सामान्य बायोपिक :धमाकेदार तरीके से एक खामोशी छोड़ती ‘अलीगढ़’

भावप्रधान फिल्मों की उत्कृष्ट श्रेणी !

Aligarh : किसी व्यक्ति के लैंगिक रुझान की सामाजिक अस्वीकार्यता से जुड़ी सच्ची कहानी हमेशा ही इस जोखिम से गुजरती है कि ऐसी फिल्में बॉलीवुड की फिल्मों से अलग होंगी मसलन उसमें अतिनाटकीयता होगी और घटनाक्रम को दर्शाने के लिए फूहड़ दृश्यों का इस्तेमाल ज्यादा होगा।manoj bajpai एक और संभावना हो सकती है कि ऐसे संवेदनशील विषय पर ‘अलीगढ़’ जैसी फिल्म सामने आ जाए।  निर्देशक हंसल मेहता के नायक प्रोफेसर श्रीनिवास रामचंद्र सिरास (मनोज वाजपेयी) बेहद अंतर्मुखी स्वभाव के व्यक्ति हैं और उनकी खामोशी ही काफी कुछ बयां करती है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में एकमात्र मराठी प्रोफेसर रहे प्रोफेसर सिरास को विश्वविद्यालय प्रबंधन ने वर्ष 2010 में निलंबित कर दिया था क्योंकि कुछ लोगों ने धोखे से उनका एक वीडियो बना लिया था जिसमें वह  विश्वविद्यालय परिसर के अपने घर में एक रिक्शाचालक के साथ सहमति से यौन संबंध बना रहे थे। कुछ महीने बाद उनका निलंबन खत्म कर दिया गया लेकिन वह कुछ दिन बाद ही अपने घर में मृत मिले।

चंद सेकंड में कई भाव दिखाते , मनोज वाजपेयी की बेहतरीन आदकारी !
वाजपेयी ने परिपूर्णता या कहें कि उससे इतर भी सिरास की भूमिका निभाई है। इस किरदार की खामोशी एक गलत समझे जाने वाले अधेड़ व्यक्ति की है जो आडंबरहीन है।manoj वाजपेयी ने इस भूमिका को इतनी बारीकी से निभाया है कि हरेक फ्रेम में वह उत्कृष्ट अदाकारी की मिसाल पेश करते हैं। उनके सफेद दाढ़ी वाले चेहरे पर चंद सेकंड में कई भाव दिख जाते हैं। साल के तौर पर उस हादसे के बाद प्रोफेसर को यूनिवर्सिटी के क्वॉर्टर के अपने सामान्य से कमरे में बैठे हुए दिखाए जाते हैं। उनके हाथों में एक ड्रिंक है और उनकी आंखें बंद हैं। वह लता मंगेशकर का क्लासिक गाना, ‘आपकी नजरों ने समझा’ सुन रहे हैं। उनका चेहरा थका हुआ, फिर उदास तो कभी चिंतनशील, कभी आंसू तो कभी बिल्कुल खाली सा नजर आता है। वह साथ-साथ गा भी रहे होते हैं और उनकी उंगलियां सभी भावनाओं के साथ थिरकती भी हैं। अधेड़ उम्र के प्रोफेसर की भूमिका निभा रहे वाजपेयी बड़े खूबसूरत तरीके से उस असहजता को भी दर्शाते हैं जब दोस्ताना भाव रखने वाला रिपोर्टर दीपू सेबेस्टियन (राजकुमार राव) उनके साथ एक सेल्फी लेता है जो उनकी कहानी पर बेहद करीब से नजर रख रहा था। राव का बेहतरीन अभिनय और उनका विशेष तरह का मलयाली लहजा इस फिल्म को और मजबूती देता है। हालांकि सिरास के वकील बने आशिष विद्यार्थी कुछ खास नहीं कर पाए।
 तीन शब्दों में अपनी भावनाओं को व्यक्त करना उनके लिए मुश्किल !
Aligarhइस फिल्म में भले ही कई परतें और विवाद जुड़े हों लेकिन इसकी पटकथा बेहद सरल है। कुछ दृश्य तो ऐसे बन पड़े हैं जो दर्शकों के दिमाग में लंबे समय तक घूमते रहेंगे, मसलन एक रात जब अलीगढ़ की धुंध भरी सड़कों पर सिरास रिक्शे की सवारी करते हैं, वह सेल्फी वाला क्षण जिसे वह सेबेस्टियन के साथ साझा करते हैं जब वह दोनों एक नाव की सवारी का लुत्फ उठा रहे होते हैं और सेबेस्टियन के कहने पर कि वह खुद के बारे में बताएं तब सिरास की ‘गे’ शब्द का इस्तेमाल करने में दिख रही उलझन। वह जब कहते हैं कि तीन शब्दों में अपनी भावनाओं को व्यक्त करना उनके लिए मुश्किल है तब यह फिल्म अपने उद्देश्य को हासिल करती हुई सी दिखती है।
 परिपक्वता की ओर बढ़ता नजर आता है बॉलीवुड !
Aligarh-759

Manoj Bajpayee Hansal Mehta and Rajkummar Rao

अलीगढ़ ऐसी फिल्म नहीं है कि जिसे देख कर आप आंसू बहाएं और न ही यह फिल्म आपको हैरान करती या खौफ जगाती है। यह फिल्म लैंगिगता के विचारों से जुड़े विवादों से घिरी जरूर है लेकिन यह लैंगिक स्वतंत्रता की मांग कर रहे लोगों के अधिकारों की वकालत भी करती हुई प्रतीत नहीं होती। यह एक सामान्य बायोपिक है जो धमाकेदार तरीके से एक खामोशी छोड़ जाती है। यह अपने आप में इतनी परिपूर्ण है कि इसे किसी भी बैसाखी की जरूरत नहीं। अलीगढ़ फिल्म के साथ निश्चित तौर पर बॉलीवुड परिपक्वता की ओर बढ़ता नजर आता है।(B.S.)

शिवम सैनी
Vaidambh Media
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