सिद्धांत ..!, राष्ट्रवाद ..! विकास व रोजगार कहा है ?

आलोचनाओं से बचने में उर्जा ब्यर्थ करते नेता !

 New Delhi : एक ओर जहा कुर्सी पर बैठने से पहले , सत्ता से दूर रहे नेता इमानदारी , आत्म सम्मान व राष्ट्रवाद का नारा लगाते नही अघाते थे ;nitish kumar kejri सत्ता मिलते ही अपनी विवषताये गिनाने लगे । जो लोग जादा बोल गये उन्होने जुमला कह कर पिण्ड छुड़ाने की कोशिश की । सस्ती लोकप्रियता का ओछापन राजनीति का धर्म बन गया। कानून का पालन सख्ती से करने के बजाय कानून पालक पार्टीयों का मुॅह निहार रहे है। यहाॅ तक पठन-पाठन भी फाॅसीवादी व सेक्यूलर में बॅट गया है। यह किसकी कृपा है ? आज देश की राजधानी ‘दिल्ली ‘प्रदेश में अरविन्द केजरीवाल मुख्यमंत्री हैं । केन्द्र में स्व इमानदार मोदी हैं ! उत्तर प्रदेश व बिहार में समाजवादी अखिलेश यादव व नितिश कुमार है। जमीनी नेता ममता को दीदी कहकर पश्चिम बंगाल का सत्ता दिया। काॅग्रेस का जिक्र भी ठीक है उसके भी कुछ प्रदेश में सरकार है । जो बदलाव की बात कर सत्ता में पहुॅचे उनसे तो सवाल बनता है ना ! आज देश में जो माहौल बना हुआ है उससे गये गुजरे देष भी हम पर हॅस रहे हैं। कौन है इसका जिम्मेदार? क्या आारोप प्रत्यारोप कर देने से देश के धवल वस्त्र पर लगते काले धब्बे छूट जायेंगे ! कोई आगे बढ़ कर गलती स्वीकार करने वाला नही रहा इस देश में ! सत्ता के सभी भूख्खड़ गम्भीर मसलों में भी स्वार्थ की सुगंध पर ही मॅुह खोलते हैं क्यो ?

 अहम है  ‘कुछ भी करो पर जीतो’
आज हमारा देश जो विविधता का संगम कहा जाता है कबिलाई संस्कृति का गुलाम होता जा रहा है । नवरात्रि के पर्व पर गरबा के ढोल व मोहर्रम के ताशे एक साथ बज रहे हैं , पर लोग एक दूसरे को शंका भरी नजर से देख रहे हैं। राजनीति क्या सच से डरने का नाम है । अगर नही तो नीति सिद्धांत की बात करने वाले ‘ कुछ भी करो पर जीतो ‘ का सूत्र क्यों अपना लेते हैं । देश की कोई भी राजनीतिक पार्टी इस सूत्र के बिना नही चलती । कुछ दिनों से भारत एक सेक्यूलर कबीला बन गया है , कहे तो गलत नहीं होगा । भारतीय युवा आज कहॅा जांय, किस पर करे विश्वास ! उसने तो अपने पसंद की सरकार चुनी पर वह भी परम्परागत ही सब कुछ कर रही हैं । युवा इंजीनियर समाजहित के प्रति जुझारु नेता अखिलेश व नीतिश कुमार को बहुमत दिया ।narendra-modi-painted- बदलाव की उम्मीद के अनोखे सितारे अरविन्द केजरीवाल को दुबारा बहुमत का रिकार्ड तोड़ समर्थन दिया। हर कठिन सवाल का हल बताने वाले नरेन्द्र दामोदर दास मोदी को जादुई सहयोग कर केन्द्र में स्थापित किया।
दादरी में एखलाक की हत्या , बरेली के फरीदपुर में दरोगा मानेज मिएकश्रा की हत्या, साहित्यकारों का विरोध, बच्चा पैदा करने की सलाह , घर वापसी, बीफ का मुद्दा ये सब एक साथ क्यों ; जबकि बीते अगस्त माह में सेना के जवान वेदमित्र चैधरी की हत्या मेरठ के पास हरदेव नगर में भीड़ ने पीट-पीट कर करदी। आगे बढ़े तो मांर्च में बिहार के हाजीपुर में मुस्लिम लड़की से शादी करने पर एक हिन्दू लडके की हत्या, जून में आन्ध्र प्रदेश के इलरु में भीड़ द्वारा एक ब्यक्ति को मार डाला गया,  जून में मुम्बई पश्चिम भाण्डूप इलाके में भीड़ ने ही एक ब्यक्ति को मार डाला ये सब संयोग तो नही हो सकता । कानून कहाॅ है ? भीड़  फैसला क्यों ले रही है ?  या  उसे बताया जा रहा है कि यही राश्ता सही है ।  जाहिर है राजनीति ही है मुद्दा वीहीन, दरिद्र दशा में ,  खुद पर तरश खाती …  ?

सेक्यूलर का इस्लाम के साथ ये कैसा रिश्ता !
पाकिस्तानी गायक गुलाम अली का देश में एक जगह विरोध हो रहा है तो दूसरे उनका सम्मान कर किस तरह का राजधर्म निभा , रहे है । देश के मुम्बई में विरोध हुआ तो दिल्ली और उत्तर प्रदेश पाक गायक का कार्यक्रम कराने की चेष्ठा क्यो करते हैं ? इससे किसे फायदा पहुॅच रहा है । राजनीति ने सेक्यूलर का इस्लाम के साथ ये कैसा रिश्ता जोड़ रखा है ! अरविन्द केजरीवाल , अखिलेश यादव तथा ममता बनर्जी जैसे युवा मुख्यमंत्रियों के लिये क्या इस्लाम के बिना सेक्यूलर हो पाना सम्भव नही ?

पर उपदेश कुशल बहुतेरे !
ये शेखचिल्लि विद्वान सीएम कहते है संगीत की अंतर्राष्ट्रीय सीमा नही होती ! ममता बनर्जी ने क्या इस कथन का सम्मान किया। बंग्लादेश की महिला प्रधान बिषयों की लेखिका तसलिमा नसरीन की आवभगत कर सकीं, नही तो क्यों ? यह प्रेम पाकिस्तानी गायक के प्रति ही क्यों ? mamta kejariwalआस्कर विजेता एआर रहमान को दिल्ली या यूपी की सरकार ने आमंत्रण व सम्मान क्यों नही दिया। क्या सेक्यूलर कुछ लोगों के हाथ गिरवी हो गया कि 13 दिसम्बर को एआर रहमान का संगीत कार्यक्रम सिर्फ इसलिये रद्द कर दिया गया कि बरेलवी संगठन रजा अकादमी ने उसके विरुद्ध फतवा जारी किया था। सलमान रुश्दी इन्हे पसंद क्यों नही । उन्हे सम्मान देने के लिये ये लोग लालायित क्यों नही है ? बहुत स्पष्ट है कि राजनीतिज्ञ, वोट का बजार भाव देखकर आमंत्रण व सम्मान देते हैं । घटनाक्रम पर नजर डाले तो भारत का सेक्यूलर इस्लाम के समर्थन के बिना अधूरा हो चला है । देश के विद्वजन भी इसे शायद समझबूझकर अनसुना – अनदेखा कर रहे है । देश के आतंकी सजायाफ्ता के विरुद्ध रात में न्याय की गुहार लगाने वाले अघिवक्ता किसी गरीब के राशनकार्ड पर अनाज क्यों नही मिला इसके लिये लडेंगे ।justice क्या वो सभी भारतीय जिन्हे सबूतो -गवाहों के आधार पर फाॅसी हो गई होगी जबकि वास्तव में वे निर्दोष रहे होंगे । उनके लिये कोइ हमदर्दी दिखाई ! भविष्य में न्याय के लिये ऐसे ही सजग रहेंगे । वरिष्ठ पत्रकार श्यामानन्द ठीक कहते हैं कि यहाॅ का सेक्यूलर गाय खना बंद कर दे तो कई नेता भूखें मर जाय । हमारे देश में आंतरिक कलह (युद्ध ) जारी है और राजनीति उसका कारण है । याद करें 1986 में शाहबानों मुकदमें में राजीव गाॅधी का सेक्यूलरवाद इस्लामिक धार्मिक नेताओं के सामने घुटने टेक दिया। शोभा डे एक सेक्यूलर लेखिका हैं । उन्होने जैसे जाना कि देश में गाय पर बवाल है ट्विट मार दिया ‘ मैने बीफ खाया ‘ । क्या औचित्य है इसका !
आाज युवा भारत के 80 करोड़ सहोदर , मतिभ्रम व ठगे से खड़े  हैं । किस पर विश्वास करें ?  एक तरफ बाघ बचाने की होड़ है दूसरी ओर गाय बचाने की मुहीम । चलिये ये सब ठीक है पर विकास ..! सिद्धांत ..!, राष्ट्रवाद ..! का स्वरुप अब तक किये गये किस कार्य को माना जाय ।

Vaidambh Media

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