हे ईश्वर इसे मुक्ति दो !

123अष्टावक्र की तरह उसके आठ अंग टेढ़े नहीं है. केवल उसकी गर्दन टेढ़ी है, वो भी 180 डिग्री. उसके मजदूर पिता मजबूर हैं. वह अपने बेटे के उपचार के लिये अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में दो सप्ताह रहे . इसके अलावा देश के करीब 50 चिकित्सकों को पहले ही दिखा चुके हैं. जिसके बेटे की टेढ़ी गर्दन को देख चिकित्सकों ने हाथ खड़े कर दिये हों उसका साथ केवल बेबसी और पीड़ा देती है. वह खुद खाना नहीं खा सकता. वह दूसरे बच्चों की तरह भाग-दौड़ नहीं कर सकता और उछल-कूद तो बिल्कुल नहीं. जब उसके दो भाई और एक बहन खेलते-खाते हैं तो वह उन्हें देखता है टुकुर-टुकुर. वह दर्द से कराहता है, मन ही मन कुछ सोचता है, अपने ऊपर जैसे किसी गठरी का बोझ लिये बैठे रहता है दिन-भर चुपचाप-ग़ुमसुम! लेकिन कोई उसे ठीक नहीं करता. अपने बेटे की पीड़ा को देख उसे ठीक ना कर पाने की बेबसी , मजदूर पिता, पीड़ा उसकी बेबसी महसूस करने के सिवाय कुंछ न कर पाने की आह !

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New Delhi/AIIMS: मध्य प्रदेश के एक गाँव में रहने वाले मजदूर महेंद्र अहिरवार के 12 वर्षीय बेटे की ज़िंदगी दूभर हो चुकी है. उसे एक बीमारी है जो सामान्य रूप से कम ही देखी जाती है. उसकी गर्दन 180 डिग्री पर लटकी रहती है. चलना तो दूर वो अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता. बैठे रहना उसकी मजबूरी है और उसकी माँ उसके खाने और अन्य दैनिक कार्यों को करवाने का एक सहारा. उसकी माँ सुमित्रा उसे अकेले नहीं छोड़ती. लेकिन उसे पता है कि वह हर समय उसके साथ नहीं रह सकती. जन्म के छह माह बाद ही उसकी गर्दन एक ओर झुकने लगी थी. तब से उसका परिवार परेशान है. यह सोच कर कि उसकी इस परेशानी का उपचार शायद उसके पास नहीं है, वह अपने बेटे को कई चिकित्सकों के पास ले गयी.चिकित्सकों के हाथ खड़े कर देने के बाद वह अपने उस बेटे के लिये मौत चाहती है जिसे उसने अपनी कोख़ से जन्म दिया है. वह मौत को ऐसी जिंदगी से अच्छा मानती है. वह मजबूर है, निष्ठुर नहीं!

        Vaidambh Media

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