अभद्र : भाषा की मर्यादा लांघते सभी दलों के नेतागण !

netaबयानों और शब्दों के विभाजनों के बनाए जा रहे दो कॉलम !

राष्ट्रीय पदों की गरिमा को बहुत सस्ता बनाते जा रहे नेतागण !

New Delhi : आजकल सामाजिक व राजनीतिक स्तरों पर अभद्र भाषा का प्रयोग एक प्रचलन बनता जा रहा है। सोशल मीडिया पर लिखे जाने वाले कमेंटों में प्रयुक्त भाषा का स्तर तो कभी- कभी इतना गिरा हुआ होता है कि अभद्र शब्द भी उससे कहीं अधिक स्तरीय जान पड़ता है। यानि कि जिस निम्न स्तर पर जाकर लोग भाषा को गिरा रहे हैं, उसके लिए नए ढंग से किसी शब्द को खोजने की जरूरत है। यही हाल आजकल हमारे राजनीतिक माहौल में पिछले कुछ वर्षों से अधिक दिखाई देने लगा है। क्या पक्ष और क्या विपक्ष, सभी दलों के नेतागण भाषा की मर्यादाओं को लांघते हुए राष्ट्रीय पदों की गरिमाओं को बहुत सस्ता बनाते जा रहे हैं।
प्रश्न यह उठता है कि इस अभद्र भाषा की आवश्यकता क्यों अकस्मात् नेताओं में महसूस की जाने लगी है? यह लोकप्रियता हासिल करने की शार्टकट महत्वाकांक्षा है या फिर स्वयं की अक्षमता को अप्रकट रखने के प्रयास की कुण्ठित निराशावादिता है। सत्ता की लोलुपता की मदांधता और सत्ता की विलुप्तता की कुण्ठा, नेताओं में सत्ता के प्रति तृष्णा का जो भाव उजागर करती है, वह उनकी प्रयुक्त भाषाओं में इन दिनों स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा है। जनता दर्शकदीर्घा में बैठकर इस ओर से उस ओर फेंके जा रहे अमर्यादित बयानों की गेदों की उछालें, दिशाएं और स्कोर देखने में खुश है। हम सभी बँट रहे हैं पुराने नए बयानों और शब्दों के विभाजनों के बनाए जा रहे दो कॉलमों में। कोई किसी से कम प्रतीत नहीं होता। सभी एक से बढ़कर एक हैं ! घटी है तो सिर्फ संसद की मर्यादा, आहत हुआ है तो सिर्फ संविधान का गौरव  , और झुका है तो सिर्फ भारत का सिर।

politician-cartoon-in-india_16_04_2014आदर्शवाद  का उपहास !
लेकिन अभद्रता इतनी प्रभावी हो गई है कि आदर्शवाद की ये बातें उपहास लगने लगी हैं। क्या पद और क्या पदों की गरिमाएं? अभद्रता के बाणों से आहत सब हो रहे हैं, लेकिन कोई भी आत्मविश्लेषण को तैयार नहीं होता। आरोप-प्रत्यारोप के दौरों ने भारतीय राजनीति को अभद्र भाषा के जिस दलदल में लाकर फँसा दिया है, उससे उबरने के आसार दिखाई नहीं देते, क्योंकि चुनावी दंगल नियमित अंतरालों पर होने ही हैं और उनमें ये प्रहार कहीं न कहीं राजनीतिक उपयोगिता भरे होते हैं। अभद्र भाषा के प्रयोग ने राजनीति को पहले से कहीं अधिक सस्ता बना दिया है। मर्यादित होना सीमाओं में बंधे होने की प्रवृत्ति का परिचायक होता है, जहां भाषा की भी अपनी सीमाएं निर्धारित होती हैं। क्या बढ़ते प्रदूषण के कारण लोगों में कम होती जा रही प्रतिरक्षा क्षमता की तरह ही राजनीतिक प्रदूषण में हो रही वृद्धि से भारतीय राजनीति की सीमाओं के बंधनों की धैर्यशीलता क्षमता भी कम होती जा रही है? कोई किसी को अभद्र से अभद्र टिप्पणी करने में शर्म महसूस नहीं करता, लेकिन अपने लिए सुनकर तिलमिलाना आज की राजनीतिक प्रवृत्ति बनती जा रही है।

मात्र लुत्फ उठाने की भूमिका न निभाए जनता ,  इतिहास गवाह है जनता ही नेताओं पर भारी रही है !
भारत के भविष्य को लेकर भय सिर्फ इस बात का लगता है कि यह राजनीतिक अभद्रता देश को किस स्तर तक गिराएगी, कह पाना असम्भव है, लेकिन गर्त में पहुंचने के निशान साफ दिखने लगे हैं। भाषा का राष्ट्रीय चरित्र के उत्थान में बहुत बड़ा योगदान होता है। इसे नेतागण स्वीकारें या न स्वीकारें, क्योंकि नेताओं की स्वीकृति अथवा अस्वीकृति से राष्ट्रनिर्माण नहीं हुआ करते। हां वे माध्यम अवश्य होते हैं। अतः वर्तमान में भारतीय राजनीति में चल रहे अमर्यादित अभद्र भाषा के प्रयोजन के खेलों में जनता मात्र लुत्फ उठाने की भूमिका न निभाए, बल्कि यदि कुछ सकारात्मक किया जा सकता है, तो सोचना और सही दिशा में लाने का प्रयास करना भी हमारा कर्तव्य बनता है। इतिहास गवाह है जनता ही नेताओं पर भारी रही है। न भूलें कि देश हमारा है और हमसे है।
                                                                                                                                                                                                                                            डॉ. शुभ्रता मिश्रा (j.)