किसान के गाढ़े धन का अपब्यय, रासायनिक उर्वरक का प्रयोग !

रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशक , भूमि की उर्वराशक्ति बढ़ाने वाले जीवाणु नष्ट कर रहे हैं !

IMG_20170220_141203 Gorakhpur :  हमारे देश में सम्भावनाओं का असिमित भंण्डार बताने वालों की कमी नही रही । कृषि क्षेत्र के लिये तो हर रोज लुभावने वादे सरकार तथा अन्य संगठनों की ओर से होते ही रहते हैं। किसानों को सुविधा देने के नाम पर जो भी हो रहा है वह सम्भव है किसान के हित में जानकर किया गया लेकिन वर्तमान में खेती की जो दशा है उससे किसान व  खाद्य उपभेक्ता दोनों की हालत दिन पर दिन खराब हुई है। हरितक्रांति के नाम पर देश भर में अंधाधुंध खेतों में परोसी जानें वाली रासायनिक खाद ने उत्पाद तो खूब बढ़ाया लेकिन भूमि को रासायनिक खादों का आदती बना दिया। आज किसान की आमदनी का बहुत बड़ा हिस्सा कथित यूनिक खादों की खरीद में चला जाता है। कृषि विशेषज्ञों की बातों पर ध्यान दें तो जो रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशक हम खेतों में लगातार डाल रहे हैं उससे भूमि की उर्वराशक्ति बढ़ाने वाले जीवाणु नष्ट हो रहे हैं। किसान की आर्थिक स्थिति और कृषि उत्पादन के बीच बीते कुछ वर्षों में बड़ा अन्तर देखने को मिला है। अब किसान उत्पादन का अपेक्षित लक्ष्य प्राप्त करनें के लिये रासायनिक खाद का उपयोग निर्धारित सीमा से अधिक मात्रा में करने लगा है। यह किसान का भ्रम मात्र है। वास्तव में खेत में बोई गई फसल रासायनिक खाद का 50 फिसद ही उपभोग करतीं हैं बाकी सब मात्रा नष्ट हो जाती है जो किसान के गाढ़े धन का अपब्यय है।

कैसे हो टिकाउ खेती ?

आज सरकार तथा कृषि वैज्ञानिक टिकाउ खेती पर जोर दे रहे हैं। भू -मृदासंरक्षण केन्द्र के जाॅच टीम के मुताबिक मिट्टी की भैतिक दशा लगातार खराब हो रही है। भूमि की उत्पादन शक्ति लगातार कमजोर होती पाई जा रही है। प्रदेश के गांवों में पशुधन का ह्रास होने से जैविक खाद की आपूर्ति खेतों में पर्याप्त मात्रा में हो नहीं पा रही है। भूमि की उत्पादन छमता बढानें के लिये खेतों में जैविक खाद का प्रयोग अति महत्वपूर्ण- अवश्यम्भावी हो गया है। भूमि में जैविक तत्वों की पूर्ति कर उन्हे जीवन प्रदान करने का काम जैविक खाद ही करती है। क्योंकि यह एक प्रकार की मिट्टी ही होती है। आज जरुरत है गाॅव में पशुधन विस्तार की।

हमारी उर्वरा भूमि की जरुरत !

IMG_20170220_140937 मिटटी को मूलत; 16 पोषक तत्व की आवश्यकता होती है। 3 तत्व प्रकृति प्रदत्त होते हैं कार्बन, हाइड्ोजन, आॅक्सीजन , नाइट्ोजन, फास्फोरस, पोटैशियम मिट्टी के जरुरी पोशकतत्व है जिनकी आपूर्ति करते रहना जरुरी है। उत्तर -प्रदेश के पूर्वी- पश्चिमी क्षेत्र की मिट्टी में कैल्शियम तथा मैगनीशियम की बहुतायतता है। क्षेत्रीय भूमि परीक्षण प्रयोगशाला गोरखपुर मे कार्यरत वरिष्ठ प्राविधिक सहायक बालेन्दुपति त्रिपाठी ने बात- चीत मे बताया कि सन 1965 से पूर्व भारत में खेती पूर्ण रुप से जैविक आधारित थी। पशुधन की मात्रा अधिक थी। देश में भूखमरी व युद्ध एक साथ आ जाने के बीच आई हरितक्राॅति ने तेजी से कृषि उत्पादन में बृद्धि कर दी । कृत्रिम उर्वरक की माॅग किसानों में तेजी से बढ़ी और निरंतर जोर पकड़ती गई। फलस्वरुप पशुधन भी घटते चले गये कृषि क्षेत्र में मशीनों का कब्जा हो गया। आज 10 – 15 सालों से खेतों में उत्पादन स्थिर है। किसान उत्पादन बढ़ानें के प्रयास में खेतों में लगातार उर्वरक बढ़ाये जा रहा है लेकिन कोई फायदा उसे हो नही पा रहा । पूर्व में किसान खेतों में हरी खाद बना लेते थे । इसमें सनई, ढैंचा, उर्द बो कर उसके जड़ डंठल को खेत में ही दबा देते हैं। यह खाद बनाने का सबसे सस्ता व सुगम मार्ग है। इससे भूमि की उर्वरा ताकत वापस आती है। इसके बीज कृषि भवन व विकास खण्ड से प्राप्त किये जा सकते है। किसान की सहायता के लिये हर न्यायपंचायत में किसान सहायक होते हैं।

गन्ना मीलें भी जैवकि बनानें से कर राहीं हैं तौबा !

IMG_20170220_141040गन्ना मिल व डिस्टीलरी प्लांट जहां संयुक्त रुप से हैं  , वहाॅ प्रेसमड को टींचर व अन्य विधियों से कम्पोस्ट बनाने का प्लांट अनिवार्य रुप से था । कुछ मीलों का मानना है कि अब चूंकि प्लाट महंगे पड़ रहे हैं, इसलिये कम्पोस्ट प्लांट सरेण्डर कर रहे हैं। उनकी जगह पर कचरा निस्तारण के लिये एंसीलेटर लगाकर सब चला दिया जा रहा। यह किसान के लिये दुखद समाचार हैं। सरकार को चाहिए कि पे्रसमड कम्पोस्ट को बढ़ावा देने के साथ-साथ किसानों को उपलबध कराने की ब्यवस्था सुनिश्चित करे। उर्वरक की जगह पर किसान जैविक खाद के रुप में कम्पोस्ट इस्तेमाल करे। मध्य प्रदेश के कई गाॅव जैविक खेती के लिये विश्व स्तर पर भारत का मान बढ़ा रहे है। जैवकि उत्पाद का अपना बाजार है और वह रोग रहित माने जाते है। बजाज सुगर मील अठदम्मा  बस्ती के कम्पोस्ट प्लांट के असिस्टेण्ट मैनेजर शिवेन्दर सिंह के मुताबिक प्रेसमड गन्ना मील का कचरा है जो एक प्रकार की मिट्टी ही है। यह मिट्टी में मिल कर मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बढ़ा देता है। सब्जी और पौधें! में इसका प्रयोग करना बहुत फायदेमंद साबित हुआ है। यह औसतन 10 कुन्तल प्रति एकड़ प्रयोंग की जाती है। मात्रा अधिक हो जाने पर भी यह नुकासान नहीं करती ना ही इसका अपब्यय होता है। श्री सिंह बताते हैं कि मिट्टी की जाच के बाद उसी हिसाब से प्रयोग में लायें, लाभ का प्रतिशत अधिक प्राप्त होता है।

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