स्वच्छ भारत या एक शर्मिंदा मुल्क तैयार कर रही सरकार ?

sauchNew Delhi : राज्य सरकारें खुले में शौच को सामाजिक रूप से अस्वीकार्य बना रही हैं। हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ तथा कुछ अन्य राज्यों ने पंचायत का चुनाव लडने के लिए यह अनिवार्य कर दिया है कि उम्मीदवार के घर में शौचालय हो। कई जिलों में खुले में शौच कर रहे लोगों को देखकर सीटी बजाई जाती है, उनकी तस्वीरें गांव में सूचना पट्टड्ढ पर लगाई जाती हैं, उनके राशन कार्ड रद्द कर उनसे सरकारी लाभ छीन लिए जाते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि, खुले में शौच मुक्त बनाने के महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य तय करने वाली हमारी राज्य सरकारें इस बदलाव के लिए लोगों को शर्मिंदा करने को  एक तरीके ,  के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं।

 पेय जल और शौचालय में प्राथमिकता किसे दी जा रही है ?

water-crisisराजस्थान के प्रतापगढ़ जिले में इस तरह की कार्रवाई के बहुत त्रासद परिणाम सामने आए। वहां सरकारी अधिकारी खुले में शौच कर रही महिलाओं की तस्वीर खींच रहे थे। लोगों ने इसका विरोध किया और एक व्यक्ति को जान गंवानी पड़ी। जब मेरे सहयोगी महताब शाह कच्ची बस्ती पहुंचे तो उन्होंने पाया कि यह एक अवैध बस्ती थी और महिलाओं के पास खुले में शौच के अलावा कोई विकल्प ही नहीं था। वे बेहद गरीब थीं, उनके पास शौचालय बनाने के लिए जमीन तक नहीं थी और उनके पास शौचालय में इस्तेमाल के लिए पानी तक नहीं था। यहां तक कि वहां बने सामुदायिक शौचालय में भी 3,000 लोगों की जरूरत का पानी नहीं हो पाता। इसका रखरखाव बेहद खराब था।   यह आंकड़ा सुधरेगा कैसे? लोगों के व्यवहार में इसे लेकर बदलाव कैसे आएगा? इसका संबंध विकास की राजनीति से है। इस विषय पर अध्ययन करने वाले मेरे सहकर्मियों ने पाया कि देश को खुले में शौच मुक्त बनाने के महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य तय करने वाली हमारी राज्य सरकारें इस बदलाव के लिए लोगों को शर्मिंदा करने को  एक तरीके ,  के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं। लेकिन खुले में शौच को केवल इतने से नहीं समझा जा सकता। आखिरकार, लोग शौचालय बनवाने के पहले मोबाइल फोन और साइकिल तो खरीदते ही हैं। ऐसे में शौचालय की मांग भला कैसे बढ़े? मेरा मानना है कि इस मामले पर खुलकर चर्चा की जाए। लोगों के व्यवहार में बदलाव लाना अत्यंत आवश्यक है। साफ-सफाई की खराब स्थिति के स्वास्थ्य पर पडने वाले दुष्प्रभावों को लेकर भारी जागरूकता फैलाने की जरूरत है। मेरा अपना शोध बताता है कि इस लिंक को केवल नीतियों के संदर्भ में समझा जाता है, असली आंकड़ों के संदर्भ में नहीं। व्यवहार में बदलाव लाने के लिए स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता पैदा करना जरूरी है।

शौचालयों के  साथ -साथ  पानी का भी रखना होगा ध्यान !

Swachh-Bharat-slogan-in-hindiतंबाकू को लेकर व्यवहार में बदलाव साफ देखने को मिला है। क्योंकि अब तंबाकू के दुष्प्रभाव को लेकर लोगों की समझ एकदम साफ हो चुकी है। शौचालयों के मामले में भी ऐसा ही करने की जरूरत है। आज सरकार का स्वच्छ भारत मिशन इस बात को स्वीकार करता है और इस विषय पर सूचित, शिक्षित और संवाद को प्रोत्साहित भी करता है। लेकिन खुद सरकारी आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2016-17 में सरकार ने इस सिलसिले में आवंटित बजट का बमुश्किल 0.8 फीसदी इस्तेमाल किया। जबकि दिशानिर्देश 8 फीसदी इस्तेमाल के थे। शौचालय बनाने में रियायत पर्याप्त नहीं है। लोगों का व्यवहार बदलने के लिए काफी कुछ किया जाना बाकी है। महताब शाह कच्ची बस्ती जैसी जगहों पर सरकार को सस्ते सामुदायिक शौचालय बनाने होंगे जो साफ-सुथरे और बेहतर रखरखाव वाले हों। इस दौरान पानी और शौचालयों के संबंध का भी ध्यान रखना होगा। इसमें दो राय नहीं कि सामाजिक दबाव काम करता है लेकिन हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम पीडि़तों को दोषी न ठहराएं या उनका मजाक न उड़ाएं। ऐसा करने से हम स्वच्छ भारत नहीं बल्कि एक शर्मिंदा मुल्क तैयार करेंगे।

Suneeta Narayan

(  business Stranded )

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