स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल: देश में नर्सों की संख्या में भारी गिरावट !

देश में 24 लाख नर्सों की कमी !  प्रशिक्षित नर्सों का पलायन जारी !

New Delhi:  देश में स्वास्थ्य सेवाओं में योग्य लोगों की कमी बड़े पैमाने पर हैं। समाज में जागरुकता की कमी से ये सेवायें बधित हो रही हैं। देश के बीमार स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र की दिक्कतें कम होने का नाम ही नहीं ले रहीं।nursing देश में पहले से ही स्वास्थ्य परिचारिकाओं (नर्सों) की कमी है (देश भर में नर्सों की संख्या खुद स्वास्थ्य की हालत का नमूना है) और अब ब्रिटेन की नर्सों की कमी की घोषणा के बाद दिक्कत और बढ़ सकती है। इस घोषणा के बाद गैर यूरोपीय देशों की नर्सों (जिनमें भारत की तमाम नर्सें शामिल हैं) का यह डर समाप्त हो गया है कि उनको ब्रिटेन छोड़कर वापस जाना पड़ सकता है। इतना ही नहीं अब तो नर्सों के वीजा आवेदनों को भी तेजी से निपटाया जाएगा। यद्यपि कुल आपूर्ति पर इसका बहुत अधिक असर देखने को नहीं मिलेगा लेकिन पहले से ही जड़ जमा चुकी समस्या इससे और गहरी हो जाएगी। देश में 24 लाख नर्सों की कमी पहले से है। विकासशील देशों में इस कमी का सीधा संबंध प्रशिक्षण सुविधाओं की कमी से है लेकिन भारत में नर्सिंग कॉलेजों में सीटें खाली रह जा रही हैं क्योंकि उन्हें कोई प्रशिक्षु नहीं मिल पा रहा। इतना ही नहीं जो नर्स प्रशिक्षित होकर निकल रही हैं वे भी बेहतर पैसे की तलाश में अमीर देशों में रोजगार के अवसर देख रही हैं।

  नर्सों की आपूर्ति में कमी क्यों आ रही है? 

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स्वास्थ्य क्षेत्र के उद्यमी और नारायण हेल्थ के संस्थापक डॉ. देवी शेट्टी ने हाल ही में एक समाचार पत्र के आलेख में इस क्षेत्र की चिंताजनक तस्वीर पेश की थी। वर्ष 2009 में भारत में 16.5 करोड़ नर्सें थीं जिनकी संख्या अब घटकर 15.6 लाख रह गई है। नर्सिंग कॉलेजों में दाखिलों की संख्या घटकर आधी रह गई है और दक्षिण भारत के आधे नर्सिंग कॉलेज बंद हो चुके हैं जबकि वे नर्सों की आपूर्ति का प्रमुख जरिया थे। मौजूदा रुझान के मुताबिक तो देश के आधे निजी अस्पताल और अधिकांश सरकारी अस्पतालों को अगले पांच साल में नर्सों की कमी के चलते बंद करना पड़ सकता है।

हमारी नर्सों की दक्षता ?

Smiling Physician near New Family --- Image by © Royalty-Free/Corbisनर्सों की आपूर्ति में कमी क्यों आ रही है? डॉ. शेट्टी का मानना है कि चूंकि उनके लिए करियर की संभावनाएं बहुत उज्ज्वल नहीं हैं इसलिए यह पेशा उनके लिए बहुत तेजी से अनाकर्षक होता जा रहा है। अन्य देशों से एकदम उलट हमारे देश में गहन चिकित्सा कक्ष में 20 साल का अनुभव रखने वाली किसी नर्स को भी कोई दर्दनिवारक दवा या इंजेक्शन तब तक देने की इजाजत नहीं है जब तक कि कोई चिकित्सक आसपास न हो। अमेरिका में 67 फीसदी मामलों में एनस्थीसिया देने का काम भी नर्स ही करती हैं। लेकिन भारत में यह संभव नहीं। भारत ने नर्स की सेवाओं को केवल स्पंज बाथ देने जैसे छिटपुट कामों तक समेट दिया है।

देश के स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में निजी क्षेत्र अहम दखल रखता है !

डॉ. शेट्टी कहते हैं कि इस समस्या को दूर करने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय और नर्सिंग काउंसिल को विशेष पाठ्यक्रम तैयार करने चाहिए ताकि सामान्य नर्सों के साथ नर्स प्रैक्टिशनर, नर्स इंटेसिविस्ट और नर्स एनेस्थीटिस्ट तैयार किए जा सकें। healthऐसा करने से उनका वेतन भी बढ़ेगा। आखिर वे बढ़े वेतन की तलाश में ही पश्चिम एशिया का रुख करती हैं। इस समस्या का हल एफडीआई में नहीं निहित है। 300 बिस्तरों वाले एक स्पेशियलिटी अस्पताल का निर्माण तो छह महीने में हो सकता है लेकिन वेंटिलेटर पर रहने वाले एक बच्चे की देख-रेख करने लायक नर्स तैयार करने में आठ साल का वक्त लगता है। कहा जा सकता है कि असल दिक्कत गलत रवैये और नीति निर्माताओं के अदूरदर्शी नजरिये में निहित है। इस समस्या से निपटने के लिए काफी कुछ किए जाने की आवश्यकता है। चूंकि खराब आपूर्ति की प्रमुख वजह खराब वेतनमान है, इसलिए निजी अस्पताल नर्सों के वेतन भत्तों में तत्काल इजाफा कर सकते हैं। देश के स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में निजी क्षेत्र अहम दखल रखता है। देश के चिकित्सा खर्च में 68 फीसदी निजी क्षेत्र के हिस्से ही जाता है। सरकार की ओर से भी नर्सों के भुगतान में बढ़ोतरी की पूरी गुंजाइश है क्योंकि स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र पर होने वाला सरकारी खर्च अभी जीडीपी के 1.3 फीसदी के बराबर है।

निजी अस्पताल धन कहां से पाते हैं ?

hospital  लेकिन सवाल यह भी है निजी अस्पताल धन कहां से पाएंगे? निश्चित तौर पर वे मरीजों से तो इसकी उगाही नहीं ही कर सकते। हां, चिकित्सकों और विशेषज्ञों से जरूर कहा जा सकता है कि वे थोड़ी कम कमाई करें। नर्सों की आय में बढ़ोतरी के लिए उनको अपनी कमाई का बहुत कम ही हिस्सा गंवाना होगा। लेकिन यह हल भी दीर्घकालिक नहीं होगा। उसके लिए डॉ. शेट्टïी की सुझाई राह पर चलना होगा। लेकिन यहां भी चिकित्सकों की भूमिका है। भारतीय चिकित्सा महासंघ (आईएमए) की मदद से चिकित्सकों ने दशकों से अपने अधिकार क्षेत्र की जमकर रक्षा की है।

मात्र 67 फीसदी बच्चों का ही जन्म  कुशल दायी की निगरानी में होता है !

इस वर्ष के आरंभ में जब डॉ. शेट्टी ने फोब्र्स पत्रिका में एक आलेख में ऐसा ही हल सुझाया था तो एक चिकित्सक ने कहा कि आलेख सच की आंखों में आंखें डालकर बात करता है लेकिन उसने यह भी कहा कि आईएमए शायद नर्स प्रैक्टिशनर, फिजीशियन और एनेस्थीटिस्ट के सुझाव को हजम न कर सके।nursing Newborn- आईएमए ने गत वर्ष नर्सों को गर्भपात करने की इजाजत देने का भी विरोध किया था। हकीकत में अगर शुरुआती दौर में गर्भपात किया जाए तो वह किसी बच्चे को जन्म दिलाने की प्रक्रिया से अधिक कठिन नहीं होता है और हकीकत यह है कि देश में पैदा होने वाले केवल 67 फीसदी बच्चों का जन्म कुशल दायी की निगरानी में होता है। यह भी एक तथ्य है कि भारत में चीन की तर्ज पर ग्रामीण इलाकों में सेवाएं देने के लिए प्राथमिक चिकित्सा का प्रशिक्षण लेने वाले चिकित्सक नहीं हैं क्योंकि भारतीय चिकित्सकों और उनकी लॉबी ने ऐसे किसी भी विचार का घोर विरोध किया। इसके अलावा हिंदू समाज में नर्स के पेशे को लेकर एक सांस्कृतिक पूर्वग्रह है। यही वजह है कि केरल और गोवा की ईसाई नर्सें ही देश के 40 फीसदी नर्सिंग कॉलेजों में नजर आती हैं। नर्सों की कमी दूर करने के लिए उनको लेकर नजरिये में भी बदलाव लाना होगा। इसमें नीति निर्माताओं से लेकर चिकित्सकों, अस्पतालों और आम जनता का नजरिया भी शामिल है।
सुबीर रॉय (B.S.)

 

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