बच्चा अपने घर से लेकर स्कूल, खेल के मैदान, समाज मे भागीदारी जैसे स्थानों पर अभिब्यक्ति का प्रयास करता है पर हम बड़े लोग उसे चुप कराकर अपना बडप्पन कायम रखने में गर्व अनुभव करते हैं। आज  के बाजारु समाज में जहा हर चीज की कीमत और खरीददार मौजूद हैं वहा बच्चों को नहीं समझने की गलती करना सबसे बड़ा पाप है। बच्चों के लिये चाहे वह अपना हो या दूसरे का प्रत्येक ब्यक्ति को अपनेपन का भाव रखते हुए उसके अधिकार व संरक्षण का पूरा -पूरा ख्याल रखा जाना चाहिय ; अन्यथा आने वाले  समय में अवारा  भटकते बच्चों की संख्या में हो रही अपार बृद्धि इस विश्व के लिये घातक सिद्ध हो सकती है।

 

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सरकार की सभी सुविधाओं से महरुम हैं भारत के रेलवे प्लेटफार्म पर गुजर करने वाले बच्चे !
पुर्व लोक सभा अध्यक्ष सोमनााथ चटर्जी के मुताबिक वर्ष 2005 में भारत में बच्चो की संख्या 41.4 करोड़ से अधिक थी वर्तमान में यह संख्या देश की कुल आबादी की 39 प्रतिशत है। चाइल्ड लाइन इण्डिया फाउंण्डेशन की रिर्पोट कहती है कि भारत में 47करोड़ 20 लाख बच्चे हैं। इनमें आदिवाासी , दलित से लेकर समाज के कुलीन घरों के बच्चे है। विश्व की हर संस्कृति में बच्चे सबके दुलारे होते हैं इसलिये हमें इस दुनियां को बच्चों के लायक बनाना होगा। बच्चों के मामले में हमे वैश्विक बनना होगा । आइये अब समझने की कोशिश करते हैं कि ऐसा क्यों है ?   न्यूज एजेंसी राॅयटर की रिर्पोट बताती है कि भारत मे प्रतिवर्ष 1लाख 20 हजार बच्चे किसी न किसी माध्यम से रेलवे स्टेशन पर पहुॅच जाते है।  रेलवे चिल्ड्रेन यूके की बेबसाइट बताती है कि इनमें से लगभग 12हजार बच्चे प्रतिवर्ष  रेलवे स्टेशन के विभन्न स्थानों का इस्तेमाल अपने रहने के लिये करते हैं। यह ब्यवस्था उनकी अपनी खुद की कब्जेदारी से प्राप्त होती है। उसमें तमाम सरकारी लोगों को ये बच्चे अलग- अलग तरीके से प्रशन्न करके  अपना काम चलाते हैं। सरकार की नजर में इन बच्चों का कोई मोल नहीं है। ये बात इस तरह साबित हो जाती है जब कोई स्टेशन पर रह रहे बच्चों के आंकड़े सरकार से जानना चाहता है तो सरकार साफ मना कर देती है कि  यहाॅ कोई स्थायी निवास नहीं करता । रेलवे प्लेटफार्म सिर्फ आने-जाने वाले  यात्रियो के लिये है, वहाॅ कोई बच्चा नही रहता । जबकि   भारत का रेलवे दुनियाॅ का चैथा सबसे बड़ा संस्थान है जिसमें 13 लाख 76 हजार से अधिक लोग काम कर रहे हैं। इतने ही लोगों को इसके सहारे रोजगार प्राप्त है। देश में 8000-8500 के लगभग  छोटे-बड़े मिलाकर रेलवे स्टेशन हैं। अकेले गोरखपुर जंक्शन पर 10 प्लेटफार्म हैं तो अन्य स्टेशनों पर उपलब्ध स्थानों के बारे में  अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं। गोरखपुर, पुर्वोत्तर रेलवे का मुख्यालय होने के अलांवां विश्व का सबसे लम्बा प्लेटफार्म (दूरी 1366,33मी0) होने के कारण आकर्षण का केन्द्र हैं। यहाॅ से 214 ट्रेनें प्रतिदिन गुजरती हैं तथा 2लाख 70हजार यात्री रोज अपने गंतब्य को आते -जाते हैं। इन यात्रियों की भींड़ में मासूम भले ही नही दिख पाते पर उनकी भी संख्या महत्वपूर्ण रहती है। यहीं -कहीं वह अपने परिजनों से विलग हो  जाते हैं या भटक जाते हैं , फिर इसी समाज की  समाजिक- असमाजिक तत्वों की जरुरते  उन्हे अपने मुताबिक तैयार करने में जुट जातीं हैं। कमोबेश यही हाल देश के अन्य  प्लेटफार्मों का है क्योंकि बच्चे जिम्मेदार प्रशासनिक तबकें में प्रथमिकता पर नही रख् जाते। ब्यवहारिक रुप से बच्चों के साथ हो रहे अत्याचार को  सरकार मे तैनात जिम्मेदार लोग  गुनाह मानने से हिचकते हैं। वहाॅ इन्हे कई बार समझौता करते देखा गया है। जो बच्चों पर अत्याचार को बल दे रहा है।

माता-पिता के रुखे ब्यवहार, महत्वाकांक्षा , बहकावे में आकर घ्रर से भाग रहे मासूम  !
एक तरफ जहाॅ गोरखपुर का भैगोलिक क्षेत्र रेलवे को समूचे देश से जोड़ता है वहीं पश्चिम बंगाल व असम बिहार से न केवल रिॅफ्यूजी बल्कि नेपाल के रास्ते अंतराष्ट्रीय मानव तस्कर भी सक्रीय होते पाये गये हैं। गोरखपुर में  सेफ सोसाइटी द्वारा बच्चो पर  प्रस्तुत आंकड़े ये बताने के लिये पर्याप्त हैं कि  बच्चों के साथ हो रहे अपराध में गोरखपंर परिक्षेत्र वैश्विक आंकड़ों के साथ साथ चल रहा है। सेफ के कार्यक्रम समन्वयक बृजेश चतुर्वेदी के मुताबिक, सितम्बर 2016 तक लगभग एक वर्ष के कार्यकाल में संस्था ने रेलवे स्टेशन गोरखपुर के प्लेटॅफार्म से 330 बच्चों को उनके घर वापस भेजने में सफलता पायी। ये बच्चे अलग-अलग कारणों से परिवार से भाग कर स्टेशन पर आये थे। इनके घर छोड़ने के कारणों में पहले नम्बर पर था माता-पिता का  अपने परिवार व बच्चों से रुखा ब्यवहार । ऐसे बच्चे गोरखपुर परिक्षेत्र के हैं जो माॅ बाप के इस ब्यवहार का विरोध करते हैं। दूसरे स्थान पर वे बच्चे हैं जों गलत हाथों में या तो फॅस गये या उन्हे किसी अपने ने दूसरे के  हाथ बेंच दिया। अर्थात ट्रैफिकिंग के माध्यम से बच्चे समाज के बजार में उतारे जा रहे है। ये अपराध भी 52 की संख्या में गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर संज्ञान में आया । रोजगार की तलाश में निकलने वाले नाबालिग भी 39 की संख्या में मिले। भूले-बिसरे की संख्या 38 थी तो अपना कान्फीडेण्स परखने के चक्कर में अकेले घर से निकलकर सफर करने वाले नाबालिग बच्चे भी 35 की संख्या में मिले। शहरीकरण जो गांवो को संसाधन से अलग करके देखने का हेय नजरिया भी बच्चों को प्रभावित करता है। बच्चों की महत्वकांक्षा व रुढि के बीच का संघर्ष भी बच्चो के घर से भागनें  का बड़ा कारण है। इसमें 19 बालिकायें घर से भागकर स्टेशन तक पहुॅची और सरकार की ब्यवस्था के अनुरुप अपने घर पुनः वापस पहुॅचा दी गईं। इस मामले का सेफटीम ने काफी गहराई से अध्ययन किया। बच्चो और परिवार की परिस्थति का अंदाजा मिलने पर सामाजिक दोषों का अम्बार लग जाता है। वही हाल प्रशासनिक जिम्मेदारों का भी है शायद ऐसा इसलिये है क्योंकि ये भी उसी समाज से आते हैं। सामाजिक बदलाव के लिये प्रशासन व जागरुक  लोगों को साथ लेकर काम करना होगा तब हो सकता है कि बच्चों की ओर से लापरवाह  हो चुका समाज व सरकार इसे प्राथमिकता देने लगे।

बच्चों के विकास में हम जहां थे वही खड़ें हैं ;   क्यो  ? 
मता -पिता बच्चों के संरक्षण की केन्दी्य भूमिका में होते  हैं । यहीं से बच्चेा में ंिहंसा, दुरुपयोग, भेद-भाव ,शोषण का स्रोत भी मिलता है। ऐसे में जब हम बच्चो का दोष देने की कोशिश करते हैं तो स्वयं के सामने भी एक आइना रखने की जरुरत है। जरा सोचिये समाज व सरकार की निगाह में रहते हुए भी समाजहित की सेवाओं शर्तों  से दूर 1करोड़ 20 लाख बच्चों की अलग एक अपनी दुनियां है जिसे उन्होने अपने दम पर पाया है। इन बच्चों को साधारण समझने की जो लोग भूल कर रहे होंगे उन्हे सावधान हो जाना चाहिये क्योंकि इन्हे कोई भी अपने लिये इस्तेमाल कर सकता है और ये मजबूत इरादों वाले बच्चे अपने कदम बढ़ाने के बाद पीछे खींचने वाले नहीं दिखते। दुनिया का भविष्य इन बच्चों के साथ जुड़ा है जरुरत है उसे संवांरने की। परिवार व समाज से अलग होने के इनके तमाम भिन्न-भिन्न कारण हो सकते हैं पर क्या ये देश के नागरिक हैं ? शायद नहीं क्योकि सरकार इनका कोई रिकार्ड नहीं रखती । यह आज की कहानी नही हैं हमने बच्चों के साथ सरकार व समाज के ब्यवहार को एक जैसा ही पाया है। बारहवीं कक्षा में अंग्रेजी में पढ़ाये गये पाठ “ए गर्ल विद् द् बास्केट” के भारत को  आज भी उसी स्थान पर देखा जा सकता है जहाॅ बच्चों व रेलवे स्टेशन की ब्यथा को अब तक बीते 6 दशक में भी नहीं बदला जा सका । एक अमेरिकी जज ए जी गॅारडेनर जो लेखक हैं भारत के आजाद होने के बाद आज से करीब 6 दशक पूर्व भारत आये थे ,उस समय भारत के रेलवे प्लेटफार्म पर एक 12 साल की बच्ची फूल बेंचती देखी थी और उसकी इमानदारी से प्रभावित हो गारडेनर ने लेख लिखा था जो हमें किशोरावस्था में पढ़ाया जाता रहा है । यह विकासवाद का नारा बुलंद करने वालो के मुह पर करारा तमाचा है। समाज में भी बच्चे प्राथमिकता पर नही आ पा रहे। उनकी अभिब्यक्ति दबाने की परम्परागत धारणा उनके अपने घरों में देखी जा सकती है।

अपना मत तय करने में ,  सक्षम बच्चों को अपने जीवन को प्रभावित करने वाले सभी निर्णयों में , अपना मत खुलकर ब्यक्त करने का अधिकार  होना चाहिये ।
जिस तरह गोरखपुर जैसे छोटे शहर में  सिमित संसाधनों के साथ सेफ सोसाइटी द्वारा मात्र रेलवे स्टेशन के 1.5 किमी के परिक्षेत्र में एक वर्ष में 330 बच्चों को घर से भागने का रिकार्ड दर्ज किया है। यह आंकड़े बहुत चैंकाने वाले हैं। ये आंकड़े वैश्विक विश्वस्त आंकड़ों से बिल्कुल फिट बैठते हैं । ऐसे में जन प्रतिनिधियों, समाज के जागरुक वर्ग ,ग्राम पंचायतें, प्रशासनिक अमला, सभी  एक साथ जुड़ कर बच्चों के लिये प्रभावी कदम उठाये इसकी प्रबल अवश्यकता है।

Vaidambh Media

 DHANANJAY  SHUKLA

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