आध्यात्मिक होना मतलब अगरबत्ती जलाना नहीं , नदी के समान है साधना !

“शशिकांत सदैव साहित्य जगत के चमकते सितारे हैं। इनके बारे में लिखना सूरज को आईना दिखाने जैसा है। साहित्य के दर्जनों सम्मान प्राप्त ख्यातिलब्ध श्री सदैव जी के कुशीनगर , ‘ओशो मै़त्रेयी ध्यान केन्द्र ‘ प्रवास पर साधना व सन्यास तथा जीवमात्र – मनुष्य से ईश्वर तक बिषय पर अल्प समयावधि में साक्षात्कार का मौका मिला। सदैव जी बहुआयामी  ब्यक्ति हैं । आध्यात्म के ज्ञानपुंज ओशो सन्यासी होने के साथ सांसारिक जीवन में साधना पथ पत्रिका के सम्पादक भी हैं। प्रस्तुत है बात-चीत के अंश…! ”

साधना यानि जो सध जाय !

IMG_20170212_103636[1]स्वयं से कितनी शिकायतें हैं ! अपने आप से शिकायत होते हुए भी अपने जैसा की खेाज करता मन क्यों इतनीं सी बात नहीं समझता कि वह ऐसा करके अपने लिये ही समस्या पैदा कर रहा है। परमात्मा मिल जांय तो हम अपनें में , अर्थात ईश्वर की रचनां में ही तमाम कमियां बताकर उसे बदलने की अर्जी पेश कर दें। इस ब्यवहार को लेकर हम अपने जैसा दूसरा ढूढनें की फिराक में रहतें हैं, सोचो तुममें खूबी है, फिर भी तुम स्वयं संतुष्ट नहीं हो अपनें में बदलाव चाहते हो तो तुम्हारी खेाज कैसे और किसके पास जाकर पूरी होगी। जाहिर सी बात है आप को स्वयं साधना होगा।

साधना क्या है ?

साधना किसी धर्म , संस्कृित से जुड़ा नहीं है। एक बांसुरी वादक, संगीतकार, खिलाड़ी , उच्च ब्यवसायी जिसने जिसे साधा वह उसे प्राप्त किया। आध्यात्मिक स्वरुप में साधना का अर्थ थोड़ा परिस्कृत करके देखा जाता है। इसमें हम अपने इष्ट को प्राप्त होते हैं। जिसको मैं साध रहा था वही मेरा हो गया । हिंदू मैथालाॅजी में ध्यान की खुली सम्भवनायें हैं । आकार¬- प्रकार , निराकार , अनन्त नांद- निनांद सुननें , प्रकाश को देखनें की साधना प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रुप में सर्वत्र उपलब्ध है। भक्ति की नौं धरायें हैं । इसमें प्रेम , मित्रता, भक्ति ,ध्यान, समर्पण शामिल हैं। योग भी इसी में शामिल है। हठ योग, कर्म योंग ,ध्यान योग ,ग्यान योग भी हमें वहीं उसी परम तक पहुॅचानें का मार्ग है। इस तरह साधना के मार्ग भिन्न हैं लेकिन लक्ष्य एक है। जब आप इतना सध जांय कि उसे प्राप्त हों जांय जो आप में ही है और बाहर क्या है ये अंतरमन से समझने लगें अर्थात स्वयं का ज्ञान परम से एकाकार होकर हो जाय वही साधना है। आप इसे ग्रहण करने के लिये कोई भी मार्ग अपना सकतें हैं।

                          साधक की समस्या क्या है ?

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शास्त्र सम्मत कहें तो साधक की सबसे बड़ी समस्या वह स्वयं है। शरीर के दशद्वार जो मनुष्य को मिलें हैं वहाॅ से उर्जा प्रभावति होती है। आॅख देखती है , काॅन सुनतें हैं इसी तरह दशो द्वार वासना का भंण्डारण इस शरीर में करतें रहतें हैं। वासना का तात्पर्य यहाॅ सभी तरह से जमां हो रहे माया के विकारों से है । ये जो मानव मस्तिष्क में विकार पहुॅचाने वाले छिद्र हैं इन्हे जब ध्यान ,योग कर्म जिस प्रकार से भी हों हम बंद कर लेने की स्थिति में होतें हैं तब हम परम से सीधे जुड़ जातें हैं। साधना किसी भी ढंग की हो हठ की हो , कर्म की हो, ध्यान की हो ,आकार- निराकार की हो वो तभी सधेगी जब आपके ये दशद्वार के विकार वाहक छिद धीरे – धीरे बंद होंगे। ये छिद्र धीरे- धीरे बंद होता है । इसके लिये धैर्य व समर्पण जरुरी हो जाता है और तब परमात्मा की उर्जा से ब्यक्ति जुड़ जाता है।

साधना मे जानें का सही समय ?

हम प्राथमिक अवस्था मे भी साधनामय रहतें हैं। हम दुनियां में आते हैं तो सांस लेतें हैं और दुनियाॅ से जातें हैं तो श्वांस छो़ड़ जातें हैं। अपने झंझावतों में उलझे इंनसान के लिये समय की क्या बाध्यता। वैसे धर्म में वर्णाश्रम बनाये गये हैं। वह काॅफी हद तक उपयुक्त भी जान पड़तें हैं। कारण है जब अपने सामाजिक संघर्ष के साथ मनुष्य साधना की ओर मुड़ता है तो उसे उसके अनुभव उसे परमात्मा की ओर ले जाने में बल प्रदान करतें हैं। विकारों से भरा होने पर वह ज्ञान की संकरी लकीर पाते ही सक्रिय हो जाता है। हमारा सामाजिक बुनियादी ढांचा बहुत जटिल है। हमें मौंका ही नहीं देता वह समझाता रहता है कि सत्य यही है। हमारे पास मंदिर में घण्टी बजाने तक का समय नहीं होता ब्यवसायिक जीवन में। आध्यात्म की ओर आप तीन तरीके से आते हैं। एक वो जो सारी उम्मीदें जला चुका है दूसरा जो वर्णाश्रम की अंतिम अवस्था पहचान कर आ गया तीसरा भय है। शायद परमात्मा कहीं हो वह पाप को देखता हो।

किस अवस्था में साधना में आ जाना चाहिये ?

कोई नियमित उम्र बंधन नहीं। बचपन को बचपन की तरह जीने का शरारत का हक है उसे करने दिया जाय। बच्चों को जो आकार दो वह बन जायेगा ।

इसमें उनकी अपनी सहमति तो शामिल नहीं , ऐसे में हम उनके उपर थेाप तो नही रहे ?

हम बच्चों के प्रति जजमेण्टल नहीं हो सकते एक तरह का यह अप्राकृतिक अपराध है जो ईश्वर के विरुद्ध है। धर्म, सन्यास अध्यात्म जीवन के विपरीत नहीं हैं। जीवन नहीं जिये तो आप आध्यात्मिक हो भी नहीं पाओगे। आध्यात्मिक होना मतलब अगरबत्ती जलाना नहीं है। नैतिक शिक्षा यानि क्रमश; सीखना , बचपन से ही शुरु करना चाहिये ताकि उदण्डता के साथ शिष्टता का भी आविर्भाव बचपन से ही हो। धूप में निकलो बारिश में नहा कर देखो,जिंदगी क्या है किताबों को हटाकर देखो ’ समय से पहले कुछ भी ठीक नही,  पर संस्कार देनें में कोई गलती नहीं।

पशु – मनुष्य व प्रकृति के बीच आध्यात्मिक सम्बंध ?

साधना का पथ निर्धारित नहीं है । नदी के समान है साधना। बहाव आया बह गयी, ढाल मिला लुढक गयी, कुछ नहीं मिला ठहर गयी, प्रपात आया उतर गयी । जिसको साधनां नहीं करनीं हो वह बगल में कितनों श्रीश्री महराज रहतें हों लगन व समय नहीं है तो आप के भीतर कोई साधना उत्पन्न नहीं हो सकती । आज मनुष्य अप्राकृतिक हो गया जबकि पशु व पौधे प्राकृतिक बनें रहे । पशुओं तथा पौधों ने अपनें को खुला छोड़ा है , उन्हे कभी कोई बाधा नही आई । उनकी दिनचर्या सयन, सम्भेाग, क्रीड़ा , पान तथा वास सब निर्धारित है। उन्हे विकारों के कारण भटकाव नहीं हुआ । जबकि मनुष्य के विकारों ने इनसे छेड़-छाड  कर इन्हे भी प्रभावित किया है। मनुष्य अनुशासन तोड़ता रहता है। मनुष्य प्रकृति में बाधा बनता है अन्यथा प्रकृति सदैव प्राणीमात्र के कल्याण हेतु प्रस्तुत पायी गयी है।

एक मनुष्य कब सन्यासी बन जाता है ?OSHO

जब चींजें उससे छूटनें लगें ।

क्या छूटनें लगे ?

आकर्षण वासना छूटने लगे । छूट जाये तो वह सिद्ध हो जायेगा !

आर्कषण में विरोधाभाष है । क्योंकि छोड़ने वाला कब तक छोड़े ! कुछ तो पकड़ना है उसे , तभी तो ये सब विकार छोड़ रहा है?

आकर्षण का तात्पर्य जिम्मेदारी से है जो छूटना जरुरी है। लेकिन स्वीकार्य भाव नहीं छूटेगा । जैसे में कहूं कि मै इस वृक्ष से प्यार करता हूं । इसे मेरे पूर्वजों ने सींचा है। मैं इसके बिना रह नहीं सकता । मैं मर गया तो इसका क्या होगा । मुझे इसकी चिंता खाये जा रही है। यहाॅ मैं इस पेड़ से बंधा हुआ हूं। दूसरी तरफ मैं सोच रहा हूं कि वाह कितना सुन्दर पेड़ है यह भी एक दिन छूट जायेगा इसे भी जाना होता है जैसे मेरे जीवन की शाम होनी निश्चित है । यहाॅ मैं उस पेड़ से बंधा नहीं हूं । सत्य का ज्ञान मुझे है और संसार का मोहपास मुझे जकड़ नहीं पा रहा । मैं बंधा नहीं हूं। स्वीकार भाव है उससे कोई नफरत भी नहीं है। खूंटे से बंधा जैसा कोई बंधन भी नहीं है। जब तक आकर्षण का बंधन है तब तक आप स्वकाराग्रह में निरुद्ध हैं।

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