झुनझुना: देश में शौंचालय निर्माण ,रख-रखाव किसके जिम्में..?

सामाजिक कार्यों का वास्तविक जिम्मेदार कैान ? कारपोरेट या सरकार !

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साफसुथरी सड़क पर खमखाह हरी पत्तिया बिखेर दी अब करो साफ

 देश में वर्तमान सरकार अपने सभी किये गये कार्यों को अभूतपूर्व बताकर अपनी पीठ थपथपा रही है। सरकार पर कारपोरेटी होने के आरोप भी लगते रहे हैं। देश में स्वच्छता अभियान जिस प्रकार गाजे- बाजे व चकाचैाध के बीच शुरु हुआ उससे इसके परिणाम का अंदाजा हो गया था। आज सफाई पर लोगों की राय सरकार से हट कर ब्यक्तिगत हो गई।

स्च्छता अभियान की किट्टी पार्टी
स्च्छता अभियान की किट्टी पार्टी

अब कहा जा रहा है कि यदि आप स्वयं में ब्रत लें लें तो गंदगी दूर -दूर तक नजर नहीं आयेगी। मेरे जैसे मूढ़ ब्यक्ति को यही बात समझ नही आती यदि लोग अपराध करना बंद कर दें तो चहुॅओर शांति ही शांति हो जाय.  सरकार लोगों से  कबीर का दोहा ” सांई इतना दीजिये जाके कुटुम समाय….” का सुमिरन कराये तो भ्रष्टाचार का दानव इस देश में दिखेगा ही नहीं . क्या सरकार का काम उपदेश देना है ?  लोकतंत्र के साठ साल में सरकार पर जनता क्या इतना भरोसा कारने को तैयार है?  क्या केन्द्र की सत्ता में बैठे लोग यही भाषा चुनावी मंच से बोल रहे थे ! या सत्ता होती ही ऐसी है ;  कि कर्तब्य छोड़ सब करने को प्रेरित करती है। या वर्तमान सरकार भावावेश में कदम बढ़ा रही है,  जिससे उठे कदम के परिणाम का आंकलन कर पाना उसके लिये अभी कठिन हो रहा है। जो भी हो आज  हम एक गम्भीर बिषय पर चर्चा कर रहे हैं आप भी दिमाग दौड़ाईये…..!

 

New Delhi: महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने पिछले हफ्ते उद्योग संगठनों को फटकार लगाई कि वे सामाजिक कार्यों को लेकर गंभीर नहीं हैं। एसोचैम के एक कार्यक्रम में वह बोलीं, ‘जब देश के लिए कुछ करने की बारी आती है तो वे सिर्फ बातें करते हैं और काम बहुत कम करते हैं।’ ऐसे में उनके कार्यक्रम में शामिल होना वक्त की बरबादी है। उनका कहना था कि अभी तक पूरे देश में कंपनियों ने स्कूलों में लड़कियों के लिए महज 300 शौचालयों का निर्माण किया है, जो एकदम नाकाफी है, जिससे प्रधानमंत्री तक को भी निराशा हुई है।

     शौचालय निर्माण का कोरम !

sauchalay nirmanआइए, आंकड़ों पर गौर करते हैं। मित्तल परिवार के भारती फाउंडेशन ने पहले ही पंजाब के लुधियाना जिले में तकरीबन 4,000 से अधिक शौचालय बना दिए हैं और 2,000 अन्य बन रहे हैं। भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) की जानकारी के अनुसार 20 देसी-विदेशी कंपनियों ने अभी तक देश में 2,604 शौचालयों का निर्माण किया है। इनमें सबसे बड़ा योगदान टीसीएस (1,433) का है, उसके बाद महिंद्रा समूह (373), कोका कोला (167) और केयर्न इंडिया (161) की बारी आती है। इसके अलावा कुछ छोटी कंपनियों ने एकजुट होकर सीआईआई को उनकी ओर से शौचालय निर्माण के लिए कहा है। अभी तक सीआईआई ने 125 शौचालय बनाए हैं। हर शौचालय में अमूमन तीन मूत्रालय और लड़कों के लिए एक डब्ल्यूसी और लड़कियों के लिए चार डब्ल्यूसी हैं। हाल में हैवेल्स ने हैदराबाद की बांका बायो को राजस्थान के अलवर जिले में 50 शौचालय बनाने का काम सौंपा है। अगले तीन महीनों में वह 50 अन्य शौचालयों के निर्माण का काम और सौंपेगी। उसकी अलवर के 400 स्कूलों में शौचालय बनाने की योजना है। निश्चित रूप से यह उस लक्ष्य से काफी कम है, जिसका श्रीमती गांधी ने जिक्र किया। मगर शौचालय बनाना आसान काम नहीं है-इसमें कई व्यावहारिक समस्याएं हैं।

 कॅारपोरेट के शौचालयों का रखरखाव कौन करेगा?

sochalaya greter noidaअधिकांश कंपनियां उन इलाकों में शौचालय बनवाना चाहती हैं, जहां या तो वे मौजूद हैं या उन जगहों से उनका कोई और संबंध है। इसे लेकर आप उनको कोई दोष नहीं दे सकते। महाराष्ट्र के अधिकांश विकास खंडों पर नजरें इनायत करने में कंपनियों ने देर नहीं लगाई। मुंबई की किसी भी कंपनी के लिए यह स्थिति बहुत मुश्किल होगी कि वह बिहार में दूरदराज के गांव में शौचालय बनाए। जाहिर है, पहली बाधा यही है। कई लोग यह सवाल उठाने लगे हैं कि इन शौचालयों का रखरखाव कौन करेगा? उचित रूप से देखभाल के अभाव में उन्हें खराब होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। गुजरात, आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे कुछ राज्यों ने ही शौचालयों के रखरखाव की मद में कुछ राशि आवंटित की है। राजस्थान जैसे राज्यों ने प्रत्येक स्कूल के लिए दो सफाईकर्मी भी नियुक्त किए हैं लेकिन उनके गायब रहने का आंकड़ा बड़ा है।

 लोकल ब्यवस्था , सरकारी तंत्र की सहमति शौचालय निर्माण  में बड़ी  बाॅधा

sauchalayफिर जमीनी स्तर पर लागू करने की दिक्कत अलग है। शौचालय निर्माण के लिए स्कूल और पंचायत में सहमति जरूरी है और यह आसान नहीं है। हैवेल्स ने अलवर को इसलिए चुना क्योंकि वह पहले से ही वहां 600 से अधिक स्कूलों में मध्याह्न भोजन मुहैया करा रही है और ऐसे में वहां के तंत्र को बेहतर तरीके से समझती है। एकदम नई जगह का रुख करने का अर्थ यही होगा कि आपको नई नौकरशाही के साथ तालमेल बिठाना होगा, जो आसान काम नहीं है। इन समस्याओं से आजिज कई कंपनियों ने दूसरी राह अख्तियार की, उन्होंने स्वच्छ भारत कोष में खुले दिल से योगदान दिया, जिसका मकसद स्वच्छता विशेषकर स्कूलों में उसकी दशा सुधारना है। बजाज ऑटो, आईटीसी और एलऐंडटी ने मिलकर इस कोष के 90 करोड़ रुपये दान किए हैं। इसलिए मेनका गांधी का यह कहना एकदम सही है कि इस राह पर सुस्ती से आगे बढ़ा जा रहा है लेकिन जमीनी हालात को देखते हुए यह बुरा नहीं है। अगर भारत कारोबार की राह आसान बनाने के पैमाने पर खराब प्रदर्शन करता है, तो सीएसआर को आसान बनाने के मामले में भी वह कुछ बेहतर करता नहीं दिखता।

सरकार अपनी वित्तीय जिम्मेदारियां निजी क्षेत्रों पर क्यों लाद रही ?

swchh sauchalayइससे इतर बात करें तो उद्योग संगठनों को लताड़ लगाना एक तरह से उनसे जबरन परोपकार कराने जैसा है। कंपनियों का काम शौचालय बनाना या सामाजिक कार्य करना नहीं है। उनका काम शेयरधारकों के मुनाफे को ज्यादा से ज्यादा बढ़ाना है। कारोबारी ही दान-परोपकार का काम करते हैं, कंपनियां नहीं। इसमें कोई जोर-जबरदस्ती नहीं की जा सकती। मौजूदा सरकार भी स्वाभाविक रूप से इसे जारी रखना चाहती है। अनिवार्य सीएसआर मुनाफे पर चोट था, फिर भी कुछ कारोबारियों ने ही उसके खिलाफ आवाज उठाई। क्यों? क्योंकि इसने उन्हें चापलूसी से कृपापात्र बनाने में मदद की। इसने कार्य को लेकर अनुबंधों, रिश्वतखोरी व चोरी वाले तंत्र को जन्म दिया। इससे एक मुद्दा यह उभरता है कि क्या सरकार के सामाजिक लक्ष्यों को हासिल करना निजी कंपनियों की जिम्मेदारी है? इसका जवाब नहीं है। फिर भी तमाम ऐसी मिसालें हैं कि सरकार ने कैसे अपनी वित्तीय जिम्मेदारियां निजी क्षेत्र पर लादी हैं।

मूल्य नियंत्रण वाली दवाओं से दूर हो रहे निर्माता; नतीजे घातक

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जरा दवा कीमतों पर नियंत्रण को देखिए। इसके नतीजे घातक रहे हैं। एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में कीमत-नियंत्रण वाली दवाओं की नई पेशकश और उनकी खपत में खासी कमी देखी गई है। दवा निर्माता अब उन दवाओं पर ध्यान दे रहे हैं, जो मूल्य नियंत्रण के दायरे से बाहर हैं। अध्ययन के अनुसार ग्रामीण बाजारों में मूल्य नियंत्रित दवाओं के उपभोग में 4 फीसदी की कमी दर्ज की गई है, जबकि अन्य दवाओं का उपभोग 5 फीसदी बढ़ा है। बेहतर यही होगा कि सरकार मूल्य नियंत्रण खत्म करे और गरीब लोगों को अपनी जेब से सब्सिडी देकर दवाएं मुहैया कराए। इससे कम से कम विकृतियां तो नहीं होंगी। मगर उसके लिए सामाजिक कल्याण की दिशा में नए दृष्टिïकोण की जरूरत होगी।(B.S.)

भूपेश भन्डारी