खादी के धागे-धागे में, अपनेपन का अभिमान भरा…. !

…  अब राजनैतिक विश्लेषण और विभाजन का विषय बनती जा रही है खादी !

KHADI GANDHIVasco de Gama : ऐसा नहीं लगता कि देश में गांधी और खादी अंग्रेजी के सिनॉनिम वर्ड की तरह हमारे बच्चों को रटवा दिए गए हैं और हमने भी रट लिए हैं। जब भी गांधी जयंती या पुण्यतिथि आती है, कुछ नेतागण खादी के कपड़े पहनकर गांधी के प्रति अपने याद करने के कर्तव्य को पूरा करने का संतोष कर लेते हैं, समाधि पर फूल चढ़ा आते हैं, दिन के 11 बजे पूरा देश दो मिनट के लिए मौनमग्न हो जाता है और कुछ हम जैसे लेखक भी गांधी और खादी पर बतिया लेते हैं। हो गया उत्तरदायित्व समाप्त, कर लिया याद हमने गांधी और खादी को। शेष आम भारतीय लोग लगभग रोज नोटों में गांधी को देख ही लेते हैं और अभी-अभी खादी को सुनने भी लगे हैं। हमारे देश में गांधी दिखाई देते हैं और खादी सुनाई देने लगी है, पर कहीं महसूस नहीं कर पाते हैं हम इन दोनों को, शायद ये दोनों हमारी संवेदनशीलता से बहुत परे से हो गए हैं। गांधी की चर्चा नोटों पर अधिक होती है, उनके सत्य, अहिंसा और भाईचारे को हमने तीन बंदरों के रुप में अपने अपने ड्राइंगरुमों में कैद कर लिया है। और खादी अब राजनैतिक विश्लेषण और विभाजन का विषय बनती जा रही है कि गांधी और मोदी की खादी का अंतर क्या है, यह विषय ज्यादा दिलचस्पी का है। खादी का क्या है, शरीर को गर्मी में ठण्डा और सर्दी में गरम ही तो रखती है। इससे क्या होता है, इसके लिए तो और भी विकल्प आ गए हैं। अतः खादी के प्रति ठण्डी संवेदनशीलताओं से राजनीतिक गरमाहट ही तो मिलती है। यानि खादी का गुण किसी न किसी रुप में बना हुआ है। इसलिए खादी को इसके लिए भारतीयों का बहुत बड़ा अहसानमंद होना चाहिए। KHADI MODI

कड़वा सच सिर्फ खादी जानती है;  पर खादी कभी बोलेगी नहीं !

खादी को चरखे पर बैठकर फोटो में कौन कात रहा है, ये ज्यादा महत्वपूर्ण विवाद है। क्योंकि सच में खादी किसने काती, कितनी काती और कब काती, ये कड़वा सच सिर्फ खादी जानती है। पर खादी कभी बोलेगी नहीं, क्योंकि वो गांधी के दिए बरसों पहले के तीन नियमों बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो और बुरा मत बोलो की मर्यादा में आज भी बंधी हुई है। और इसलिए चुप है, खादी पर केवल दूसरे बोलते आए हैं और अब खादी गांधी से चुराई जा रही है, ऐसा खादी सुन भी नहीं पा रही है। जहां तक देखने का प्रश्न है, गांधी की आँखों के बंद करने के बाद से खादी ने स्वयं को कहीं देखा ही नहीं। गांधी थे, तो खादी थी। अब गांधी और खादी दोनों कागजों पर हैं, भाषणों में हैं, राजनीतिक गलियारों में हैं, तस्वीरों में हैं, शोरुमों में हैं, जंयतियों में हैं, पुण्यतिथियों में हैं। नहीं हैं तो सिर्फ वहां जहां उनको होना चाहिए था, हमारे आदर्शों में, हमारी राष्ट्रीयता में, हमारी संवेदनाओं में और हमारी आगामी पीढियों में।

header युवा पीढ़ी तो शायद सोहनलाल द्विवेदी के खादी गीत की पंक्तियों से भी अनभिज्ञ हैं कि “खादी के धागे-धागे में, अपनेपन का अभिमान भरा। माता का इसमें मान भरा, अन्यायी का अपमान भरा।” द्विवेदी जी ने जब खादी पर ये पंक्तियां लिखी थीं कि खादी तो कोई लड़ने का है जोशीला रणगान नहीं, खादी है तीर कमान नहीं, खादी है खड्ग कृपाण नहीं।। तब उनको भी नहीं मालूम रहा होगा कि खादी पर भविष्य में लड़ाइयां भी हो सकती हैं। वर्तमान में हमारे लिए यह समझ पाना कितना कठिन हो रहा है कि हम गांधी और खादी के साथ अन्याय कर रहे हैं अथवा हम इन्हें भूलकर अपने साथ अन्याय कर रहे हैं। पर यह सुनिश्चित है, अन्याय कहीं न कहीं तो हो रहा है।

Dr. Subhrata  Mishra (J.)                                                                                                                                          Vaidambh Media

           ‘Gova’