कुपोषित भारत : बदतर स्वास्थ्य रिपोर्ट का जिम्मेदार कौन ?

बच्चों के स्वास्थ्य पर सचेतक के रुप में नेपाल से भी पीछे है भारत!

 New Delhi :  दुनिया भर में पांच साल से कम उम्र की कुल आबादी का छठा हिस्सा भारत में रहता है। लेकिन इन बच्चों में से भी एक चौथाई के कदम उम्र के मुकाबले बहुत कम है। यह अल्पपोषण के प्रमुख लक्षणों में से एक है।TrendWatch ऐसे करीब 4.4  करोड़ बच्चे हैं जिनको तत्काल देखभाल की आवश्यकता है। उल्लेखनीय है कि दुनिया के 228 देशों में से महज 32 की आबादी इससे अधिक है। हाल में जारी दो रिपोर्ट- भारत स्वास्थ्य रिपोर्ट और वैश्विक पोषण रिपोर्ट, में देश के अल्पपोषित बच्चों के मुद्दे पर अहम रोशनी डालती है। यद्यपि जब भी इसे पूरक जानकारी के रूप में प्रयोग करने की बात आती है तो आंकड़ों की समस्या खड़ी हो जाती है। वैश्विक रिपोर्ट से विभिन्न देशों की आपसी तुलना की बात की जाए तो यह काम भी कठिन है क्योंकि इसमें जो देशवार आंकड़े प्रयोग किए गए हैं वे निशिच्य ही तुलनात्मक नहीं हैं। रिपोर्ट में जिन आंकड़ों का प्रयोग किया गया है, वे भारत के तीसरे राष्टï्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण पर आधारित हैं जो सन 2006 में हुआ था (पांच साल से कम उम्र के 48 फीसदी बच्चे अल्पविकसित)। उस हिसाब से देखा जाए तो हमारा देश बांग्लादेश, नेपाल और पाकिस्तान से पीछे नजर आता है क्योंकि उनके आंकड़े वर्ष 2011-12 के होने के नाते अधिक नए हैं।
  कुपोषण में कई गरीब अफ्रीकी देशों से पीछे है भारत !
लेकिन अगर भारत स्वास्थ्य रिपोर्ट का प्रयोग किया जाए तो उसमें वर्ष 2014 के बच्चों के तीव्र सर्वेक्षण का प्रयोग किया गया है। Malnutrition-india तीव्र होने के कारण इस आंकड़े को बहुत व्यापक नहीं माना जा सकता है। इस रिपोर्ट में उपरोक्त आंकड़ा 9 प्रतिशत की भारी गिरावट के साथ 39 फीसदी पर आ गया है। इस लिहाज से भारत बाकी तीनों देशों से आगे है। वर्ष 2014-15 का चौथा एनएफएचएस लंबित है लेकिन स्पष्टï है कि इन राष्टï्रीय सर्वेक्षणों के बीच सात साल का औसत अंतर बहुत ज्यादा है। इस बीच बहुत बड़ी संख्या में बच्चों को जीवन भर के लिए नुकसान उठाना पड़ा होगा। वैश्विक रिपोर्ट कहती है कि यह अनिवार्य है कि ऐसे मूल राष्टï्रीय संकेतकों का निर्णय किया जाए जो संस्थागत स्वास्थ्य को प्रभावित करते हों और उनके लिए हर दो या तीन साल में आंकड़े जुटाए जाएं। अगर ऐसा नहीं किया गया तो नीति निर्माण प्रभावित होगा। आंकड़ों की बात करें तो मौजूदा आंकड़े उतने भी अद्यतन नहीं हैं। इनसे यह संकेत मिलता है कि भारत दक्षिण एशियाई देशों में तो शीर्ष पर है लेकिन वह कई गरीब अफ्रीकी देशों से पीछे है। श्रीलंका और चीन से तो वह बहुत ज्यादा पीछे है।

राज्य सरकारों को देना होगा विशेष ध्यान !

इन दोनों देशों में नाटे बच्चों की संख्या क्रमश: 15 फीसदी और 9 फीसदी है। यह भी स्पष्टï है कि भारत की मौजूदा खस्ता हालत को सुधारने के लिए कई पिछड़े राज्यों पर ध्यान केंद्रित करना होगा क्योंकि पोषण संबंधी काम मोटे तौर पर राज्य सरकार द्वारा ही संचालित होते हैं। state_govtsइससे औसत में भारी कमी आएगी। केरल (19.4 प्रतिशत) और तमिलनाडु (23.3 प्रतिशत) की स्थिति उत्तर प्रदेश (50.4 प्रतिशत) और बिहार (49.9 प्रतिशत) की तुलना में बहुत अधिक अलग है।  पोषक खाद्य पदार्थ तो इस समस्या से निपटने का एक माध्यम भर हो सकते हैं क्योंकि एक बच्चे का स्वास्थ्य उसकी मां के स्वास्थ्य से बहुत नजदीकी से जुड़ा रहता है, साथ ही उसके आसपास के सामाजिक व्यवहार से भी। ऐसे में उन संकेतकों पर ध्यान केंद्रित करना महत्त्वपूर्ण है जो व्यापक परिदृश्य के लिहाज से महत्त्वपूर्ण हैं। ऐसे में नाटेपन के अलावा हमें यह भी देखना होगा कि आखिर कितने बच्चों को दो साल की उम्र के पहले सारे टीके लगे। बच्चा पैदा करने की उम्र वाली कितनी महिलाएं रक्त की कमी से जूझ रही हैं, कितनी महिलाओं का विवाह 18 की उम्र से पहले हो गया, कितनी शादीशुदा महिलाओं ने 10वीं तक पढ़ाई की और खुले में शौच की क्या स्थिति है?
 सबसे  पीछे हैं  हिंदी भाषी राज्य  !
इन छह मानकों के आधार पर देखें तो मध्य भारत के हिंदी भाषी राज्य सबसे अधिक पीछे हैं। मोटे तौर पर देखा जाए तो ये पुराने बीमारू श्रेणी के राज्य हैं लेकिन अब इनमें अहम बदलाव आ चुका है। childछत्तीसगढ़ (जो पहले मध्यप्रदेश का हिस्सा था) इसका बड़ा अपवाद है। वह छह में से चार मानकों पर राष्ट्रीय औसत से भी बेहतर है। जो राज्य सबसे निचले स्तर पर हैं उनमें बिहार, झारखंड और मध्यप्रदेश शामिल हैं। इन तीनों का आंकड़ा शून्य है जबकि असम और ओडिशा को एक अंक मिला है।  बीच में तीन राज्य आते हैं जो दो मानकों पर राष्ट्रीय औसत से बेहतर हैं। वे अपने पारंपरिक दर्जे से बाहर आना चाहते हैं। इसमें राजस्थान और उत्तर प्रदेश या फिर गुुजरात जैसे राज्य हैं। गुजरात का विकास मॉडल भी प्रश्नों से परे नहीं है। छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में अविकसित बच्चों की संख्या गुजरात के बराबर ही है लेकिन उनका प्रति व्यक्ति राज्य सकल घरेलू उत्पाद गुजरात की तुलना में आधा है।
आर्थिक प्रगति से पोषण की कमी दूर नहीं होती !
सभी नौ पिछड़े हुए राज्यों की बात करें तो चार के पास पोषण नीति है। जिन राज्यों के पास नहीं है (छग को छोड़कर जहां यह नीति बस आई ही है) उनमें बिहार, राजस्थान, असम और ओडिशा शामिल हैं। ये वही राज्य हैं जहंा बहुत अधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। BB5भारत स्वास्थ्य रिपोर्ट 63 देशों के अध्ययन की बात करती है जिससे पता चलता है कि प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोतरी से बच्चों के पोषण स्तर में सुधार केवल तभी होता है जबकि निजी और सार्वजनिक निवेश खानपान और बीमारियों से जुड़ी समस्या दूर करने के लिए मौजूद हों। कुल मिलाकर बाल पोषण सुधारने के लिए स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में सुधार, महिला सशक्तीकरण, सामाजिक सुरक्षा और बेहतर जलापूर्ति एवं सफाई आवश्यक है। वहीं दूसरी ओर, नीति निर्माता और प्रमुख अर्थशास्त्री 10 फीसदी की विकास दर की चिंता में हैं। रिपोर्ट कहती है, ‘अल्पपोषण की दर आर्थिक प्रगति के साथ कम हो सकती है लेकिन आर्थिक प्रगति से पोषण की कमी दूर नहीं होती है बल्कि वह वजन बढऩे और मोटापे की ओर ले जा सकती है।’ आखिरी चेतावनी के रूप में कहा गया है कि अगर भारत अल्पपोषण की समस्या की अनदेखी करता है तो बच्चे के विकास पर तो इसका बुरा असर होगा ही, इसके गहन आर्थिक, स्वास्थ्यगत और सामाजिक परिणाम भी होंगे जो भावी पीढिय़ों को भुगतने होंगे।

सुबीर रॉय (BS)