स्मार्ट सिटी से दूर हो जायेगा दिल्ली का प्रदूषण ?

देश के हृदयस्थल देहली आज प्रदूषित है। भारत को ये बात तब पता चली जब वैश्विक पर्यावरण समीक्षा में इस बात पर सीधे उंगली उठाई गयी। delhi mapसरकारें केन्द्र व राज्य दोनो ने अपने राजनीतिक पैतरे से दिल्ली को स्वच्छ करने की ठान ली है। कोई स्मार्ट शहर बना रहा तो कोई वाहनों के लिये आड इवेन का प्रयोग कर रहा है। पर आधारभूत समस्या का निपटारा कर पाने की क्षमता किसी में नहीं दिखती! ईट गारा सिमंेण्ट से कोई शहर स्मार्ट हुआ है ऐसा मुझे ज्ञात नहीं। इसी जद्दोजहद की जमीनी हकीकत बताती वरिष्ठ पत्रकार सुनीता नारायण की एक रपट …!
 New Delhi : कई साल पहले की बात है। उस वक्त भी दिल्ली का वायु प्रदूषण आज ही की तरह ऊंचे स्तर पर था। उस  वक्त मैं और मेरे सहयोगी अनिल अग्रवाल एक उच्च पदस्थ और जिम्मेदार सरकारी अधिकारी से मिलने गए। यह सन 1990 के दशक के मध्य की बात है। उस वक्त उत्सर्जन मानकों और ईंधन गुणवत्ता के पूर्ण अभाव में हवा एकदम काली हो चुकी थी। delhi polutionअधिकारी हमारी इस मांग से पूरी तरह चकराए हुए थे कि सरकार को नियंत्रण से बाहर होते प्रदूषण को रोकने के लिए कदम उठाने चाहिए। वह हमसे लगातार पूछते रहे, ‘क्या वाकई दिल्ली में इतना प्रदूषण है?’ उनकी बात सुनकर मै भी भौंचक्की थी कि क्या हवा में इतनी गंदगी और कालापन उनको नजर नहीं आ रहे थे? तब मुझे अहसास हुआ कि उनकी और मेरी दुनिया अलग अलग है। वह लुटियन की हरी भरी दिल्ली में अपने घर से निकलते हैं। यह वह इलाका है जहां सरकार रहती है। उसके कार्यालय वहीं आसापास हैं। उनको इस पूरे इलाके में कहीं धूल तक नहीं नजर आती। न ही कहीं कोई बदबू। चूंकि यह सब नहीं दिखता है इसलिए यह सब है भी नहीं। जाहिर है कुछ करने की आवश्यकता नहीं है।

 शहर को स्मार्ट बनाकर होगा शहरी जीवन स्तर सुधारा ?

यह बात मेरे जेहन में ताजा हो गई जब मैंने पढ़ा कि भारत सरकार नई दिल्ली को स्मार्ट सिटी बनाने जा रही है। इस योजना के तहत 20 शहरों का चयन किया गया है।delhi smartकठिन प्रक्रिया के जरिये चुने गए इन शहरों में शहरी जीवन स्तर सुधारा जाएगा। भारत सरकार अब शहर को स्मार्ट बनाने के लिए धनराशि और विशेषज्ञ सहायता मुहैया कराएगी। इसके तहत शहरी सेवाओं में सुधार करने के लिए अभिनव तरीके अपनाए जाएंगे। कहने का मतलब यह कि सरकार अब अपने ही सरकारी क्षेत्र को और अधिक बेहतर बनाएगी। यह हिस्सा अब गरीबी और प्रदूषण से जूझ रहे शेष भारत से थोड़ा और दूर हो जाएगा।
ब्रिटिश राज की महिमा बताने के लिए हुई थी नई दिल्ली की स्थापना !

नई दिल्ली नगरपालिका परिषद क्षेत्र को स्मार्ट सिटी बनाने की घोषणा उस समय हुई है जब दिल्ली का बाकी हिस्सा शहरी कचरे में डूब रहा है।delhi nagar nigam नगर निकाय के कर्मचारियों ने भुगतान न होने के चलते हड़ताल कर रखी है। सच यह है कि सरकार अपने पहले से बेहतर स्थान को और बेहतर बनाने पर खर्च कर रही है। जरा सोचिए, यह वह इलाका है जहां देश का बुर्जुआ वर्ग गेट में बंद आवासीय परिसरों में रहता है। दिल्ली के कुल इलाके में लुटियन की दिल्ली केवल तीन फीसद की हिस्सेदार है। बहरहाल इसे यह नाम लुटियन नामक एक ब्रिटिश शहरी नियोजक के नाम पर मिला है और इसकी स्थापना ब्रिटिश राज की महिमा बताने के लिए हुई थी। भारत सरकार इस जमीन के 80 फीसदी की मालिक है। इसमें कई इमारतें शामिल हैं। यहां कोई लोकतंत्र नहीं है। एनडीएमसी केवल एक निकाय है वह निगम नहीं है। इसका संचालन भी किसी निर्वाचित प्रतिनिधि के पास नहीं बल्कि एक नौकरशाह के पास है।
अब दिल्ली में नये लोगों का स्वागत नहीं !
पानी की खपत यहां देश के भी अन्य हिस्से की तुलना में बहुत अधिक है। यहां प्रति व्यक्ति रोजाना 462 लीटर पानी खर्च होता है जबकि देश के अन्य हिस्सों में यह मात्रा 30 लीटर तक है।

Residents of Sanjay Colony, a residential neighbourhood, crowd around a water tanker provided by the state-run Delhi Jal (water) Board to fill their containers in New Delhi June 30, 2009. Delhi Chief Minister Sheila Dikshit has given directives to tackle the burgeoning water crisis caused by uneven distribution of water in the city according to local media. The board is responsible for supplying water in the capital. REUTERS/Adnan Abidi (INDIA ENVIRONMENT SOCIETY)सरकार के अपने मानकों के मुताबिक भी प्रति व्यक्ति प्रति दिन 150 लीटर की अधिकतम आपूर्ति होनी चाहिए। पानी के प्रयोग की यह असमानता शर्मनाक है और अकेले इसके चलते ही लुटियन की दिल्ली के स्मार्ट सिटी बनने के दावे को खारिज कर दिया जाना था। जमीन के प्रयोग की बात करें तो दिल्ली शहर में जहां दशक के दौरान 50 फीसदी की वृद्घि दर्ज की गई वहीं एनडीएमसी के इलाके में यह दो फीसदी नकारात्मक रही। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो इस क्षेत्र में नए लोगों का स्वागत नहीं है। देश के इस शहर की 30 फीसदी से अधिक जमीन पुनर्निर्माण के उद्देश्य से है। यह बात इसे न केवल दिल्ली बल्कि देश के अन्य हिस्सों से पूरी तरह अलग करती है।
खराब है  कचरा निपटाने वाला कंपोस्ट संयंत्र  !compost mashine
लेकिन इतनी जमीन होने पर भी एनडीएमसी अपने कचरे का प्रबंधन नहीं करता है। यह कचरा दिल्ली के शेष हिस्सों में बने कचरे के ढेरों पर फेंका जाता है। इसकी जमीन कचरा रखने के लिहाज से बहुत महंगी जो है। तमाम कवायदों के बाद यहां का अधिकांश कचरा ओखला और बाकी का दिल्ली के गाजीपुर इलाके में भेज दिया जाता है। ओखला में इस कचरे को निपटाने वाला कंपोस्ट संयंत्र खराब है। ऐसा तब है जबकि सरकार के पास कोष की कोई कमी नहीं है।

 देश के लिये अनुकरणीय शहर नहीं है नई दिल्ली
नई दिल्ली इन तमाम वजहों से ही स्मार्ट सिटी नहीं है। यह ऐसा शहर नहीं है जिसका अनुकरण देश के बाकी शहर करें। यह संसाधनों का सही इस्तेमाल नहीं करती और पर्यावरण के लिहाज से भी यह सजग नहीं है।delhi garbage स्मार्ट सिटी ऐसी नहीं होनी चाहिए। न्यूयॉर्क के पूर्व मेयर और अरबपति माइकल ब्लूमबर्ग के फाउंडेशन ब्लूमबर्ग फिलंथ्रॉपीज को स्मार्ट सिटी संबंधी पहल में सरकार का नॉलेज पार्टनर बनाया गया है। यह पहल ही बताएगी कि देश के लिए स्मार्ट सिटी का क्या अर्थ होगा और हमें वास्तव में क्या आकांक्षा रखनी चाहिए? यह भी एक वजह है कि इनके चयन में समझदारी बरती जाए। देश के शहरी नवीनीकरण का प्रतीक देश के बुर्जुआ लोगों द्वारा अपने ही लोगों के लिए बनाए गए शहर नहीं हो सकते। यह स्मार्ट पहल तो कतई नहीं है।

Vaidambh Media

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