सरकार को पत्रकार की हत्या का इंतजार क्यों करना पड़ा ?

कारपोरेट चंगुल में फंसी मिडीया पर लोग विश्वास करना छोड़ देंगे !

शहीद-ए-बिस्मिल  (आज 108 वां जन्मदिवस) की धरती पर फिर एक आन्दोलनकारी शहीद हुआ….
                                                  सावधान !

हर बार कुचल दी जायेगी, जुल्म की सरकार!
  नही पड़ेगी कम कभी ,  गर्म लहू  की धार!!

jagendra-singh-journalistLucknow: शाहजहाॅपुर में पत्रकार जोगेन्द्र सिह, कलम को तोप के मुकाबिल कर दुनियां से विदा हो गये। भ्रष्ट व अराजक ब्यवस्था से लैश आतातायी -सहयोगी सेना से अकेला लड़ता हुआ देश का एक बेटा देश की सीमा के भीतर देशद्रोही दीमकों के सम्मलित प्रहार से टूट गया। पत्रकारों पर उंगली उठाने वालों अब मत कहना कि सब भ्रष्ट हैं। हमें कलम चलाने की सजा मिली है। दुःखियो का सहारा बनने की सजा मिली है। किसी मंत्री से एक आम इंसान की क्या दुश्मनी हो सकती है ! कारपोरेट चंगुल में फंसी मिडीया को आज आॅख खेलकर देखना व समझ लेना चाहिए कि पत्रकारों को अपना नौकर नही, समाजसेवक बना रहने दे वरना उनकी प्रेस की दुकान में जल्दी ताला लग जायेगा। लोग विश्वास करना छोड़ देंगे कि जो ये कारपारेट राइटर कह रहे हैं वह सही है या नहीं!

 सरकारी तंत्र लघु अखबार के खबर की शायद ही  निगरानी करता हो!newspaper

मीडिया की विश्वसनीयता कम करने में स्वएं को बड़े दर्जे में रखने वाले कारपोरेट घराने हैं। इन्होने तो वो सब किया जो ब्यूरोक्रेसी में होता है। मीडिया जो आपस में ज्ञान को बराबर बाॅटकर सही छांनबीन कर सम्मिलित प्रयास से अखबार प्रकाशित करता था अब सम्पादक को मैनेजर बना दिया। खबर प्रायोजित की जाती है। मक्खन- पालिस का दौर चल पड़ा। और आज जो मीडिया है वह वास्तव में कारपोरेट को उंगली पकड़ाकर लोंगों के घरों में किचन तक पहुॅचाने का सबसे सरल माध्यम है। यहाॅ से बजारवादी अपने अभिनव प्रयोग से समाज को दिमागी रुप से सम्मोहित करने का काम कर रहे हैं। ऐसे में खुद मीडिया को भी फुर्सत नही मिल पा रही कि एक भ्रष्ट मंत्री को नंगा कर सके। गौर करें तो सरकार करपोरेट चम्मच बन चुकी है यदि ऐसा नहीं है तो किसी पत्र पत्रिका की खबरों का संज्ञान इतना देर से क्यों लिया जाता है जब लिखने वाले को रास्ते से हटा दिया गया। सरकार इस घटना में सीधे जिम्मेदार है। सरकार के पास सूचना प्रसार व संग्रह के लिये  विभाग है जिसे यह दायित्व सौंपा गया है कि वह समाचार पत्रों में छपी खबरों पर गौर कर उसे जिले के अधिकारी को बताये। मीडिया करपोरेट कल्चर ने यहां भी खुद को श्रेष्ठ बताते हुए बाकीयों को तवज्जो नहीं देने का प्रभाव बना लिया है। लिहाजा लघु अखबार की शायद ही कोई निगरानी करता हो। नतीजा आपके सामने है।

           मंत्री जी दूध के धुले हैं तो त्यागपत्र देकर न्याय का साथ दें!

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शहीद पत्रकार जोगेन्द्र सिंह जब तक मर नहीं गये उसके पूर्व क्या जिलाधिकारी या सूचना विभाग ने उन्हें कोई नोटिस उनकी पत्रकारिता से जुड़ा हुआ दिया। यदि नहीे ! तो सरकार भी अप्रत्यक्ष किन्तु स्पष्ट उनके हत्या की जिम्मेदार है। उसे अपने सिस्टम को समझाना होगा और शहीद पत्रकार के परिवार के साथ सहानुभूति दिखाते हुए न्याययिक जाॅच करानी चाहिए और भ्रष्ट मंत्री को तत्काल पदच्युत करना चाहिए। यदि मंत्री जी दूध के धुले हैं तो उन्हें त्यागपत्र देकर न्याय का साथ देकर अपनी राजनीति को और ख्याति दिलानीं चाहिए।

जागेंद्र सिंह को जिंदा जला कर मार डालने की घटना उठाती है तीखे सवाल

jagender-singh-journalistजिस दौर में मुख्यधारा मीडिया के एक हिस्से पर ऐसे आरोप सामने आ रहे हैं कि वह प्रभावशाली लोगों या वर्गों के हित में काम करता या किन्हीं दबाव की वजह से उनकी कारगुजारियों को सामने लाने में हिचकता है, उसमें जागेंद्र सिंह को जिंदा जला कर मार डालने की घटना तीखे सवाल उठाती है।

जल्द ही कुछ गलत घटने वाला है …!

facebook-post-jagendra-singhकई पत्र-पत्रिकाओं में काम कर चुके जागेंद्र सिंह का कसूर इतना था कि उन्होंने एक कद्दावर नेता की आपराधिक गतिविधियों का खुलासा सोशल मीडिया के जरिए किया। इसकी प्रतिक्रिया में उन पर कई फर्जी मुकदमे थोप दिए गए, तरह-तरह से प्रताड़ित किया गया। खबरों के मुताबिक उन पर दबाव बनाने उनके घर गए पुलिसकर्मियों ने पहले उनके साथ मारपीट की, फिर पेट्रोल डाल कर जिंदा जला दिया। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के पिछड़ा वर्ग कल्याण राज्यमंत्री राममूर्ति सिंह वर्मा पर अवैध खनन, जमीन पर कब्जा करने और बलात्कार जैसेकई आरोप हैं। जागेंद्र सिंह ने इन मामलों में मंत्री की भूमिका और इसका सबूत होने की बात अपने ब्लॉग और फेसबुक पन्ने पर लिखी थी। इसके अलावा, वे सामूहिक बलात्कार की शिकार एक महिला की मदद कर रहे थे, जिसके आरोपी मंत्री सहित चार अन्य लोग हैं। अब जागेंद्र सिंह की मौत का मामला तूल पकड़ने के बाद राज्य के मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह ने दोषी मंत्री के खिलाफ कार्रवाई करने की बात कही है। लेकिन इस फैसले तक पहुंचने के लिए उन्हें एक पत्रकार की हत्या का इंतजार क्यों करना पड़ा?

क्या भारत भी पत्रकारिता पर जोखिम की दिशा में  कदम बढ़ा रहा है?

attack on reporter    यह छिपी बात नहीं है कि दबंगों और अपराधियों के खिलाफ जहां साधारण लोग मजबूरी में आवाज नहीं उठा पाते, वहीं दूसरी ओर मीडिया में आमतौर पर उनकी कारगुजारियां तब सामने आती हैं, जब किन्हीं वजहों से वे कठघरे में खड़े हो चुके होते हैं। हालांकि आज की पत्रकारिता में भी गिरावट देखी जा सकती है, हिम्मत और ईमानदारी के साथ पत्रकारिता करने वाले लोग कम हैं। पर आज सूचना क्रांति के दौर में जिन कुछ जरूरी खबरों को कई वजहों से मुख्यधारा मीडिया में जगह नहीं मिल पाती, वे सोशल मीडिया के जरिए तुरंत आम लोगों तक पहुंच जाती हैं। ऐसे में जागेंद्र सिंह ने अपने वैकल्पिक संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए एक मंत्री पर लगे आरोपों से संबंधित तथ्य उजागर किए। किसी से प्रभावित होने या धमकियों के सामने चुप्पी साध जाने के बजाय जागेंद्र सिंह ने जोखिम भरा रास्ता चुना। पर इस तरह उनकी मौत की घटना बताती है कि अब ईमानदारी से काम करने वाले पत्रकारों के लिए हालात किस कदर खतरनाक होते जा रहे हैं।journalist in pakistan

पिछले कुछ सालों के दौरान पाकिस्तान को पत्रकारों के लिए सबसे ज्यादा जोखिम भरे देश के रूप में जाना जाने लगा है। हाल के दिनों में इराक में आइएसआइएस ने भी कई पत्रकारों को सिर्फ इसलिए मौत के घाट उतार दिया कि वे ईमानदारी से अपना काम कर रहे थे। सवाल है कि एक मंत्री के भ्रष्ट कारनामों का खुलासा करने पर जिस तरह जागेंद्र सिंह की हत्या कर दी गई, क्या भारत भी पत्रकारिता पर जोखिम की उसी दिशा में अपने कदम बढ़ा रहा है? यह ध्यान रखने की जरूरत है कि एक पत्रकार अगर ईमानदारी से अपने पेशे का निर्वाह करता है तो एक तरह से वह समूचे समाज के हित में काम कर रहा होता है। इसलिए पत्रकारिता की ऐसी आवाजों पर हमला या उन्हें खामोश करने की कोशिश किसी एक व्यक्ति के नहीं, बल्कि इंसानियत, लोकतंत्र और मानवाधिकारों के खिलाफ है। अंत में कलम के वीर योद्धा, तुम्हारी कुर्बानी बेकार नहीं  जाने पायेगी !

इस विश्वास के साथ   जय हिंद!

                                                                           VaidambhMedia

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