सुविधाहीन इलाकों में शिक्षा की पहुंच का लचर प्रयास !

education New Delhi :          सुविधाहीन परिवारों और इलाकों से ताल्लुक रखने वाले बच्चों को स्तरीय शिक्षा दिलाने के लिए क्या किया जा सकता है?

क्या हमें बच्चों तक शिक्षा की पहुंच बनानी होगी या फिर हमें बच्चों को ही शिक्षा के करीब ले जाना होगा?

इस मुद्दे को तीन उदाहरणों से बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। इनमें से दो उदाहरण तो वर्तमान समय के ही हैं और भारत से ही संबंधित हैं जबकि तीसरे उदाहरण की जड़ें इतिहास में हैं और दूसरे देश से जुड़ी हैं।  लगभग चार दशक पहले मुंबई में आयकर निरीक्षक के तौर पर काम करने वाले मलयाली युवक सत्यनारायण मुंदायूर ने सबकुछ छोड़कर पूरे देश की यात्रा की और आखिर में वह अरुणाचल प्रदेश में जाकर एक स्कूली शिक्षक के रूप में काम करने लगे। अब वह करीब 65 साल के हो चुके हैं और उन्हें पूरे इलाके में अंकल मूसा या अंकल सर के रूप में जाना जाता है। बच्चों के लिए वह अंकल मूसा के नाम से कॉलम लिखते रहे हैं। उन्हें अरुणाचल में लोहित यूथ लाइब्रेरी नेटवर्क बनाने का श्रेय दिया जाता है। सिविल सोसाइटी ने अपने सालाना हाल ऑफ फेम में उनके बारे में लिखकर सम्मानित भी किया है।

पुस्तकालय; बच्चों में साथ रहने की भावना को भी मजबूती देता है !

विवेकानंद केंद्र की तरफ से संचालित स्कूलों में पहले भी पुस्तकालय मौजूद रहे हैं लेकिन अंकल मूसा ने पुस्तकालयों को आम लोगों के करीब पहुंचाने का काम किया है। वह मानते हैं कि पुस्तकालयों की मौजूदगी से बच्चों में किताबों और शिक्षा के लिए लगाव पैदा किया जा सकता है। पुस्तकालय बच्चों में साथ रहने की भावना को भी मजबूती देता है। उन्होंने अरुणाचल की दिबांग घाटी में मौजूद एटलिन से यह प्रयोग शुरू किया था लेकिन इसने लोहित जिले में कहीं अधिक सफलता हासिल की है। अब तो लोहित में 13 पुस्तकालय संचालित हो रहे हैं। ये पुस्तकालय केवल किताबों का संकलन केंद्र होने से कहीं अधिक काम करते हैं। वहां पर पठन-पाठन के अलावा बच्चों को कहानी पढ़कर सुनाने और नाटकों के मंचन की गतिविधियां भी चलती हैं। इसके पीछे सोच यही है कि किताबों को बच्चों की जिंदगी से जोड़ा जाए। इसी का असर है कि कई बच्चे छुट्टिड्ढयों में भी किताबें अपने घर लेकर जाते हैं। भले ही ये पुस्तकालय आकार में छोटे और अस्थायी हैं लेकिन उनमें से कई अपनी जड़ें जमा चुके हैं। आर्थिक रूप से ये पुस्तकालय मैसूर के विवेकानंद ट्रस्ट से मिलने वाले अनुदान पर निर्भर हैं लेकिन स्थानीय समुदाय से गहरा जुड़ाव ही इन्हें आगे बढ़ाने में मदद कर रहा है।

हताश हो जाते हैं परिवार से अलग होने वाले बच्चे !

दूसरी कहानी अंकल मूसा की सुकूनदायक कहानी के एकदम उलट है। समाचार पत्रिका आउटलुक ने एक लंबी शोधपरक रिपोर्ट के रूप में इसे प्रकाशित किया था। पिछले साल जून में संघ से जुड़े संगठन असम से 31 आदिवासी लड़कियों को शिक्षित करने के लिए गुजरात और पंजाब लेकर गए थे। लेकिन एक साल बीत जाने के बाद उन बच्चियों के मां-बाप को कुछ भी नहीं पता है कि वे किस हालत में हैं? अब तो वे इस कदर हताश हो चुके हैं कि अपनी बेटियों को दोबारा देख पाने को लेकर भी उनके मन में शंका घिर गई है। मां-बाप की मंजूरी लेने वाले कागजात में फर्जीवाड़े की भी आशंका जताई गई है। उन कागजात पर किए गए दस्तखत अंग्रेजी में थे जबकि ये लोग या तो अनपढ़ हैं या फिर अंग्रेजी नहीं जानते हैं। जब इन लड़कियों को लेकर चली ट्रेन नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंची तो गोपनीय जानकारी के आधार पर चाइल्डलाइन डेल्ही ने छापा मारा और फिर लड़कियों को पुलिस के सुपुर्द कर दिया। लेकिन गुजरात के सुंदरनगर की बाल कल्याण समिति के आदेश पर उस समूह को आगे जाने की अनुमति दे दी गई। कुछ दिनों बाद ही असम बाल संरक्षण आयोग ने इसे बाल तस्करी का मामला बताते हुए असम पुलिस को आदेश दिया कि लड़कियों को उनके मां-बाप के पास पहुंचाया जाए। इसका एक और पहलू गुजरात समाचार में प्रकाशित रिपोर्ट के रूप में देखने को मिला। उस रिपोर्ट में बताया गया था कि ये लड़कियां असम की बाढ़ में अनाथ हो गई थीं और हलवाड के सरस्वती शिशु मंदिर ने उन्हें गोद ले लिया है। हालांकि सच्चाई तो यह है कि वे अनाथ नहीं हैं। चाइल्डलाइन की एक टीम जब इनसे मिलने पहुंची तो वो काफी दयनीय हालत में दिखीं। वहां मौजूद आरएसएस कार्यकर्ताओं ने टीम के सदस्यों को धमकी भी दी। पूरे मामले को एक साल से भी अधिक समय हो गया है लेकिन अब तक ये लड़कियां अपने घर नहीं पहुंच पाई हैं।

सरकार भी गलती करती है !

अब हम ऑस्ट्रेलिया के स्टोलेन जनरेशन की बात करते हैं। दरअसल 1960 के दशक तक ऑस्ट्रेलिया का प्रशासन चर्च के सहयोग से वहां के मूल निवासी एबरिजनल (आदिवासी) के बच्चों को उनके परिवार से अलग कर देते थे और उन्हें पालनाघर में भेज दिया जाता था। इसके लिए सरकार यह हवाला देती थी कि एबरिजनल के लुप्तप्राय होने से उनके बच्चों को संरक्षित करने की जरूरत है। लेकिन असल में उन बच्चों को इस तरह से रखा जाता था कि वो अपनी जुबान, संस्कृति और जातीय पहचान को पूरी तरह भुला दें और अंग्रेजी तौर-तरीके अपना लें। बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में ऑस्ट्रेलिया की यह कहानी लोगों के सामने आने लगी। इसके बाद विरोध के स्वर भी तेज होने लगे। इसका असर यह हुआ कि 1980 के दशक में कई प्रांतों की संसद ने एबरिजनल समुदाय से विधिवत माफी भी मांगी। ऑस्ट्रेलिया ने 26 मई 1998 को पहला राष्ट्रीय माफी दिवस मनाया जिसमें 10 लाख से अधिक लोगों ने शिरकत की। उसके अगले ही साल राष्ट्रीय संसद ने एबरिजनल परिवारों के बच्चों को उनके मां-बाप से अलग करने के लिए बाकायदा निंदा प्रस्ताव पारित किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री जॉन हॉवर्ड ने इसे ऑस्ट्रेलिया के इतिहास का गहनतम अंधकार वाला अध्याय बताया था।

Subeer Roy (Mudra Mantr)

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