सूर्य का रहस्य सुलझानें में नासा के साथ भारत !

                  सौर पवन व भारत-

 New Delhi :  विश्व मे हुए आविष्कारों में अधिकतर का सम्बंध थ्योरेटिकल अथवा प्रेक्टिकल भारत से जुड़ा होना स्वाभाविक सा लगता है।  आज विज्ञान अंतरिक्ष के ऐसे रहस्य से पर्दा उठाने का प्रयास करने जा रहा है जो मानव मस्तिष्क के समक्ष अब तक दूरुह बनके खड़ा है। जी हाॅ मैं बात कर रहा हूॅ सृष्टि में आग के दहकते उस गोले की जिसे आप सूर्य के नाम से जानते है। मानव निर्मित यंत्रों (यानों) की चढाई एवरेस्ट से लेकर पृथ्वी से सूदूर ग्रहों ,उपग्रहों तक हो चुकने के बाद अब वक्त आदेश दे रहा है कि  सूर्य  के ताप को मानव मस्तिष्क के समझ तक लाया जाय।  नासा के गोड़ाई स्पेस फलाई सेण्टर से सोलर प्रोप्लस को 12 अगस्त को लांच कर दिया गया। साठ वर्ष पुर्व भारत के महाॅन खगोलशास्त्रीय-भैतिकविज्ञानी  सुब्रमण्यम चन्द्रशेखर ने ‘सौर पवन‘ अस्तित्व वाले शोध पत्र का प्रकाशन अपने जर्नल में किया और सूर्य को समझने जानने, स्पर्श करने तक की उम्मीद वैज्ञानिक लोक में बढ़ गई। श्री चन्द्रशेखर को 1983 में भौतिकी में नोबेलप्राइज दिया गया था। सौर पवन, सूर्य से बाहर बेग से आने वाले आवेशित कणों या प्लाज्मा को कहा जाता है। ये कण अंतरिक्ष में चारो दिशाओं में फैलते जाते हैं। इन कणों में मुख्यतः इलेक्ट्रॅान व प्रोट्राॅन होते हैं। वैसे सोलर पवन पर चर्चा   विस्तार वैज्ञानिकों के बीच 1958 से ही शुरु हो गया था।

सूर्य पर चढाई –

नासा का प्रयास है कि मानव जाति का यह प्रथम प्रयास है जो सूर्य के पहले मिशन को लॉन्च करने के लिए शेड्यूल पर है। यह एक कार के आकार की जांच मशीन है। इसे सोलर प्रो प्लस नाम दिया गया है। सूर्य, पृथ्वी से लगभग 15 करोड़ किमी दूर स्थित है।  उम्मीद की जा रही है कि यान सोलर प्रो प्लस , 40 लाख मील (लगभग 62 लाख किमी) तक जायेगा। यह क्षेत्र सूर्य का बाह्य क्षेत्र कोरोन कहा जाता है। इस यान के द्वारा की जा रही जाॅच ‘पार्कर सौर जांच‘ कही जाती है। दशकों से सूर्य का अध्ययन कर रहे नासा वैज्ञानिक फॉक्स बताते हैं कि, हमारे पास उस तंत्र की मजबूत समझ नहीं है जो हमारे लिए हवा को चलाती है, और यही वह महत्वपूर्ण रहस्य है जिसे हम खोज रहे हैं।  यान  यह यान 1377 डिगीसेल्सियस का सामना करने में स़़क्षम है। हळांकि सुर्य का बाहरी क्षेत्र 20 हजार डिग्री सेल्शियस रहता है। जब कि सुर्य की सतह पर ताप 5500 डिग्रीसे0 रहता है। यह रहस्य भी भैतिक विज्ञानी जानने के लिये बेताब हैं। वह इसके जरिये पता लगाना चाहते हैं कि सूर्य इतनी अधिक उर्जा  के कण कहाॅ से उत्सर्जित कर पाता है। मानव द्वारा  सूर्य पर चढाई का यह दूसरा प्रयास है। प्रथम प्रयास नासा ने सन 1976 इलियस2 यान से किया था। वह अधिक दूरी तय नहीं कर पाया था महज 430 लाख किमी ही जा सका।

सूर्य से पृथ्वी के सम्बंध –

ब्रह्मांड इतना विशाल है कि इसकी कल्पना ही नहीं की जा सकती है। और इसमें सूर्य जैसे असख्ंय तारे हैं। आकाशगंगा में सूर्य की स्थिति 100 अरब से अधिक मानी गई है। सूर्य ग्रहों में सबसे बड़ा और पृथ्वी पर ऊर्जा देता हैं। और जीवन का जीने कारण भी सूर्य को माना हैं। सूर्य पृथ्वी से 13 लाख गुना बड़ा है। सूर्य दूसरे तमाम ग्रहों से बहुत ही अलग है। आपको बता कि यह इतना बड़ा है, कि इसमें कई पृथ्वी समा सकती हैं।

सौरमंडल के द्रव्यमान का कुल 99.8 प्रतिशत द्रव्यमान सूर्य का है जबकि बचा हुआ बृहस्पति का है। सूर्य के बाद ज्यूपिटर सौर मंडल का सबसे बड़ा ग्रह है। सूर्य पृथ्वी से बहुत ही दूर स्थित है। इस लिए सूर्य हमें बड़ा नहीं दिखाई देता, लेकिन सूर्य इतना बड़ा है उसमें 110 पृथ्वी समा सकती है। और सूर्य का व्यास 13 लाख 92 हजार किलोमीटर यानि 865000 मील है, जो पृथ्वी के व्यास का लगभग 110 गुना है। आपको बता दें कि सूर्य पृथ्वी से इतना बडा होने बाद भी पृथ्वी को सौर ऊर्जा का 2 अरबवां भाग ही मिलता है। जो पृथ्वी के लिए कम नहीं है। सूर्य से पृथ्वी की औसत दूरी करीबन 14,96,00,000 किलोमीटर यानि 9,29,60,000 मील है। सूर्य का प्रकाश धरती पर पहुंचने के लिए 8 मिनट 16.6 सेकेण्ड का समय लगता है। पृथ्वी और सारे ग्रह इसके चक्कर लगा रहे हैं। पृथ्वी से सूर्य और जीवन का रहस्यमय नाता है।12 अगस्त 2018 को सूर्य के रहस्य जानने निकले इस सोलर प्रोप्लस से विश्व भौतिक विज्ञानियो को बहुत आश है।

Vaidambh Media

 

 

 

 

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