…हमें इस धरती पर जीने का अधिकार है !

Noida : किसी देश में जातीयता,  काला- गोरा का भेद,  धर्म आधारित भेद- भाव होना समाज का स्वाभाविक लक्षण है। मनुष्य भी सामाजिक पशु हैं जानवरों के गुण से स्वयं को वंचित कैसे रख सकता है! वर्षों से इसी संघर्ष में हमें जीने की आदत पड़ गयी है। कौन है  ? जो लोगों को उनके धर्म को खतरा बताकर स्वयं को धार्मिक शुभेच्छु बनने के लिये मरा जा रहा है ! कोई सनातन,  कोई इस्लाम,  कोई बौद्ध,  कोई इसाईयत हमें पसंद नही ; तो क्या हमें इस धरती पर जीने का अधिकार नहीं है ?  ऐसा है तो क्यों ?  ये फैसला करने से पहले धरती, वनस्पति ,  जीव सबको धर्म व जाति के आधार पर बाॅट दो ये वैश्विकरण का ढोंग क्यो !

  गैरजिम्मेदार : संस्कृति मंत्री भारत सरकार खामोश क्यों ?
एक निर्दोष मुस्लिम परिवार के साथ हुए अपराध को अधिकांश टीकाकार culturel minister mahesh-sharma1कितना भयावह मान रहे हैं। इस अपशकुनी घटना का दूरगामी असर होगा। हालांकि संघ परिवार और कम से कम एक केंद्रीय मंत्री यह समझने में नाकाम दिखते हैं। उन लोगों की दलीलों की अनदेखी की जा सकती है जिनको हिंदुत्व की मुख्य धारा के हाशिये के लोग कहा जा रहा है हालंाकि इस पर भी सवाल उठाया जा सकता है क्योंकि ऐसे तत्त्व नफरत का माहौल बनाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। यह माहौल बाद में आपराधिक वारदात को प्रोत्साहन देता है। पब में युवाओं पर हमले भी ऐसी ही घटनाओं में शामिल है। ऐसे में यह बात ध्यान देने लायक है कि सरकार के प्रमुख लोग इस मसले पर खामोश रहे हैं। इनमें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अध्यक्ष और प्रधानमंत्री भी शामिल हैं। उन्होंने संस्कृति मंत्री (जो उस इलाके के सांसद भी हैं) के खिलाफ कोई कार्रवाई न करके या बयान न देकर लापरवाही का परिचय दिया है।

 घटनाओं की अनदेखी जानबूझकर घटनाओं का समर्थन !

संस्कृति मंत्री ने घटना को लेकर लगातार बेतुके और आहत करने वाले बयान दिए हैं। मिसाल के तौर पर musalman yuvakभीड़ द्वारा जान लेने की घटना एक दुर्घटना थी, जो गिरफ्तार किए गए हैं वे निर्दोष हैं, वह महापंचायत बुलाएंगे आदि आदि। पुलिस द्वारा पीडि़त के फ्रिज में मिले मांस को जांच के लिए भेजना (कि कहीं वह गोमांस तो नहीं) भी कानून की अनदेखी ही उजागर करता है। गोमांस भक्षण राज्य में अपराध नहीं है और इससे उस हत्या की प्रकृति में कोई बदलाव नहीं आएगा कि वह गाय का मांस था या किसी अन्य पशु का। sadbhav हाल की घटनाओं की अनदेखी करना जानबूझकर नजर चुराने जैसा होगा। हाल ही में हरियाणा में मुस्लिमों को एक मस्जिद नहीं बनाने दी गई जबकि जमीन पर उनका स्पष्टï कब्जा था। कुछ तर्कवादियों की हत्या के मामले में गोवा के सनातन संगठन के अनुयायियों की ओर अंगुलियां उठी हैं लेकिन हिंदुत्व के कुछ हिमायतियों की प्रतिक्रिया कुछ वैसी ही है जैसी लिंडन जॉनसन ने एक तानाशाह के बारे में की थी, ‘वह बहुत बुरा हो सकता है लेकिन वह हमारा है।’ मुकुल केशवन ने हाल ही में कहा कि हिंदुत्ववादी ताकतों ने मृदुभाषिता त्याग दी है। यह सच है क्योंकि हाल के दिनों में उनकी आक्रामकता बढ़ी है और वे पहले के मुकाबले अधिक साफगोई से सामने आ रहे हैं। उनकी मानसिकता, उनकी प्रेरणा और उनके लक्ष्य खुलकर सामने हैं जिसकी अनदेखी संभव नहीं।

भारत की शासन व्यवस्था दांव पर  !

छद्म धर्मनिरपेक्षता की आलोचना करते-करते कुछ हिंदूवादी अब यह दलील देने लगे हैं कि धर्मनिरपेक्षता अपने आप में भारत के लिए एक स्वयं में एक बाहरी अवधारणा है। Government-of-India बहरहाल इतना ही नहीं उन्होंने तो यह तक कामना कर डाली कि नेपाल को अपने नए संविधान में खुद को हिंदू राष्टï्र घोषित करना चाहिए था। अगर सांप्रदायिक तत्त्वों की बयानबाजी को चुनौती नहीं दी गई और सरकार के जिम्मेदार लोगों से इनको प्रोत्साहन मिलता रहा तो भारत की शासन व्यवस्था दांव पर लग जाएगी। अगर सरकार के कामकाज मसलन अपराधियों की दोष सिद्घि और विधि व्यवस्था में सांप्रदायिकता आ गई तो संविधान की मूल व्यवस्था ही हिल जाएगी जिसके तहत सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता हासिल है और मजहबी आधार पर भेदभाव अस्वीकार्य है। संसद में मुस्लिम प्रतिनिधित्व पहले ही तेजी से घटा है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी उनका चुनाव जीतना मुश्किल हो रहा है। प्रशासन और पुलिस आदि में मुस्लिमों की मौजूदगी बेहद कम है। इसके लिए कुछ हद तक तो यह समुदाय खुद दोषी है। अहम बात यह है कि ऐसी व्यवस्था में भरोसा रखा जा सकता है जिसमें आपकी बहुत सुनवाई न हो। अगर यह भी नहीं रहा तो समझ लीजिए लक्ष्मण रेखा पार हो गई है। इसका परिणाम हर किसी को भुगतना होगा।

Vaidambh Media

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