हर मोर्चे पर पितृसत्ता से जूझती गुलाबी गैंग

समाजिक काम करने के लिए पहले स्वयं के बारे में आंकलन कर लेना चाहिए कि कहीं इसमें हमारा कोई छोटा-मोटा स्वार्थ तो नहीं। समाज सेवा के लिए कोई रणीनति नही बनानी पड़ती है बस निकल पड़तें हैं। बाॅदा जिले में अपनी हैशियत रखने वाली गुलाबी गैंग बहुत ही साधारण मुद्दे पर उठ खड़ी हुई। पड़ोस में हो रही घरेलू ंिहसा का विरोध कर बैठी सम्पत पाल  अब नारी समाज की चेतना जगृति का वाहक बन गई है।  औरत व बच्चियों पर हो रहे जुल्म पर खमोश पितृसत्ता के विरूद्ध आवाज बुलंद करती है उनकीे गुलाब गैंग। गोरखपुर मे प्रतिरोध का सिनेमा के 9वें वर्ष आयोजन में प्रदर्शित डाक्यूमेण्ट्री  फिल्म गुलाबी गैंग दिखाई गई। निर्देशक निष्ठा जैन ने गुलाबी गैंग पर  बहुत बारीक नजर डालने का प्रयास किया है।
फिल्म बताती है कि  सम्पत पाल को सामाजिक लड़ाई लड़ने के लिए सिर्फ उसके जज्बे ने उसको आगे किया। आगे बढ़ी तो स्वाभविक औरत जिसमे करूणा व दर्द तथा ममता जैसे भावुक रिस्तोें से उसका सामना हुआ। फिल्म यह बताने मे सफल रही है कि सम्पत एक साधारण औरत है । उसने वह सब सहा जो पुरूष समाज के खिलॅाफ खड़े होने पर होता है। नारी शक्ति कहाॅ कमजोर पड़ के अपना ही बुरा कर बैठती है और उसे सही ठहराने की पुरजोर कोशिश भी करती है ,गैंग की एक सदस्य शाजिया का भाई जब अपनी छोटी बहन के शौहर की हत्या इसलिये कर देता है क्योंकि उसने विजातीय से प्रेम विवाह किया था। शाजिया  भाई को सही ठहरा रही थी, खानदान की ईज्जत जो चली गई थी,उसे नारी तथा उसके सम्मान के बारे मे जो कुछ पता था वह सब मजहबी ज्ञान के आगे ब्यर्थ साबित हुआ। सम्पत ने शाजिया को गैंग से अलग कर दिया। सामाजिक कार्यकर्ता को अपना-पराया का स्वार्थ रखने पर पीड़ित को न्याय दिला पाना कठिन हो जाता है। फिल्म का एक सीन लोकतंत्र पर कुण्डली मारे बैठे माफिया को दिखाती हैै , वहाॅ कई हत्याओं का आरोपी गुण्ंडा एक ग्रामसभा का ग्रामप्रधान है। गुलाब गैंग वहाॅ प्रत्यासी खड़ा करती है। परिणाम आने पर प्रधान पद की प्रत्यासी की बेटी जो सवाल उठाती है वह पूरे देश की जनता के लिये है। 14 साल की वह मासूम गुलाब गैंग के सदस्यों से पूछती है-900 सदस्य गैंग मे हैं फिर  हमे 125 वोट ही क्यांे मिला?तब तो सब कह रहे थे लड़ो-लड़ो हम साथ है, तुम सब उसके साथ चले गये। उस समय कैमरा सही जगह पर था। मासूम बच्ची के चेहरे का गुस्सा व किसी अनहोनी का भय दोनो दिख रहा था। गुस्सा, धोखेबाज दोस्तों से और अनहोनी, विजय के मद में चूर दबंग के अगले कदम से। अब तो दोस्तों का साथ भी देख लिया था। यह फिल्म बहुत सरल तरीके से  हमारे ग्रामीण सामाजिक ताने-बाने की प्रमाणिकता सिद्ध करती है।
फिल्म में लाइट का बनावटीपन नही है। यथार्थ जो मिला उसे समेटते गये ।कहीं -कहीं  तकनीकी पक्ष कमजोर रहा बाकी सम्पत के ब्यक्तिगत जीवन ,उसके परिवार का फिल्मांकन नही किया गया जो फिल्म का मुख्य बिंदु हो सकता था। महिला स्वावलम्बन में गैंग या सम्पत का योगदान भी स्पष्ट नही हो सका जबकि सम्पत नीजी बोलरो गाड़ी से चलती हुई दिखई गई हैं। ग्रामीण  महिलाओं पर अत्याचार व गैंग के हस्तक्षेप  मामलें में सिर्फ गुलाब गैंग की मिटिंग दिखाई गई। ज्यादा फोकस महिला की हत्या पर दो परिवारों के मौन पर रखा गया। ये कुछ कमियाॅ रहीं जो डाक्युमंट्री को 10 नम्बर देने से रोकती है। निष्ठा का प्रयास  महिलाओं को आन्दोलित करते-करते रह गया।

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