वैदम्भ, महाकाल का पर्यायवाची, समय इन्ही से निकलकर इन्ही में समा जाता है। दुनिया की समस्त शकितयों मे सबसे मुल्यवान है समय। जीवन का प्रवाह कभी नही रुकता।समय ने ठहरना नही सीखा। जो बीत गया कभी लौटा नहीं। मनुष्य समय को अपनी मुठठी मे कैद कर सकता है! स्मरण रहे बंद मुठठी में रेत की तरह होता है समय; हममे उसे सम्भालने की कला आनी चाहिए।
समय के इस चक्र में स्वयं का स्थान निर्धारित करना तभी सम्भव है जब हम दौड़ में स्वयं को शामिल होने लायक बना लें। आज हममे से हर दूसरा ब्यस्त है,पर कहा? ब्यस्त तो चींटिया भी है सवाल है कि हम किसके लिये ब्यस्त हैं? हमने समय का सदुपयोग किया तो समय कभी ब्यर्थ नही होगा। हमारे ही पास ; हमारे सदगुणों, हमारी योग्यता व क्षमता के रुप में समय सदैव मौज़ूद रहेगा। वक्त पल-पल मिलकर शताबिद में बदल जाता है। यह दर्शता है कि साधारण से महानायक का सफर कैसे तंय किया जाता है,जाहिर है समय की गति से कदम मिलाकर चलना ही होगा। हमारा कार्यक्षेत्र कुछ भी हो, हमपर चाहे जितनी जिम्मेदारिया, उत्तरदायित्व या परेशानिया हों उसका उचित प्रबंधन आवश्यक है, तभी हमारा आत्मविश्वास बढ़ेगा।
आज सामाजिक-संस्कृतिक जीवन छिन्न- भिन्न हो रहा है।क्या आज आप मनुष्य को सामाजिक प्राणी कह सकते हैं;जिसकी सामाजिकता पारिवारिक स्तर पर भी नही बची है। पशुता, मानवता पर भारी पड़ रही है;यानी जीवन मूल्यों मे संस्कृति को स्थान नही मिल पा रहा। यह संस्कृति ही तो मनुष्य को पशुओं सेें अलग करती है। आज का सबसे शकितशाली संस्कृतिक हथियार कम्प्युटर है। इसे भी नापाक इरादे रखने वाले अंधविश्वास,वायरस,हिंसक पोर्न के माध्यम से नकारात्मक व घातक बनाने पर अमादा हैं।आज मनुष्य की चेतना पर सूक्ष्म प्रहार किया जा रहा है। ऐसे में जब र्इश्वर, धर्म, राज्य, परिवार, सम्पतित, विचारधारा तथा समय सभी प्रश्नगत हो चुके हैं तब हमें नये ढंग से सोचने, नये प्रयोग करने ,नये नतीजे निकालने के साथ-साथ नर्इ राहें बनाने का वक्त आ गया है। इस सार्थक प्रयास में मानव मुल्यों के सजग प्रहरियो की अभिब्यकित उनके स्वच्छंद वैचारिक प्रवाह हेतु यह वेव आपका हार्दिक स्वागत करता है।

धनञ्जय ‘ब्रिज’